अपने कार्य का आधार सांस्कृतिक है
अपने यहाँ कहा
गया है कि इस भूमि पर पुत्र के नाते रहने वाले लोगों का यह राष्ट्र है, इस भूमि के नाम पर ही राष्ट्र का नाम है,
इसका इतिहास ही राष्ट्र का इतिहास है, इसका जीवन ही राष्ट्र का जीवन है। विशुद्ध
भारतीय जीवन की इस कल्पना में रूढ़ि के कारण यदि कोई बुराई आ गई हो तो उसे झाड़कर
पुनः शुद्ध करके एक बार फिर से खड़ा कर देना है। इसीलिए तो हम कहते हैं कि हमारा
कार्य सांस्कृतिक है। विशुद्ध संस्कृति को सामने रखकर, उसे अधिक से अधिक तेजस्वी कर, शुद्ध कर, भिन्न-भिन्न
भ्रमात्मक विचार हटाकर, शुद्ध राष्ट्र
कल्पना के आधार पर विशुद्ध राष्ट्रजीवन उत्पन्न करने का अपना सांस्कृतिक कार्य है।
इसीलिए प्रतिज्ञा में 'हिंदू-संस्कृति'
शब्द आया है। संस्कृति के उत्थान का, जीवन के विशुद्ध राष्ट्रीय दृष्टिकोण से समाज
और राष्ट्र के उत्थान का कार्य जो हमने लिया है, उसे इसीलिए 'सांस्कृतिक'
कहा है।
- श्री गुरूजी
समय, खंड-2, प्रथम संस्करण, सुरुचि प्रकाशन, पृष्ठ 67-68




