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समाज-सेवा का मार्ग सबसे ऊपर

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समाज-सेवा का मार्ग सबसे ऊपर 

बिजनौर को अपनी कर्मभूमि बनानी वाली डॉ. राखी आनंद अग्रवाल का योगदान अस्पताल की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहा। समाज में महिलाओं की चुनौतियों को करीब से देखने के बाद उन्होंने सखी वेलफेयर फाउंडेशन की स्थापना की। इसके माध्यम से महिला सशक्तिकरण को अपना व्यापक सामाजिक मिशन बनाया। कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध जनजागरण, सिलाई प्रशिक्षण, ब्यूटीशियन कोर्स, सैनिटरी पैड निर्माण, वित्तीय साक्षरता और स्वरोजगार जैसे अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने हजारों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में प्रेरित और समर्थ बनाया।

एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी और पली-बढ़ी डॉ. राखी आनन्द अग्रवाल ने बचपन से ही शिक्षा, ईमानदारी और संवेदनशीलता के संस्कार पाए। उन्हें सिखाया गया कि यदि जीवन ने आपको कुछ विशेष अवसर दिए हैं, तो उनका उपयोग समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए होना चाहिए। बचपन से ही उनका सपना डॉक्टर बनने का था। यह उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज की सेवा का माध्यम था। किताबों से उन्होंने ज्ञान पाया, लेकिन जीवन के वास्तविक अनुभवों ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ा। महिलाओं को चुपचाप दर्द, भेदभाव और अन्याय सहते देख उनके भीतर एक संकल्प जन्मा, जो आगे चलकर महिला सशक्तिकरण के आजीवन मिशन में बदल गया। उनकी यात्रा आसान नहीं थी। अपने समय की अनेक महिलाओं की तरह उन्हें भी परिवार और अपने सपनों के बीच संतुलन बनाना पड़ा। कई बार परिस्थितियाँ कठिन थीं, कई बार सेवा का रास्ता व्यक्तिगत सुविधाओं से समझौता मांगता था। लेकिन हर चुनौती ने उन्हें और अधिक दृढ़ बनाया।

चिकित्सा शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने एक ऐसा निर्णय लिया जिसने उनके जीवन की दिशा तय कर दी। महानगर में आकर्षक करियर बनाने के बजाय उन्होंने उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर नजीबाबाद, बिजनौर को अपनी कर्मभूमि बनाया, जहाँ महिलाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की बेहद आवश्यकता थी। बहुत लोगों ने उनके इस निर्णय पर प्रश्न उठाए। इतने अवसर छोड़कर छोटे शहर में क्यों? सीमित संसाधनों के बीच क्यों? उनका उत्तर हमेशा सरल रहा। अच्छी स्वास्थ्य सेवाएँ केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। डॉक्टर होने का अर्थ वहीं जाना है, जहाँ आपकी सबसे अधिक आवश्यकता हो। 

पिछले दो दशकों से अधिक समय में वे केवल एक स्त्री रोग विशेषज्ञ नहीं रहीं। हजारों महिलाएँ उनके पास इलाज के लिए आईं और केवल दवा ही नहीं, बल्कि सम्मान, आत्मविश्वास और उम्मीद लेकर लौटीं। उनके लिए मरीज कभी केवल एक केस नहीं रहे; वे किसी की बेटी, किसी की माँ, किसी की बहन और अनगिनत सपनों का आधार थीं। उन्होंने चिकित्सा को व्यवसाय नहीं, बल्कि सेवा का पवित्र माध्यम माना।

उनकी सामाजिक यात्रा पर्यावरण संरक्षण तक भी पहुँची। मालन नदी की दुर्दशा ने उन्हें विचलित किया और उन्होंने उसकी स्वच्छता के लिए अभियान शुरू किया। नदी में प्रवाहित होने वाले पूजा-पाठ के फूलों को कचरा मानने के बजाय उन्होंने उन्हें पुनर्चक्रित कर पर्यावरण-अनुकूल धूप बनाने की पहल की। 

एक महिला के रूप में चिकित्सा, सामाजिक सेवा, जनजीवन और अभिनय जैसे विविध क्षेत्रों में कार्य करते हुए उन्हें कई बार अपनी क्षमता पर उठते प्रश्नों का भी सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने कभी पूर्वाग्रहों को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। चाहे वे बिजनौर की कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (POSH) समिति की अध्यक्ष हों, 50-बेड के अस्पताल की सह-स्वामिनी, राष्ट्रीय समाचार चैनलों की पैनलिस्ट,  समाजसेवी या चिकित्सक, उन्होंने हर भूमिका में अपने कार्य से सम्मान अर्जित किया।

उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि वास्तविक शक्ति पद, प्रतिष्ठा या तालियों में नहीं, बल्कि उस साहस में होती है जो किसी का दर्द कम करे, किसी का हाथ थामे और इस दुनिया को पहले से थोड़ा बेहतर बनाकर जाए।