बलिया, उत्तर प्रदेश
संघ शताब्दी वर्ष के अंतर्गत गंगा बहुद्देशीय सभागार में प्रमुख जन गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में समाज के प्रबुद्ध वर्ग से चिकित्सक, अध्यापक, अधिवक्ता और सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने वाले अन्य कार्यकर्ता, मातृ शक्ति सम्मिलित हुए। मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह आलोक कुमार जी, कार्यक्रम अध्यक्ष प्रांत कार्यवाह विनय जी ने भारत माता के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन कर शुभारम्भ किया।
सह सरकार्यवाह आलोक कुमार जी ने एक प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि एक बार सभी देवता अपने गुरु के पास पहुँचे और विनम्रतापूर्वक निवेदन किया कि – हे गुरुदेव! हम सभी सम्पन्न हैं, हमारे पास शक्तिबल, आयुधबल और ज्ञान बल भी है, फिर भी हमसे कमजोर राक्षस हम पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। इसका कारण क्या है?
गुरु ने अत्यंत सरल किंतु गहन उत्तर दिया – “आप सभी गुणों और संसाधनों से परिपूर्ण हैं, परंतु आप संगठित नहीं हैं। विजय प्राप्त करने के लिए संगठन अनिवार्य है। साथ ही, आपको अहंकार का त्याग करना होगा।” गुरु ने समझाया कि एकता ही शक्ति का वास्तविक स्वरूप है।
उन्होंने सेना का उदाहरण देते हुए कहा कि सेना में विभिन्न जातियों, भाषाओं और क्षेत्रों के लोग होते हैं, किंतु वे सभी एक ध्येय से जुड़े होते हैं, एक होकर कार्य करते हैं। इसी कारण वे विजय प्राप्त करते हैं। भारत के लोग स्वभाव से श्रेष्ठ, सहृदय और गुणवान हैं, किंतु संगठन की कमी के कारण उनकी शक्ति पूर्ण रूप से प्रकट नहीं हो पाती। इसी समस्या को समझते हुए डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने समाज को संगठित करने के उद्देश्य से सन् 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। आलोक कुमार जी ने कहा कि आज हिन्दुत्व के विचार की चर्चा विश्व स्तर पर हो रही है। यह स्पष्ट है कि दुनिया उसी की सुनती है जो शक्तिशाली और संगठित होता है। हिन्दुत्व का मूल स्वभाव समरसता और सर्वकल्याण की भावना है।
नवरात्र के पर्व का उदाहरण देते हुए कहा कि कोई व्यक्ति नौ दिन का व्रत रखता है, तो कोई दो दिन का, परंतु सभी का उद्देश्य एक ही होता है – कल्याण और साधना। यह विविधता में एकता का सुंदर उदाहरण है। आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने 101वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है और समाज परिवर्तन के लिए “पंच परिवर्तन” के महत्वपूर्ण विषयों पर कार्य कर रहा है।
सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि परिवार ही संस्कारों की प्रथम पाठशाला है। बच्चों की शिक्षा और चरित्र निर्माण घर से ही प्रारंभ होता है। भारतीय संस्कृति में माता-पिता को भगवान से भी उच्च स्थान दिया गया है। इसलिए कुटुंब प्रबोधन के अंतर्गत साथ बैठकर भोजन, संवाद और सामूहिक जीवन पर बल दिया जाता है। समाज में भेदभाव समाप्त कर सभी वर्गों को एकसूत्र में जोड़ना आवश्यक है। समरस समाज ही सशक्त राष्ट्र का आधार बनता है। वर्तमान समय में पर्यावरण असंतुलन एक गंभीर समस्या बन चुका है। इसे रोकने के लिए हमें सजग होना होगा। इसके लिए हमें पॉलिथीन और प्लास्टिक का त्याग, प्रकृति के प्रति संवेदनशील जीवन शैली पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता हेतु अभियान करना होगा। स्वदेशी का अर्थ केवल देशी वस्तुओं का उपयोग नहीं, बल्कि स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता है। टेक्नोलॉजी का उपयोग आवश्यक है, परंतु उसमें आत्मनिर्भर बनना और अपनी क्षमताओं का विकास करना भी उतना ही जरूरी है। “सेवा” की भावना हमारी प्राचीन परंपरा का मूल तत्व है। संविधान हमें अनेक अधिकार देता है, जिनकी चर्चा व्यापक रूप से होती है, परंतु मौलिक कर्तव्यों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। हर नागरिक को अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होना चाहिए। उन्हें समय का पालन, नियमों का पालन यातायात नियमों का अनुसरण, समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का निर्वहन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिए केवल संसाधन और शक्ति पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि संगठन, समरसता और कर्तव्यबोध आवश्यक हैं। जब व्यक्ति अहंकार त्यागकर एकजुट होकर कार्य करता है, तभी सच्ची विजय संभव होती है।



