राष्ट्र का आत्मस्वर: हिन्दुत्व ही भारत का स्व
रत्नाकराधौतपदां हिमालयकिरीटिनीम्।
ब्रह्मराजर्षिरत्नाढ्यां वन्दे भारतमातरम्।।
अर्थात् जिनके पैर (दक्षिण में) समुद्र धोता है और जो (उत्तर में) हिमालय के मुकुट से सुशोभित हैं, ऐसी ब्रह्मऋषियों और राजऋषियों से परिपूर्ण भारत माता को मैं वंदन करता हूँ।
भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है; वह एक जीवंत चेतना, एक सांस्कृतिक प्रवाह और एक आध्यात्मिक अनुभूति है। हिमालय से समुद्र तक फैली यह पुण्य भूमि हजारों वर्षों से विविधताओं को आत्मसात करती हुई एक अद्वितीय सांस्कृतिक एकता का साक्ष्य देती आई है। इस राष्ट्र की आत्मा, उसका ”स्व“, उसकी पहचान यदि किसी एक शब्द में व्यक्त की जाए तो वह है हिन्दुत्व। यहां हिन्दुत्व का अर्थ किसी संकीर्ण पंथ या उपासना-पद्धति से नहीं, बल्कि उस जीवन-दृष्टि से है जिसने इस पुण्य भूमि को भारत बनाया।
हिन्दुत्व को समझने से पूर्व स्व के अर्थ व विचार को स्पष्टता से समझना अति आवश्यक है।
‘स्व’ से आशय हमारी मूल पहचान और वास्तविक स्वरूप से है। यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि वह सूक्ष्म तत्व है जो हमारी चिति अर्थात चेतना में बीज के रूप में निहित रहता है। यही ‘स्व’ ऊर्जा के अक्षय स्रोत की भाँति हमें जीवन-पथ पर निरंतर अग्रसर करता है। अधिक स्पष्ट शब्दों में कहें तो ‘स्व’ एक प्रेरक शक्ति है, जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के माध्यम से समय-समय पर विविध रूपों में अभिव्यक्त होती है।
इस सृष्टि की प्रत्येक जीवित सत्ता का अपना विशिष्ट स्वभाव, स्वरूप, आचरण और परिचय होता है। किंतु इन सबमें मानव जीवन सर्वाेपरि माना गया है, क्योंकि उसमें चेतना, संवेदना और विवेक की विशेष आभा विद्यमान है। और मानव समुदायों में भी पुण्यभूमि कहे जाने वाले भारतवर्ष के लोगों की एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रही है, वह है हिन्दुत्व आधरित जीवन शैली और यही भारत का स्व है।
भारत का स्व केवल भौगोलिक सीमा का नाम नही बल्कि एक जीवंत चेतना है, जो सहस्रांे शताब्दियों से मानवता मार्गदर्शन करती आयी है।
भारत की आत्मा, उसकी संस्कृति, आध्यत्म, ज्ञान व समरसता में निहित है। यहां वेदांे की ऋचायें गूंजी, उपनिषदों ने आत्मा के रहस्य खोले और गीता ने कर्म का अमर संदेश दिया।
”भारत स्वभाव से हिन्दू राष्ट्र है और हिंदुत्व हमारी पहचान“ यह विचार केवल एक राजनीतिक कथन नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की सांस्कृतिक आत्मा का उद्घोष है। इस दृष्टि को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने वाले दो प्रमुख व्यक्तित्व हैं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जी और विनायक दामोदर सावरकर। दोनों ही विचारकों ने हिंदुत्व को संकीर्ण धार्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रीयता का आधार माना है।
मोहन भागवत जी बार-बार यह स्पष्ट करते रहे हैं कि ”हिंदू“ शब्द किसी उपासना-पद्धति का नाम नहीं, बल्कि इस भूभाग की जीवन-दृष्टि का प्रतीक है। उनके अनुसार भारत की पहचान उसकी हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा, विविधता में एकता और सहअस्तित्व की भावना में निहित है। वे कहते हैं कि भारत में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति, जो इस भूमि को अपनी मातृभूमि मानता है और इसकी संस्कृति का सम्मान करता है, व्यापक अर्थ में हिंदू है। इस प्रकार हिंदुत्व, उनके विचार में, समावेशी और सर्वस्पर्शी राष्ट्रीय चेतना है जो सबको साथ लेकर चलने की प्रेरणा देती है।
दूसरी ओर, विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी प्रसिद्ध कृति हिंदुत्वः हू इज अ हिंदू? में हिंदुत्व की वैचारिक आधारशिला रखी। सावरकर ने हिंदुत्व को केवल धार्मिक पहचान तक सीमित न रखकर उसे सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक एकता के सूत्र में परिभाषित किया।
आसिन्धुसिन्धुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिकाः।
पितृभूपुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरितिस्मृतः।।
अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति जो सिन्धु से समुद्र तक फैली भारतभूमि को साधिकार अपनी पितृभूमि एवं पुण्यभूमि मानता है, वह हिन्दू है। सावरकर के लिए हिंदुत्व एक राष्ट्रीय पहचान थी, जो साझा इतिहास, परंपराओं, महापुरुषों और सांस्कृतिक मूल्यों से निर्मित होती है। उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि भारत की राष्ट्र-चेतना का विकास उसकी सनातन सांस्कृतिक विरासत से हुआ है, न कि केवल आधुनिक राजनीतिक सीमाओं से।
दोनों विचारकों के मतों में एक समान सूत्र दिखाई देता है। भारत की राष्ट्रीयता का आधार उसकी सांस्कृतिक एकात्मता है। यहां ”हिंदू राष्ट्र“ का आशय किसी धर्मतांत्रिक राज्य से नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक राष्ट्र से है, जिसकी जड़ें वेदों, उपनिषदों, बौद्ध-जैन परंपराओं, संत साहित्य और स्वतंत्रता आंदोलन तक फैली हुई हैं। यह राष्ट्र विविध भाषाओं, वेशभूषाओं और परंपराओं के बावजूद एक साझा सांस्कृतिक चेतना से बंधा हुआ है।
आज के वैश्वीकरण और तीव्र सामाजिक परिवर्तन के दौर में यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है कि हमारी पहचान का मूल क्या है। मोहन भागवत जी के समन्वयवादी दृष्टिकोण और सावरकर जी के वैचारिक प्रतिपादन को समाहित करते हुए यह कहा जा सकता है कि हिंदुत्व भारत की आत्मा का प्रतीक है- एक ऐसी पहचान जो सहिष्णुता, कर्तव्यबोध, राष्ट्रनिष्ठा और सांस्कृतिक गौरव पर आधारित है। अतः ”भारत स्वभाव से हिन्दू राष्ट्र है“ का आशय किसी विभाजनकारी विचार से नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक सततता से है, जिसने इस राष्ट्र को हजारों वर्षों से जीवंत, जाग्रत और विश्वमानवता के लिए मार्गदर्शक बनाए रखा है।
इस प्रकार हिन्दुत्व शब्द का व्यापक दार्शनिक और सांस्कृतिक अर्थ उस सनातन परंपरा का प्रतीक है जो वेदों, उपनिषदों, पुराणों, आचार-संहिताओं, दर्शन-शास्त्रों और लोक-जीवन में समान रूप से स्पंदित होती है।
ऋग्वेद में उद्घोष है-”एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।“ (सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक रूपों में कहते हैं।)
यह श्लोक हिन्दुत्व के मूल भाव को उद्घाटित करता है विविधता में एकता, मतभेद में भी समरसता। हिन्दुत्व किसी एक मत का आग्रह नहीं करता, बल्कि सत्य की खोज के विविध मार्गों को स्वीकार करता है।
उपनिषद में मानव-एकता का जो दर्शन है, वह हिन्दुत्व की आत्मा है
”ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।“ (इस जगत में जो कुछ भी है, सबमें ईश्वर का वास है।)
जब सम्पूर्ण सृष्टि में ईश्वर-दर्शन हो, तब विभाजन का स्थान कहां रह जाता है? यही दृष्टि भारत के सांस्कृतिक जीवन की आधारशिला है। इतिहास के उतार-चढ़ाव, आक्रमणों और राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद भारत की सांस्कृतिक पहचान अक्षुण्ण रही। इसका कारण कोई राजसत्ता नहीं, बल्कि हिन्दुत्व की वह जीवन-शैली है जो समाज की नस-नस में प्रवाहित होती रही।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ”स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्माे भयावहः।“ (अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, परधर्म भय देने वाला है।)
यहाँ ”धर्म“ का अर्थ संकीर्ण धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि अपने स्वभाव, अपने कर्तव्य और अपने सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति निष्ठा है। भारत ने अपने ”स्वधर्म“ को कभी नहीं छोड़ा, इसलिए उसकी आत्मा अमर रही।
राष्ट्र केवल राजनीतिक सीमा नहीं होता। राष्ट्र का निर्माण साझा स्मृतियों, परंपराओं, प्रतीकों, महापुरुषों और सांस्कृतिक मूल्यों से होता है। भारत में यह सूत्र हिन्दुत्व ने प्रदान किया।
”जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।“
यह भाव वाल्मीकि रामायण में व्यक्त हुआ है। मातृभूमि को स्वर्ग से भी महान मानना यह राष्ट्र-भाव हिन्दुत्व की देन है। यही कारण है कि भारत की माटी, नदियां, पर्वत, वन सब पूज्य माने गए। गंगा केवल नदी नहीं, ”माँ“ है; हिमालय केवल पर्वत नहीं, ”देवाधिदेव“ का प्रतीक है।
हिन्दुत्व का एक महत्वपूर्ण आयाम है-सहिष्णुता और समन्वय। भारत ने शताब्दियों से विविध पंथों, भाषाओं और संस्कृतियों को आश्रय दिया। यह भूमि पारसियों, यहूदियों, बौद्धों, जैनों, सिखों और अनेक सम्प्रदायों का सुरक्षित आश्रय-स्थल रही।
”सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।“
यह प्रार्थना किसी एक समुदाय के लिए नहीं, समस्त मानवता के लिए है। यही सार्वभौमिक दृष्टि हिन्दुत्व को वैश्विक बनाती है। इसी भाव को ‘स्वामी विवेकानन्द’ ने विश्व के मंच पर प्रतिध्वनित किया। 1893 में धर्म संसद में उनका उद्घोष -”सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका“ भारत की सार्वभौमिक हिन्दू चेतना का परिचायक था। उन्होंने कहा कि भारत ने विश्व को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का संदेश दिया है।
हिन्दुत्व केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली है प्रकृति के प्रति सम्मान, परिवार-केन्द्रित सामाजिक संरचना, आश्रम-व्यवस्था, पुरुषार्थ- चतुष्टय (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) और कर्म के सिद्धांत पर आधारित दृष्टिकोण।
”कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।“ -भगवद्गीता
यह कर्मयोग का सिद्धांत भारत के सामाजिक जीवन में गहराई से रचा-बसा है। कर्तव्य-निष्ठा, परिश्रम और परिणाम के प्रति अनासक्ति ये गुण राष्ट्र को स्थायित्व प्रदान करते हैं।
भारत में सैकड़ों भाषाएं, अनेक वेश-भूषाएं, भिन्न-भिन्न परंपराएं हैं; फिर भी एक अदृश्य सूत्र सबको जोड़ता है। वह सूत्र है सांस्कृतिक हिन्दुत्व।
उत्तर में काशी की आरती, दक्षिण में रामेश्वरम् का तीर्थ, पूर्व में पुरी की रथयात्रा और पश्चिम में द्वारका का तीर्थ ये सब एक ही सांस्कृतिक चेतना के विविध रूप हैं। यह भौगोलिक विविधता नहीं, आध्यात्मिक एकता का प्रमाण है।
”आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।“ - ऋग्वेद
(चारों दिशाओं से शुभ विचार हमारे पास आएं।)
यह उदारता भारत की पहचान है। हिन्दुत्व बाहरी विचारों से भयभीत नहीं होता; वह उन्हें आत्मसात कर अपनी शक्ति में परिवर्तित करता है।
हिन्दुत्व स्थिर नहीं, गतिशील है। समय-समय पर संतों और महापुरुषों ने समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया। भक्ति आंदोलन से लेकर सामाजिक सुधार आंदोलनों तक, हिन्दू समाज ने आत्मशुद्धि की प्रक्रिया अपनाई।
आज जब वैश्वीकरण की आंधी में अनेक राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक पहचान खो रहे हैं, भारत अपनी जड़ों से जुड़े रहने के कारण दृढ़ खड़ा है। योग, आयुर्वेद, ध्यान, भारतीय दर्शन ये सब विश्व में सम्मानित हो रहे हैं। यह पुनर्जागरण हिन्दुत्व की जीवंतता का प्रमाण है।
”धर्माे रक्षति रक्षितः।“
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
यदि भारत अपनी सांस्कृतिक आत्मा हिन्दुत्व की रक्षा करेगा, तो वही आत्मा उसे वैश्विक नेतृत्व की दिशा में अग्रसर करेगी।
कुछ लोग हिन्दुत्व को संकीर्ण या बहिष्कारी विचारधारा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। परंतु उसके मूल ग्रंथों और ऐतिहासिक आचरण को देखें तो स्पष्ट होता है कि हिन्दुत्व का मूल स्वर समावेशी है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब इसे राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है। वस्तुतः हिन्दुत्व किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान के पक्ष में है।
”वसुधैव कुटुम्बकम्।“ -महाउपनिषद्
(समस्त पृथ्वी एक परिवार है।)
यह आदर्श संकीर्णता का नहीं, विश्वबंधुत्व का प्रतीक है।
भारत का ‘शाश्वत स्व’ - उसकी आत्मा है, और वह आत्मा हिन्दुत्व में प्रतिबिंबित होती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुसांगिक संगठन ‘प्रज्ञा प्रवाह’ के राष्ट्रीय संजोजक श्रीमान मा. जे. नन्द कुमार जी अपने लेख ‘स्व से साक्षत्कार’ में स्वत्व की परिभाषा देते हुए लिखते हैं कि- ‘अगर भारत के स्वत्व को सांस्कृतिक शब्दावली में संबोधित करना है या फिर सभ्यतागत तरीके से इसका सही चित्रण करना है, तो उसके लिए ‘हिंदुत्व’ सही शब्द होगा’।
यह हिन्दुत्व किसी एक पूजा-पद्धति का नाम नहीं, बल्कि जीवन की उस समग्र दृष्टि का नाम है जिसमें अध्यात्म, नैतिकता, कर्तव्य, सहिष्णुता, समन्वय और राष्ट्रप्रेम का अद्भुत संगम है।
जब हम कहते हैं ”हिन्दुत्व ही भारत का स्व“, तो उसका आशय है -भारत की सांस्कृतिक चेतना, उसकी ऐतिहासिक निरंतरता और उसकी आध्यात्मिक दृष्टि का सम्मान। यही वह आधार है जिस पर भारत ने अतीत में विश्व को मार्ग दिखाया और भविष्य में भी दिखा सकता है।
अंत में, बृहदारण्यक उपनिषद् से उद्धरत एक प्रार्थना
‘ॐ असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय’ अर्थात् है ईश्वर, मुझे असत्य (भ्रम/बुराई) से सत्य (ज्ञान) की ओर ले चलो, अंधकार (अज्ञान) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर ले चलो, और मृत्यु से अमरता (आत्म-साक्षात्कार/मोक्ष) की ओर ले चलो।
इसी ज्योति की ओर अग्रसर भारत का आत्मस्वर हिन्दुत्व सदैव अमर, अजर और अटल रहेगा। यही भारत का स्व है, यही उसकी शक्ति, और यही उसका वैश्विक संदेश।
लेखिका किसान पी.जी. कॉलेज, सिंभावली (हापुड़) चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के अंग्रेजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर है।




