वर्षा की बूंदें जहां गिरें, वहीं रोक दें
संपूर्ण भारत में आज जल संकट बहुत जबरदस्त तरीके से गहराता जा रहा है। दिल्ली एनसीआर में समस्या और भी अधिक विकट हो गई है। हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने एक बार कहा था कि अगर हम नहीं सुधरे तो अगला विश्वयुद्ध जल को लेकर ही होगा। इसी क्रम में जल संरक्षण पर वरिष्ठ पत्रकार डॉ. अनिल कुमार निगम ने पद्मश्री उमाशंकर पांडेय से एक भेंटवार्ता के दौरान विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश -
खेत पर मेड़ और मेड़ पर पेड़ योजना क्या है? आपने किस तरीके से यह अभियान शुरू किया और वह किस स्थिति में है ?
जल संरक्षण का मेरा प्रयास पुरखों के जल संचय के जो बेजोड़ तरीके थे, उन्हीं को जागृत करना था। देश में खेत पर मेड़ और मेड़ पर पेड़ एक ऐसी विधि है जिसमें किसी प्रशिक्षण, नवीन ज्ञान अथवा किसी प्रकार के औजार की जरूरत नहीं है। बरसात के पूर्व अपना फावड़ा और डलिया लीजिए। खेत पर जाइए और सुबह मिट्टी अपने खेत की मेड़ पर रख कर अपने घर चले आइए। मिट्टी हमारी मां होती है। इससे मिट्टी और पानी दोनों नालों में बहने की जगह खेत में ही रह जाता है। मेड़बंदी से मेरा आशय यह है कि खेत पर मेड़ बनने के बाद उसके ऊपर पेड़ लगाइए। उस पर बड़े पेड़ों की जरूरत नहीं है, उस पर नींबू, सहजन, अमरूद, तुलसी, अथवा अन्य औषधीय पेड़ लगाए जा सकते हैं। यहां तक की अरहर की खेती से मिट्टी बंधी रहती है। यह एक ऐसी विधि है जो हर तीन साल में एक बार करनी पड़ती है। मेरा मानना है कि मैं अकेले नदी नहीं बना सकता, तालाब नहीं खोद सकता, बांध नहीं बना सकता और कुआं नहीं बना सकता लेकिन मैं अकेले मेड़बंदी अवश्य कर सकता हूं।
यह भी कहा जाता था कि बांदा में पानी मालगाड़ी से लाया जाता था। आपको कहां से प्रेरणा मिली कि बुंदेलखंड में जल संरक्षण के लिए काम करना चाहिए?
मेरी मां, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, उन्होंने मुझे जल संरक्षण के लिए काम करने की प्रेरणा दी। मैं जिस जखनी गांव से आता हूं, वहां 40 वर्ष पहले ना स्कूल थे, ना सड़क, ना बिजली, ना पानी और न आवागमन के साधन थे। सुविधाओं के अभाव में लोग गांव से पलायन कर रहे थे। मां बोली, यहां के निवासी पलायन कर जा रहे हैं। 98 घरों में ताले लगे हुए हैं। उन्होंने कहा कि अगर कुछ कर सकते हो तो मां से ज्यादा मातृभूमि के लिए करो। मैंने मां से सवाल किया कि मैं यह काम अकेले कैसे कर सकता हूं। मां ने कहा कि तुम साधना करो और जल को जगाओ, जल ही जगदीश है।
आपने जो बुंदेलखंड में काम किया, उससे क्षेत्र में किस प्रकार का परिवर्तन आया?
बिल्कुल सही, ‘प्रत्यक्षम किम प्रमाणम’ अर्थात प्रत्यक्ष को किसी प्रमाण की जरूरत नहीं होती। बुंदेलखंड में एक समय ऐसा आया कि राजनीतिक कारणों से दिल्ली से बुंदेलखंड पानी मालगाड़ी से भेजा गया। पानी प्रतिदिन मानिकपुर भेजा जाता था और लंबे समय तक यह चलता रहा। मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि जब खेत पर मेड़ और मेड़ पर पेड़ अभियान यहां शुरू किया तो सामुदायिक प्रयासों से इसमें काफी सफलता मिली। इससे फसल की पैदावार में बढ़ोतरी हुई। इसी के चलते वर्ष 2023 में उत्तर प्रदेश में किसानों से सर्वाधिक गेहूं बांदा मंडल में खरीदा गया, जिससे 75000 मीट्रिक टन गेहूं बुंदेलखंड ने सरकार को दिया। पहले इस इलाके में बासमती चावल की पैदावार नहीं होती थी। मैं 2003 में 25 किलो बासमती खरीदकर लाया और कुछ लोगों के प्रयास से हमने उसे लगाया और बासमती चावल का अच्छा उत्पादन शुरू कर दिया।
देश की राजधानी दिल्ली एवं एनसीआर में जल के साथ-साथ जमीन का भी संकट है, इसलिए गांव का जखनी मॉडल यहां नहीं चल सकता। ऐसे में यहां पर किस तरीके से जल संरक्षण किया जा सकता है?
वर्षा की बूंदे जहां गिरें, हम उनको वहीं पर रोक दें। निःसंदेह, गांव में पानी रोकने के लिए हमारे पास जमीन है, शहर में जमीन कम है लेकिन शहर में हम वाटर हार्वेस्टिंग कर सकते हैं। अध्ययन करें तो अगर हमारे पास 1500 वर्ग फीट का प्लॉट है तो 200 मिलीमीटर वर्षा होती है, दो लाख लीटर पानी बरसता है। यदि रेन वाटर हार्वेस्टिंग करते हैं तो दो लाख लीटर पानी बचाया जा सकता है। ऐसा करने से खेत का पानी खेत में, गांव का पानी गांव में, घर का पानी घर में, छत का पानी घर में और कुएं का पानी कुएं में रहेगा। दूसरा पानी का बेटा पेड़ है। एक पेड़ एक दिन में कई किलो कार्बन डाइऑक्साइड को लेता है। सात पेड़ अगर किसी व्यक्ति के घर में लगे हुए हैं, उससे उसका संपूर्ण जीवन सुखमय बन सकता है।
आपने ने जल संरक्षण के लिए जो काम किया है, वह आज एक अभियान बन गया है। क्या पानी को बचाने का प्रयास सरकार के सहयोग के बिना भी किया जा सकता है?
दिल्ली देश की राजधानी है। सत्ता के सबसे ताकतवर लोग यहां रहते हैं। संसद जो कानून बनाती है, वह पूरे देश में लागू होता है। देश का सुप्रीम कोर्ट भी यहीं स्थिति है। सर्वाेच्च अदालत का आदेश भी संपूर्ण देश के लिए नजीर बन जाता है। इतने महत्वपूर्ण स्थान पर रहने वाले लोगों को गर्व होना चाहिए। यहां के प्रत्येक निवासी को पानी बचाने में यथाशक्ति प्रयास अवश्य करना चाहिए। दैनिक जीवन के पानी को पीने के, नहाने और अन्य दैनिक क्रिया के लिए किफायती तरीके से प्रयोग करें और किचेन और बाथरूम के पानी को किस तरीके से रिसाइकल कर अधिक से अधिक इस्तेमाल किया जाए, इसके बारे में प्रयास करें। दिल्ली-एनसीआर के व्यक्तियों को पानी की बर्बादी रोकनी पड़ेगी। एक नदी के बराबर जो नाले बह रहे हैं, उनके पानी को रिसाइकल करना पड़ेगा। यह काम सरकार कर सकती है। लेकिन जल संरक्षण का जो कार्य जो सरकार कर रही है, वह उसे करने दीजिए। पानी को अगर भावी पीढ़ी को भी देना है तो इसके लिए आम लोगों को आगे आना होगा।
आज आपके मॉडल को सरकार भी अपना रही है। क्या इसी तरीके से आपकी अगली कोई योजना है जिसका लाभ संपूर्ण देश को मिले?
आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। मुझे भारत सरकार ने पद्म सम्मान दिया। पद्मश्री सम्मान मिलने के बाद मुझे देश के अनेक केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आईआईटी, आईआईएम सहित अनेक संस्थानों में जाने का सुअवसर मिला। पहले उत्तर प्रदेश सरकार खेत पर मेड़ और मेड़ पर पेड़ का मॉडल ग्राम पंचायतों के माध्यम से लागू करने के निर्देश दिए। उसके बाद भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय ने योजना बनाई कि हर गांव जखनी के मॉडल पर बने। प्रधानमंत्री ने पूरे देश के प्रधानों को पत्र लिखा कि खेत पर मेड़बंदी सहित परंपरागत तरीके से पानी को रोकें। सरकार की इस मुहिम के कारण मुझे उत्साह मिला और मेरा उत्साह बढ़ा। आज भी मेरा कोई एनजीओ नहीं है, कोई संस्था नहीं है, कोई कार्यालय नहीं है और कोई ऑफिस नहीं है। मैंने सरकार से एक रुपया अनुदान नहीं लिया है। आज भी मेरे गांव के घर में बिजली, पंखा, टीवी और कूलर नहीं है। फिर भी मैं गांव-गांव जाकर इस काम को आगे बढ़ा रहा हूं।
मेरी सरकार से अपील है कि देश में जल शक्ति विद्यापीठ की स्थापना की जाए। जल शक्ति विद्यापीठ के माध्यम से केजी से लेकर तक पीजी तक की कक्षाओं में पानी की पाठशालाएं चलाई जाएं। इससे युवा पीढ़ी को पानी की महत्ता का पहले से ही भान एवं ज्ञान होगा और वह पानी को बचाने को लेकर आजीवन संवेदनशील रहेगा।
सोशल मीडिया में सक्रिय रहने वाली हाईटेक युवा पीढ़ी को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
मैं भारत के 30 करोड़ युवाओं से अपील करना चाहूंगा कि वे पानी को बचाएं, पौधे लगाएं और वे स्वयं जलदूत बनें। दूसरों को प्रेरित भी करें, क्योंकि पानी बनाया नहीं जा सकता, लेकिन बचाया जा सकता है। पेड़ उगाया या बनाया नहीं जा सकता, पर पेड़ लगाया जा सकता है।




