नागरिकता के राष्ट्रीय रजिस्टर की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट और मुम्बई हाईकोर्ट के दो फैसलों ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) बनाने का रास्ता खोला है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की यह दलील मान ली है कि आधार कार्ड, वोटर आईकार्ड और आयकर का पेन कार्ड नागरिकता के प्रमाण पत्र नहीं है। वे नागरिकता के प्रमाण पत्र थे भी नहीं, लेकिन एनार्सी का विरोध करने वाला तबका इन दस्तावेजों को नागरिकता का प्रमाण पत्र मान लेने का दबाव बना रहा था। भारतीय संविधान के मुताबिक वोट का अधिकार भारतीय नागरिकों को ही मिल सकता है। लेकिन चुनाव आयोग की लापरवाही से कई सालों से इन दस्तावेजों के आधार पर ही वोटर बनाए जा रहे थे। वोटर आधार कार्ड को नागरिकता का विधाई दस्तावेज मान लिया गया था। यह अच्छा ही हुआ कि एडीआर नामक संस्था और विपक्षी दल इन दस्तावेजों को नागरिकता का प्रमाण पत्र मानने की दलीलों के साथ सुप्रीम कोर्ट गए थे। अब यह तय हो गया है कि जब सारे देश में वोटर लिस्टों का गहन पुनरीक्षण होगा, तो ये तीनों दस्तावेजों के आधार पर वोट नहीं बनेंगे। अगर चुनाव आयोग सख्त रहता है, और सारे देश में वोटर लिस्टों का शुद्धिकरण हो जाता है, तो आने वाले दिनों में वोटर आई कार्ड नागरिकता का दस्तावेज बन सकता है।
जब से मोदी सरकार ने घुसपैठियों को बाहर निकालने की मुहिम शुरू की है, तब से ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं कि घुसपैठियों ने रिश्वत दे कर ये दस्तावेज हासिल कर लिए हैं। एक मामला मुम्बई हाईकोर्ट में सामने आया, जब रिश्वत दे कर बनाए गए दस्तावेजों के आधार पर खुद को भारतीय नागरिक बनाने वाले बांग्लादेशी घुसपैठिए बाबू अब्दुल रूफ सरदार को हाईकोर्ट ने जमानत देने से इनकार कर दिया। मुम्बई हाईकोर्ट के जज जस्टिस अमित बोरकर ने कहा ये सब दस्तावेज सिर्फ पहचान का प्रमाण हैं, भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत नागरिकता के सबूत नहीं हैं।
राष्ट्रव्यापी एनआरसी 1951 की जनगणना के बाद 1951 में ही बनाया गया था। इसके बाद एनआरसी को अपडेट नहीं किया गया। जवाहर लाल नेहरू और उनके बाद की सरकारों को इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार मानना गलत नहीं होगा। इस समय सिर्फ असम में ही ऐसा राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर है, जिसे 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य और निगरानी में रखा था। एनआरसी के लिए नोडल एजेंसी महापंजीयक और जनगणना आयुक्त हैं। असम में एनआरसी लागू होने के बाद से, इसके पूरे देश में लागू करने की मांग जोर पकड़ रही है।
अवैध घुसपैठियों के कारण नागरिकता सत्यापन की जरूरत महसूस की जा रही है। गृह मंत्रालय के हलफनामे में एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया है जिसमें कहा गया है कि 1964 और 1965 के बीच 4.5 लाख से ज्यादा लोग बिना यात्रा दस्तावेजों के पूर्वी पाकिस्तान से भारत आए। 1946 का विदेशी अधिनियम, अवैध घुसपैठियों को निष्कासित करने का अधिकार देता है। यह कानून अवैध घुसपैठियों का पता लगाने की सरकार की जिम्मेदारी और उन्हें निष्कासित करने की कानूनी जिम्मेदारी को दर्शाता है। अवैध घुसपैठियों के कारण पश्चिमी बंगाल, मणिपुर और असम में हिंसा की घटनाएं और उत्तर भारत के राज्यों में अपराध की घटनाएं बढ़ी हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ भारतीय नागरिकों को ही मिले, यह सुनिश्चित करने के लिए भी एनआरसी की जरूरत है।
पश्चिम बंगाल और असम जैसे कुछ राज्यों में, ऐसी चिंताएं बरकरार हैं कि अवैध घुसपैठ के कारण मूल निवासियों का विस्थापन हो रहा है। एनआरसी को इन चिंताओं का समाधान करने और मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा करने के एक उपाय के रूप में भी देखा जा रहा है। अनुमान यह है कि असम की 2.6 करोड़ की आबादी में से लगभग 60 लाख घुसपैठिए हैं, जिससे सामाजिक-राजनीतिक मुश्किलें पैदा हुई हैं। असम में लगातार घुसपैठ बढ़ने के खिलाफ ही 1978 में छात्र आन्दोलन शुरू हुआ था, जिसके नतीजे में राजीव गांधी ने 1985 में एतिहासिक समझौता हुआ, इस समझौते में 24 मार्च, 1971 के बाद आए अवैध प्रवासियों की पहचान करने और उन्हें अधिकारों से वंचित करने का वादा किया गया था। उसी समझौते के आधार पर असम में नागरिकता रजिस्टर बना।
सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि 31 अगस्त 2019 तक असम में एनआरसी की प्रक्रिया पूरी की जाए। इसके बाद असम और देश में भाजपा सरकारें आ गई और मुसलमानों ने एनआरसी का विरोध करना शुरू कर दिया, उनके समर्थन में विपक्षी दलों ने भी एनआरसी का विरोध शुरू किया हुआ है। असम सरकार ने 31 अगस्त, 2019 को एनआरसी का ड्राफ्ट जारी किया था, जिसमें 19 लाख से ज्यादा लोगों के नाम नहीं थे, जो लगभग सारे ही बांग्लादेशी मुसलमान थे, हालांकि उन्हें अपना नागरिकता साबित करने के लिए चार महीने का समय दिया गया था, वे चाहें तो विदेशी न्यायाधिकरणों और हाईकोर्ट या सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा खटखटा कर अपनी नागरिकता साबित कर सकते हैं, जिसके लिए उन्हें दिखाने पड़ेगा कि उनके पूर्वज 24 मार्च 1971 से पहले भारतीय नागरिक थे।
इसी बीच दिसंबर 2019 में मोदी सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून पास करवा लिया, जिसमें बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में प्रताड़ना सह रहे हिन्दुओं, सिखों, बोद्धों, ईसाईयों को भारत की नागरिकता देने में प्राथमिकता देने का प्रावधान था। इस कानून में उन देशों के मुसलमानों या भारतीय मुसलमानों के लिए किसी तरह का कोई प्रावधान नहीं थी, लेकिन नागरिकता संशोधन कानून को मुस्लिम विरोधी कह कर प्रचारित किया गया। भारत के मुसलमानों ने नागरिकता संशोधन कानून को मुसलमानों से भेदभाव करने वाला बताकर देश भर में हिंसक आन्दोलन किया, जिसे विपक्षी दलों ने भी समर्थन दिया। नागरिकता संशोधन कानून के बाद से देश भर के मुसलमान और विपक्षी दल नागरिकता रजिस्टर का भी विरोध कर रहे हैं, जबकि नागरिकता रजिस्टर के विरोध का कोई आधार नहीं बनता।
विपक्षी दल और 15 अगस्त 1947 के बाद भारत में रह गए मुसलमान स्वधर्मी होने के कारण घुसपैठियों की भी वकालत कर रहे हैं, उनके साथ ही कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी भी मानवाधिकार के नाम पर अवैध घुसपैठियों की वकालत और एनआरसी का विरोध कर रहे हैं। जिस कारण देश भर में एनआरसी को लागू करना कई चुनौतियों से भरा हो गया है, मोदी सरकार ने देश में एनआरसी लागू करने की मंशा ही नहीं जताई, बल्कि प्रतिबद्धता भी दर्शाई है, लेकिन विरोधों के बावजूद देश को नागरिकता रजिस्टर तो बनाना ही पड़ेगा। अच्छी बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट एनआरसी का समर्थन करती है, और हाल ही के अपने फैसलों में अदालतों ने आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण पत्र मानने से इनकार किया है।




