सिपाही बनी ‘स्कूल वाली दीदी’ बदली बच्चों की तकदीर
वर्दी का रिश्ता आमतौर पर कानून, अनुशासन और सुरक्षा से जोड़ा जाता है, लेकिन रामपुर के खजुरिया थाने में तैनात महिला आरक्षी अमृता भूषण ने खाकी का एक ऐसा मानवीय चेहरा सामने रखा है, जिसने ग्रामीणों के बीच पुलिस की छवि को एक नई पहचान दी है। कोई उन्हें महिला आरक्षी कहता है तो कोई ‘स्कूल वाली दीदी’। अमृता ने शिक्षा से वंचित बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने को अपने जीवन का एक मिशन बना लिया है। वर्ष 2022 से खजुरिया थाने में तैनात अमृता भूषण ने अगस्त 2025 में मिशन शक्ति अभियान के तहत गांव मंसूरपुर की चौपाल से अपनी पहल शुरू की।
सिपाही अमृता भूषण का उद्देश्य साफ है। ऐसा कोई बच्चा न रहे जो किसी न किसी वजह से स्कूल जाने से वंचित हो। शुरुआत में उन्होंने तीन बच्चों को स्कूल में दाखिला दिलाया। इसके बाद आठ और बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा। गांव अहरों में आधार कार्ड न होने के कारण छह बच्चों का दाखिला अटका था। अमृता ने समस्या को बाधा मानने के बजाय उसका समाधान तलाशा और जरूरत पड़ने पर शपथपत्र बनवाकर इन बच्चों का भी विद्यालय में प्रवेश सुनिश्चित कराया।
अमृता का मानना है कि किसी बच्चे के हाथ में किताब होना केवल उसके भविष्य को नहीं बदलता, बल्कि पूरे परिवार की दिशा बदल सकता है। विशेष रूप से बेटियों की शिक्षा को वह सशक्तिकरण का सबसे मजबूत आधार मानती हैं। इसी सोच के साथ वह थाना क्षेत्र के गांवों में ऐसे बच्चों की पहचान कर रही हैं, जो आर्थिक, सामाजिक या दस्तावेजी कारणों से शिक्षा से दूर हैं। शिक्षा के साथ अमृता ने जरूरतमंद महिलाओं की समस्याओं को भी समझा। उन्होंने तीन महिलाओं की वृद्धावस्था और विधवा पेंशन शुरू कराने में मदद की। उनका प्रयास केवल सरकारी योजनाओं की जानकारी देने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पात्र लोगों को योजनाओं का लाभ दिलाने तक पहुंचा।
मेरठ की रहने वाली अमृता ने बीएड की शिक्षा प्राप्त की थी। वर्ष 2021 में पुलिस सेवा में आने के बाद उन्होंने वर्दी को केवल नौकरी नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी के रूप में देखा। पुलिस की ड्यूटी के साथ सामाजिक सरोकारों के लिए समय निकालना उनके लिए आसान नहीं है, लेकिन बच्चों की शिक्षा को लेकर उनका उत्साह उन्हें लगातार आगे बढ़ाता है।अब तक 17 बच्चों को स्कूल पहुंचाने वाली अमृता का लक्ष्य संख्या तक सीमित नहीं है। वह चाहती हैं कि उनके थाना क्षेत्र का हर बच्चा विद्यालय जाए और कोई भी बच्चा परिस्थितियों के कारण शिक्षा से वंचित न रहे। ग्रामीणों ने उन्हें प्यार से ‘स्कूल वाली दीदी’ नाम दिया है। पुलिस अधीक्षक अनिल कुमार सिंह भी उनके प्रयासों को मिशन शक्ति का अनुकरणीय उदाहरण मानते हैं। अमृता की कहानी यह बताती है कि वर्दी केवल कानून लागू करने की शक्ति नहीं देती, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के जीवन में बदलाव लाने का अवसर भी देती है। उनके लिए पुलिस की ड्यूटी थाने की चारदीवारी से आगे बढ़कर गांव की चौपाल और बच्चों के स्कूल तक पहुंच चुकी है।




