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इतिहास

हिन्दू प्रतिरोध का सूर्य, महाराणा प्रताप

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हिंदू प्रतिरोध का सूर्य, महाराणा प्रताप

रक्त की आखिरी बूंद तक बहा दी पर मुगलों के सामने घुटने नहीं टेके

भारतीय इतिहास का मध्यकाल मध्य एशिया से आए आक्रांताओं से हिंदुओं के संघर्ष का काल कहा जा सकता है। भारतीय इतिहास में मुगल काल को वामपंथी इतिहासकार इस तरह से प्रस्तुत करते हैं कि मानो यही भारत का इतिहास है। आजाद भारत में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की समाजवादी नीतियों के चलते वामपंथी विचारधारा इतिहास पर सवार हो गई। आक्रांताओं के इतिहास को भारत भूमि का इतिहास बनाने के तमाम छल-प्रपंच हुए, सेमी-फिक्शन जैसे इतिहास लिखे गए। होता भी क्यों न। जिस देश का प्रथम प्रधानमंत्री ही आर्यवृत्त में आर्यों को विदेशी साबित करने पर तुला हो, पहला शिक्षा मंत्री बाकायदा शिक्षित न होकर इस्लामिक किताबों से साक्षर हुआ हो, यह तो होना ही था। 


हिंदुओं के हर स्वाभिमान बिंदु को जितनी चोट इस्लामिक आक्रांताओं ने पहुंचाई, उससे किसी भी मायने में कम चोट नेहरू और उनके चेले इतिहासकारों ने नहीं की। यह बार-बार साबित करने की कोशिश की गई कि इस्लामिक आक्रांताओं ने भारत को जीता था। पढ़ाया जाता रहा कि मुगलों का पूरे भारत पर राज था। जबकि यह पूरा कालखंड हिंदू प्रतिरोध का काल था। कहीं राणा सांगा लड़ रहे थे, तो कहीं रानी दुर्गावती। कहीं क्षत्रपति शिवाजी की तलवार चमक रही थी, तो कहीं लचित बोरफुकन औरंगजेब के तुर्क लड़ाकों को खदेड़ रहे थे। हर समय, हर काल में कहीं न कहीं हिंदू प्रतिरोध खड़ा था और ये पूरा कालखंड मुगलों के शासन का नहीं, हिंदुओं की आठ सौ साल तक चली जंग का था। 

इस सदियों में लंबे युद्धकाल में यदि कोई सबसे मजबूत प्रतिरोध बिंदु उभरता है, जिसने आज तक आक्रांताओं के खिलाफ हिंदू जनमानस को दृढ़ता से खड़े रहने की प्रेरणा दी, तो वह महाराणा प्रताप का कालखंड है। एक मजहबी, अपने गुरू की हत्या कर उसकी पत्नी का अपहरण कर लेने वाले, मीना बाजार में महिलाओं के कपड़े पहनकर जाने वाले, वहां से हिंदू लड़कियों का अपहरण करने वाले अकबर को वामपंथी इतिहासकारों ने महान बनाने में कोई कसर न छोड़ी। बार-बार उसके नाम के साथ महान सिर्फ इसलिए जोड़ा गया कि किसी प्रकार महाराणा प्रताप का विराट व्यक्तित्व, उनका अदम्य संघर्ष, हिंदू समाज के हर वर्ग को जोड़कर अनवरत संघर्षरत की रहने की जिजीविषा पूरे मुगल वंश की कहानियों पर भारी न पड़ जाए। 


पर प्रताप की शौर्य गाथा उस पूरे कालखंड पर भारी है। मध्यकाल का अगर भारत का नक्शा आप देखेंगे, तो उस पर छाए इस्लामिक हरे परचम के बीच में सिर उठाए खड़ा एक भगवा बिंदू आपको नजर आएगा। वह है मेवाड़। उदयपुर से लेकर कुंभलगढ़ तक का क्षेत्र। जो चारों ओर से जिहादी इस्लामिक शासन से घिरा था। लेकिन जिसने रक्त की आखिरी बूंद तक बहा दी, मुगलों के सामने घुटने नहीं टेके। जरा ध्यान दीजिएगा, अकबर के फतहनामा में लिखा है- अकबर ने मेवाड़ पर हमला इसलिए किया क्योंकि वहां के काफिर हिंदू राजा ने मुगलराज के तहत इस्लामिक श्रेष्ठता को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। अकबर का एक ही सपना था। वह पूरे हिंदुस्तान पर इस्लामिक हुकूमत चाहता था। उसकी राह में बस एक ही रोड़ा था, महाराणा प्रताप। 


1572 में जब महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक हुआ, तो चितौड़ में कोई किला नहीं था। 1568 में अकबर चार महीने तक मेवाड़ की घेराबंदी की, जिसमें किला नेस्तानाबूद हो गया। महज 8000 वीर राजपूत मुगलों की पचास हजार से अधिक की फौज के सामने चार महीने तक डटे रहे। साढ़े सात हजार किलो बारूद इस किले की दीवारों को गिराने के लिए खपा दिया गया था। ये जंग छह महीने चली। आपको अकबर की महानता बताते हैं। महाराणा के परिवार में जो मर्द थे उन्होंने साका (मौत तक जंग) किया और महिलाओं ने जौहर कर लिया। मेवाड़ पर कब्जे के बाद वामपंथियों के प्रिय महान अकबर ने कत्ल-ए-आम का आदेश दिया। तीस हजार हिंदुओं को मुगलों ने गाजर-मूली की तरह काट फेंके। फतहनामा में लिखा गया है कि हर ओर सिर्फ लाशें और खून था। इस खूनी मंजर में बदला लेने और तुर्कों को अपनी भूमि पर पैर तक न रखने देने के प्रण से सराबोर एक युवा भी था, जो युवराज प्रताप था। 


प्रताप अपने पिता की वारिस के तौर पर स्वाभाविक पसंद नहीं थे। पिता राणा उदय सिंह की कुल 33 संतानें थी। महाराणा प्रताप का मेवाड़ के कुंभलगढ़ में जन्म 9 मई 1540 को हुआ था। वे उदय सिंह द्वितीय और महारानी जयवंता बाई के सबसे बड़े बेटे थे। छोटी रानी के पुत्र जगमल को उदय सिंह ने राजतिलक के लिए चुना। लेकिन मेवाड़ के सरदारों को ये फैसला पसंद नहीं आया। अकबर के कत्ल-ए-आम से सहमे-बिखरे मेवाड़ को प्रताप की जरूरत थी। मेवाड़ के सरदारों ने प्रताप, को राणा प्रताप बना दिया। राणा सांगा, राणा कुंभा, राणा उदय सिंह, समेत आपको तमाम नाम इतिहास में पढ़ने को मिलेंगे, लेकिन महाराणा उपाधि एक ही को मिली। वह थे महाराणा प्रताप। 

प्रताप को युद्ध में हारा व बिखरा राज्य मिला। खजाना खाली। सेना का मनोबल टूटा हुआ। उन्होंने मेवाड़ के सरदारों को एकजुट किया। सबकी सहायता मांगी। शपथ ली कि मेवाड़ जब तक मुगलों के चंगुल से मुक्त नहीं हो जाता, मैं जमीन पर सोऊंगा, पत्तल पर खाऊंगा और राज प्रसाद में नहीं रहूंगा। उन्होंने अपनी राजधानी कुंभलगढ़ में स्थानांतरित कर दी। प्रताप जानते थे कि समाज के हर वर्ग को साथ लेकर ही मुगलों का सामना किया जा सकता है। उन्होंने वनवासी भीलों को प्रशिक्षित किया, अपनी सेना में भर्ती किया। आखिरकार एक बार फिर मेवाड़ के परचम तले 22000 की फौज खड़ी हो गई। ऐसा नहीं है कि अकबर ने कूटनीतिक तरीके से महाराणा को मनाने की कोशिश न की हो। आमेर के राजा मानसिंह को भेजा। महाराणा ने मान सिंह के साथ भोजन पर जाने से बचने के लिए कमर दर्द का बहाना बनाया और अपने बेटे अमर सिंह को भेज दिया। मान सिंह को मेवाड़ में खासा अपमान झेलना पड़ा। टोडरमल ने भी प्रताप को अकबर से संधि के लिए मनाने का प्रयास किया। 


यह महाराणा प्रताप की दृढ़ता के साथ कूटनीति भी थी। वह अकबर के संधि प्रस्तावों को अस्वीकार करते हुए कहते, कैसे मैं किसी विदेशी जिहादी आक्रांता की गुलामी स्वीकार कर सकता हूं। इस तरह उन्होंने पूरे राजपुताना में राजपूती स्वाभिमान को एक तरह से ललकार दिया। जिसके परिणाम आने वाले वर्षों में सामने आए। प्रताप के जीवन का एक और पहलू है कि वह बहुत व्यावहारिक और कूटनीति के जानकार भी थे। वह जानते थे कि जिद में लड़ते रहना आत्महत्या जैसा है। आज जिंदा रहे, तो कल फिर मुकाबला करेंगे। हल्दीघाटी के मैदान में 3000 घुड़सवार और 400 धनुर्धारी राजपूतों के सामने 10,000 मुगल सैनिक थे। हल्दीघाटी की लड़ाई अद्भुत थी। एक राजपूत या भील चार मुगल सैनिकों से मुकाबला कर रहा था। एक वक्त आया, जब मुगल सेना भारी पड़ने लगी। मेवाड़ के सरदारों ने महाराणा से आग्रह किया कि वह मैदान से निकल जाएं, वह रहे, तो प्रतिरोध जारी रहेगा। झाला मान सिंह को महाराणा का मुकुट पहना दिया गया। मुगल सेना से मुकाबला करते हुए झाला मान सिंह वीरगति को प्राप्त हुए। इस युद्ध में महाराणा ने अपना प्रिय घोड़ा चेतक खो दिया। जिसने उनकी प्राण रक्षा करते हुए जान दे दी। प्रताप चेतक को न भूले और उसकी याद में एक उद्यान बनवाया। 

हल्दीघाटी के युद्ध को वामपंथी इतिहासकार कैसे भी प्रस्तुत करें, लेकिन यह राजपूती शौर्य की मिसाल था। यह युद्ध अनिर्णित रहा। अकबर की फौज युद्ध में जीत हासिल न कर सकी। भील राजा पुंजा और दानवीर भामाशाह की मदद से मेवाड़ का हिंदू प्रतिरोध फिर एक बार इस्लामिक शासन के सामने खड़ा था। प्रताप जंगलों में भटके। घास की रोटी खाई। साथ ही उनके परिवार को भी कई बार पूरी रात तक एक जगह बिताने को न मिली। लेकिन संघर्ष की मशाल जलती रही। अकबर ने फिर 70,000 से अधिक सैनिकों की फौज भेजी। 1584 में फिर एक बार मुगल फौज ने महाराणा की घेराबंदी करने की कोशिश की। लेकिन तब तक महाराणा और उनके सैनिक छापामार युद्ध में पारंगत हो चुके थे। दो साल की अथक कोशिशों के बावजूद मुगल फौज महाराणा को न झुका सकी और वापस लौट गई। जब महाराणा अंतिम सांस ले रहे थे, तब भी वह घास के बिछौने पर थे। राजधानी चावंड में धनुष की डोर खींचते हुए उनकी आंत में चोट लगी। 29 जनवरी 1597 में मां भारती के इस सपूत ने आखिरी सांस ली। उस समय उनकी आयु 57 वर्ष थी। महाराणा चले गए, लेकिन पीछे एक लौ छोड़ गए। हिंदू प्रतिरोध की मशाल के रूप में आज भी जल रही है। 

“हल्दीघाटी की मिट्टी ले आना” - अब्राह्म लिंकन की मां ने कहा था

अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन एक बार भारत यात्रा पर आ रहे थे। उन्होंने अपनी मां से पूछा कि आपके लिए भारत से क्या लाऊं। तब उनकी मां ने कहा था कि मेरे लिए हल्दीघाटी की एक मुट्ठी मिट्टी ले आना। मैं उस मिट्टी को नमन करना चाहती हूं, जहां हजारों वीरों ने दासता स्वीकार करने के बजाय भूमि को अपने रक्त से सींचा था।

लेखक  - मृदुल त्यागी