राष्ट्र आराधना की प्रेरणा देते संघ गीत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदू समाज को संगठित कर उसे शक्तिशाली, सामर्थ्य संपन्न बनाना चाहता है। संघ का कार्य एक सार्वजनिक कार्य है। संघकार्य की चेतनाशक्ति उसके कार्यकर्ता अर्थात स्वयंसेवक हैं। प्रतिदिन लगने वाली शाखा उसकी कार्यपद्धति है जिसकी पांच विशेषताएं हैं। पहली दैनिक, दूसरी एक घंटे का कार्यक्रम, तीसरी सर्व दूर, चौथी सभी के लिए और पांचवीं सामान्य कार्यक्रम। प्रयास यह होता है कि जहां हिंदू हो वहां शाखा लगे। कहीं पर भी जाइए वहां शाखा हो सकती है। कार्यकर्ता इन्हीं शाखाओं पर तैयार या उत्पादित होते हैं। संघ स्थान की मिट्टी में कार्यकर्ताओं की फसल उगती है। यह कार्यकर्ता समूह में कार्य करने वाला होता है। इस कार्यपद्धति को व्यक्ति निर्माण की संज्ञा मिली है।60 मिनट की सुनियोजित शाखा में शक्ति की उपासना, अनुशासन, विजिगीषु वृत्ति और देशभक्ति की भावना स्वयंसेवक में विकसित होती है। वह एक सज्जन शक्ति का समुच्चय बन कर उभरता है। शाखा में योग, सूर्यनमस्कार, दौड़, दंड प्रहार, प्राथमिक समता, खेलकूद, देशभक्ति के गीत, अमृत वचनों के साथ मातृभूमि की प्रार्थना की जाती है। संघ के गीत राष्ट्र आराधना की प्रेरणा देते हैं। ये गीत संदेशयुक्त प्रेरणादायी और हृदयग्राही होतें है। शब्द इतने सरल, स्पष्ट, मन को छूनेवाले होते हैं तथा सामूहिक गायन के रूप में गाते-गाते हृदय में भावना भर कर कभी-कभी आंसू भी छलका देते हैं। इसकी एक ही धुन होती है जो जय-जय भारत के अर्थ समेटे होती है। समूहगान होने से हर कार्यकर्ता इसको निःसंकोच भाव से स्वतः गाना, गुनगुनाना सीख जाता है। उच्चस्वर में वह बेझिझक होकर गाने लगता है। धीरे-धीरे वह सबके सामने खड़े होकर सबके सामने गाता और गाते हुए दूसरों को अनुसरण कराना सीख जाता है। यह गीत कौन लिखता है, कब लिखता है, कहां लिखता है, यह पता ही नहीं चलता है क्योंकि रचनाकार स्वयंसेवक व प्रचारकों में से ही होते है परंतु वे कभी भी अपना नाम उजागर नहीं करते या कहिये की वे श्रेय नहीं लेना चाहते हैं। इन गीतों में देशप्रेम की अभिव्यक्ति, मातृभूमि से गहरा प्रेम, सम्मान, समर्पण, त्याग और बलिदान की भावना भरी होती है। इन गीतों को गणगीत कहा जाता है। कुछ स्वयंसेवक जिनका स्वर बहुत अच्छा होता है वे अभ्यास कर के संघ उत्सवों या विशेष अवसरों पर मुख्य वक्ता के भाषणों, जिन्हें संघ में बौद्धिक कहा जाता है, के ठीक पहले भाव उत्पन्न करने, श्रोताओं को एकाग्र करने तथा वक्ता कें लिए मार्गदर्शक विंदु या प्रस्तावना के रूप में एकल गीत के रूप में भी गाये जातें हैं। यह गीत कोरस नहीं होता। इस गीत को एक स्वयंसेवक ही पूर्ण आत्मविश्वास के साथ व्यवस्थित अभ्यास के बाद बिना किसी पार्श्व संगीत के गाता है। उल्लेखनीय है कि संघ के किसी गीत में किसी भी प्रकार के वाद्यसंगीत के उपकरणों का प्रयोग नहीं किया जाता है। सभी गीत सुर, ताल, लय, छंद एवं संगीत की शास्त्रीय पद्धतियों से युक्त होते हैं। संघ गीत भारतवर्ष में बोली जाने वाली सभी भाषाओं में लिखे और गाए जातें हैं और देश - विदेश की सभी शाखाओं पर सब भारतीय भाषाओं के गीत गाये और दुहराए जातें है। संस्कृत और हिंदी के गीत अधिकांश संख्या में सभी भाषा-भाषी प्रदेशों के स्वयंसेवक निश्छल भाव से गाते मिल जाएंगे। स्वयंसेवकों के अंदर स्वाभाव से ही भाषा, प्रांत, जाति, क्षेत्रीयता का भेद संस्कारवश नहीं पनपने पाता तथा वे अपने अंदर सभी भाषाओं के प्रति आदर और प्रेम की भावना स्वभाववश रखने लगते हैं।
सामान्यतः संघ गीतों को मातृ-वंदना, राष्ट्र-अर्चना, केशव माधव वंदन, पथ संचलन गीत, सहगान, एकल गान, जनजागरण का शंखनाद करते गीत, संघ उत्सवों के भाव अनुरूप गीत तथा प्रासंगिक एवं विविध गीतों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। संघ गीत जहां राष्ट्रीय एकता और अखंडता का संदेश देते हैं वहीं यह जाति, धर्म भाषा के उपर राष्ट्रीय एकता को महत्व देते हैं। उत्साह और प्रेरणा के साथ-साथ जनमानस में साहस, जोश, कर्तव्यबोध, गौरवशाली इतिहास, भारतीय संस्कृति, स्वर्णिम अतीत, संघर्ष और हिंदू उपलब्धियों का चित्रण भी करते हैं। संघ गीतों की सरल प्रभावशाली भाषा ओजपूर्ण राष्ट्रीयता का संदेश देने वाली होती है। यह स्वयंसेवकों और सामान्य जनमानस में नैतिक मूल्यों का संचार करने के साथ-साथ उनमें सत्य, साहस, कर्तव्य, अनुशासन, सेवा, राष्ट्रीय भावना, जिम्मेदारी की भावना जैसे आदर्शों को मजबूत बनाने में सहायक सिद्ध हुई हैं। संघ के सौ वर्षों की यात्रा में इन गीतों ने पाथेय बनने के साथ-साथ राष्ट्र जागरण का अनुपम कार्य किया है।
पूरे विश्व में संघ की शाखाओं पर प्रतिदिन परमपवित्र तत्वज्ञान के रूप में गुरु स्थान पर विराजित भगवा ध्वज के समक्ष आज जो प्रार्थना संस्कृत भाषा में गायी जाती है वह 1925 में पहले मराठी और हिंदी में गायी जाती थी। वह प्रार्थना संघ स्थापना के 14 वर्ष बाद फरवरी 1939 में नागपुर के सिंदरी बैठक में डा. बाबा साहेब आप्टे, बालासाहेब देवरस, अप्पाजी जोशी तथा नानासाहेब टालातुले की उपस्थिति में नरहरि नारायण भिड़े द्वारा संस्कृत भाषा में रूपांतरित किया गया जो 23 अप्रैल 1940 में पुणे के संघ शिक्षा वर्ग में यादवराव जोशी द्वारा गाया गया। इसमें कुल तीन श्लोक में तेरह पंक्तियां हैं जिसकी अंतिम पंक्ति हिंदी भाषा में भारत माता की जय से पूर्ण होता है। इसका प्रथम श्लोक भुजंग प्रयात छंद में रचित है जिसमें मातृवंदना की गई है। द्वितीय एवं तृतीय श्लोक मेघ निर्घाेष छंद में रचित है। द्वितीय श्लोक में ईश्वर से अजेय शक्ति, सुशीलता, ज्ञान, वीरव्रत और अक्षय धेययनिष्ठा जैसे पाँच गुणों की माँग की गई है। तृतीय श्लोक में ध्येय की पूर्ति का मार्ग प्रशस्त करने की प्रार्थना की गई है। इस प्रार्थना को अभी हाल में ही स्वप्रेरणा से सुमधुर संगीत में पिरो कर वाद्य यंत्रों की ध्वनि के साथ प्रसिद्ध फिल्मी जगत के संगीतकार एवं गायक शंकर महादेवन नें बड़ी सावधानी के साथ उसी स्वर में गाने का प्रयास किया है जैसी प्रार्थना सस्वर स्वयंसेवक संघस्थान पर गाते हैं। सोशल मीडिया पर यह प्रार्थना गीत बहुत प्रसारित भी हुआ है। कुछ संघ गीतों का सहजरूप में टीवी चैनलों के लिए बनाई गई फिल्मों में भी प्रयोग सामयिक संदर्भों के उपयोगिता की दृष्टि से किया गया है जो संघ गीतों के महत्व का प्रतीक है जैसे उदाहरण स्वरूप प्रसिद्ध टीवी सीरियल ”चाणक्य“ में एक पुराने संघ गीत ”हम करें राष्ट्र आराधन, तन से मन से धन से, तन मन धन जीवन से“ को तक्षशिला के छात्रों द्वारा भगवा ध्वज हाथ में लहरा कर गाते हुए दर्शाया गया है। कदाचित जब इस सीरियल का प्रोमो दूरदर्शन को सीरियल के निर्देशक चंद्र प्रकाश द्विवेदी द्वारा आगे के एपिसोड फिल्माने की स्वीकृति के लिए जमा किया गया तब उस समय की तत्कालीन नरसिंहाराव सरकार के अधीन दूरदर्शन नें बिना कारण बताए बहुत दिनों तक स्वीकृति से रोक दिया था। विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने तब नरसिंहाराव जी से व्यक्तिगत रूप से मिलकर फिल्म प्रोमो को देखने और राष्ट्रीय और सांस्कृतिक महत्व के होने के कारण स्वीकृति देने की तथा अस्वीकृति की दशा में राष्ट्रव्यापी आंदोलन करने की बात कही थी। अनुरोध को स्वीकार कर नरसिंहाराव जी ने दूरदर्शन से मंगाकर प्रोमो को देखा तथा कोई आपत्तिजनक विषयवस्तु को न पाकर आगे की फिल्मांकन की अनुमति प्रदान कराई। बाद में जब पूरी फिल्म बन कर प्रदर्शित हुई तो रामायण महाभारत सीरियल के बाद सबसे लोकप्रिय सीरियल सिद्ध हुई और संदर्भित संघ गीत भी दर्शकों में बहुत लोकप्रिय हुआ।
संघ शाखाओं पर गाये जाने वाले अनेक गीत हैं जो राष्ट्र के लिए जीने की प्रेरणा देतें हैं यथा - ”धर्म के लिए जियें समाज के लिए जियें। ये धड़कने ये श्वास हो पुण्यभूमि के लिए। कर्म भूमि के लिए “।। इसी प्रकार का दूसरा गीत है - ”आर्य भूमि में गूंज उठा फिर जन-जन का आह्वान । भरत भूमि के साथ विश्व का करना है कल्याण। जागे वीर जवान-जागे वीर जवान ।।“ एक अन्य गीत है - ”एक संस्कृति एक धर्म है, एक हमारा नारा। एक भारती की संतति हम, भारत एक हमारा“ ।। इसी प्रकार यह गीत भी बहुत लोकप्रिय था ”नमन है इस मातृभू को, विश्व का सिरमौर भारत। तप तपस्या साधना का, शौर्य का परिणाम भारत ।।“ जीवन पुष्प चढ़ायेंगे, माँ की ज्योति जगायेंगे। माँ की रक्षा हित हम शत-शत, हिंदू बलि हो जाएँगे।।
सामाजिक समरसता को प्रेरित करता यह गीत बहुत प्रसिद्ध है- पथ का अंतिम लक्ष्य नहीं सिंहासन चढ़ते जाना, सब समाज को लिए साथ में, आगे है बढ़ते जाना।। इसी प्रकार का एक गीत है- हिन्दु जगे तो विश्व जगेगा, मानव का विश्वास जगेगा। भेद भावना तमस हटेगा, समरसता अमृत बरसेगा।। संस्कृत भाषा में एक गीत सबको स्मरण होगा - मनसा सततम स्मरणीयम, बचसा सततम वदनीयम। लोकहितम मम करणीयम ।। एक गीत जो बचपन में शरीर में रक्तसंचार को बढ़ा देता था - रक्त शिराओं में राणा का, रह-रह आज हिलोरें लेता। मातृभूमि का कण-कण तृण-तृण हमको आज निमंत्रण देता ।। दूसरा गीत है- यह हिमालय सा उठा, मस्तक न झुकने पाएगा। रोक दूँगा मैं प्रभंजन, जो प्रलय के गीत गाता।। पंजाबी भाषा का एक गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था -पिता वारया ते लाल चारे वारे, ओ हिन्दु तेरी शान बदले। जन्म गुरांदा पटने साहिबदा, आनंदपुर डेरा लाया, ओ हिंदु तेरी शान बदले।
संघ गीत की अनेकों शृंखलाएं हैं जिनको सुनते गाते हम संस्कारित हुए हैं। भावी पीढ़ी नए तकनीकी से दृश्य श्रव्य माध्यम से इन गीतों को देखेगी, सुनेगी और प्रेरणा लेगी ।




