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इतिहास

राष्ट्र, संस्कृति और स्वत्व के लिए समर्पित विद्यार्थी जी की पत्रकारिता

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राष्ट्र, संस्कृति और स्वत्व के लिए समर्पित विद्यार्थी जी की पत्रकारिता

विद्यार्थी जी की पत्रकारिता राष्ट्र संस्कृति और स्वाभिमान के लिये समर्पित रही। उनका व्यक्तित्व भी व्यापक था। वे स्वतंत्रता संग्राम की तीनों धाराओं से व्यक्तिगत संपर्क में रहे और सबके सहयोगी भी। वे केवल 41 वर्ष की आयु में संसार से विदा हो गये लेकिन पत्रकारिता, समाज सेवा और राष्ट्र सेवा की धारा में जो मानदंड स्थापित कर गये, आधुनिक दुनिया के किसी भी पत्रकार को वहां तक पहुंचना स्वप्न की यात्रा जैसा है।

कालजयी पत्रकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी का चिंतन, अध्ययन, कार्यशैली और व्यक्तित्व असाधारण था। प्रयागराज उनका ननिहाल था। और यही उनकी जन्म स्थली भी। विद्यार्थी जी की अधिकांश शिक्षा भी प्रयागराज में हुई। लेखन और अध्ययन उनको विरासत में मिला था। उन्होंने बालवय से ही लेखन आरंभ कर दिया था। अध्यापक पिता की साहित्य में रुचि होने से घर में पर्याप्त साहित्यिक पुस्तकें थीं। इनका भी प्रभाव विद्यार्थी जी पर पड़ा। उन्होंने हिन्दी, संस्कृत, उर्दू और अंग्रेजी की शिक्षा ग्रहण की। उनका लेखन इन चारों भाषाओं में हुआ। पत्रकारिता में प्रवेश ‘स्वराज’ समाचार पत्र से उर्दू भाषा में हुआ। समय के साथ उनका परिचय पंडित सुंदरलाल से हुआ और वे हिंदी पत्रकारिता से जुड़े और वे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित ‘सरस्वती’ पत्रिका से जुड़े। यह 1911 की बात है। इस पत्रिका में रहते हुये उन्होंने अपने लेखन को विस्तार दिया और उस समय के अधिकांश पत्रिकाओं में उनके आलेख और समीक्षाएं प्रकाशित होने लगे। साहित्य एवं सांस्कृतिक लेखन के साथ उन्होंने राजनैतिक और राष्ट्रीय विषयों पर लेखन आरंभ किया। और वे मदन मोहन मालवीय के समाचार पत्र ‘अभ्युदय’ से जुड़े। ‘अभ्युदय’ में काम करते हुये उनके मन में अपनी पत्रिका आरंभ करने का विचार बना। उन्होंने अपनी पत्रिका का नाम ‘प्रताप’ रखा। पत्रिका के इस नाम में उनके स्वाभिमान संघर्ष की झलक मिलती है। जिस प्रकार महाराणा प्रताप का संपूर्ण जीवन स्वत्व की रक्षा के लिये समर्पित रहा वही यात्रा इस समाचार ‘प्रताप’ की रही। इस पत्रिका प्रताप का शुभारंभ उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर में 9 नवंबर 1913 को हुआ। विद्यार्थी जी को इस अभियान शिव नारायणजी मिश्र, नारायण प्रसाद जी अरोड़ा और यशोदा नंदन जी सहयोगी के रूप में मिले। पत्रकारिता में विद्यार्थी का संकल्प इन दो पंक्तियों में झलकता है-

‘जिसको निज गौरव, 

निज देश का नहीं अभिमान है,

वह नर नहीं, पशु निरा है, 

और मृतक समान है’

ये पंक्तियां उन्होंने महावीर प्रसाद द्विवेदी ने आशीर्वाद स्वरूप भेजी थीं, जो ‘प्रताप’ की मुख वाणी बनीं। समय के साथ प्रताप दैनिक समाचार पत्र बना लेकिन संकल्प यात्रा यथावत रही। उनकी पत्रकारिता सैद्धांतिक थी जो किसी की प्रशंसा और अप्रशंसा से बहुत ऊपर थी जो किसी धमकी से भयभीत नहीं थी और न किसी लालच से ही प्रभावित थी। उन्होंने अपने एक संपादकीय में लिखा था- ‘सत्य और न्याय हमारे भीतरी पथ प्रदर्शक होंगे. सांप्रदायिक और व्यक्तिगत झगड़ों से ‘प्रताप’ सदा अलग रहने की कोशिश करेगा। प्रताप किसी विशेष सभा, संस्था, व्यक्ति या मत के पालन-पोषण, रक्षण या विरोध के लिए नहीं है, किन्तु उसका मत स्वातंत्र्य विचार और उसका धर्म सत्य होगा’ एक अन्य संपादकीय में उन्होंने लिखा- ‘हम अपने देश और समाज की सेवा के पवित्र काम का भार अपने ऊपर लेते हैं। हम अपने भाइयों और बहनों को उनके कर्तव्य और अधिकार समझाने का यथाशक्ति प्रयत्न करेंगे। राजा और प्रजा में, एक जाति और दूसरी जाति में, एक संस्था और दूसरी संस्था में बैर और विरोध, अशांति और असंतोष न होने देना हम अपना परम कर्तव्य समझेंगे।

इस संकल्प के साथ पत्रकारिता आरंभ करने वाले विद्यार्थी जी ने कभी सिद्धांत से समझौता नहीं किया। केवल समाचार और आलेख प्रकाशन पर उन्हें दर्जन भर मुकदमें झेलने पड़े। तीन बार जेल हुई। अंग्रेजों के शोषण के विरुद्ध और जन-जागरण के लिये उन्होंने खुलकर लिखा। इसी श्रृंखला में 19 जून 1916 के अंक में ‘दासता’ नामक कविता पर राजद्रोह का मुकदमा चला। दूसरा मुकदमा 22 अप्रैल 1918 के अंक में प्रकाशित कविता ‘सौदा-ए-वतन’ पर चला। यह कविता यद्यपि नानक सिंह हमदम की थी लेकिन संपादक के नाते विद्यार्थी जी पर भी मुकदमा चला। ‘प्रताप’ की तीसरी सालगिरह पर एक और राष्ट्रीय अंक प्रकाशित किया गया। साथ ही दूसरे देशों में प्रवासी भारतीयों के शोषण और उनकी समस्याओं के समाधान के सुझाव भी थे।

असहयोग आंदोलन में वे जेल गये। अपनी इस जेल यात्रा में उन्होंने फ्रांस की राज्य क्रांति का अध्ययन किया और विक्टर ह्यूगो कृति ‘नाइंटी थ्री’ का हिन्दी अनुवाद किया। जनवरी 1921 में रायबरेली तथा सुल्तानपुर में हुए किसान आंदोलन के समाचार ‘प्रताप’ के अंक में विस्तार से प्रकाशित हुये। इस पर मुकदमा चला और जुर्माने की सजा हुई। रायबरेली के मानहानि केस में उन्हें तीन माह की सजा हुई। उन्होंने एक मुकदमा ‘मैनपुरी मानहानि’ का लड़ा। शिकोहाबाद के थानेदार की रिश्वतखोरी की खबरें छापने के कारण यह मुकदमा बना था। इस प्रकरण में चार सौ रुपये जुर्माना अथवा छह माह जेल की सजा मिली। विद्यार्थी ने जुर्माना अदा नहीं किया और जेल चले गये। इस सजा पर आंदोलन भी हुआ। स्थानीय लोगों ने जुर्माना अदा किया और विद्यार्थी जी चौबीस घंटे बाद रिहा कर दिये गये।‘प्रताप’ पर तीसरा प्रकरण 1928 में साईंखेड़ा मानहानि केस के नाम से चला। लेकिन इसमें मध्यस्थता हुई और प्रकरण समाप्त हो गया। उन्होंने क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल को फांसी दिये जाने के तीन दिन पहले विस्मिल की आत्मकथा के कुछ अंशों का प्रकाशन किया जो उन्हें विस्मिल जी की बहन ने लाकर दिये थे। उनकी अंतिम रचना एक कहानी के रूप ‘हाथी की फांसी’ थी जो 9 मार्च 1931 मार्च को प्रकाशित हुई।

संक्षिप्त जीवन परिचय: गणेश शंकर विद्यार्थी जी का जन्म 26 अक्टूबर 1890 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में हुआ था। पिता जयनारायण श्रीवास्तव उत्तर प्रदेश में ही फतेहपुर के निवासी थे। वे प्रधान अध्यापक के रूप में मध्य प्रदेश के मुंगावली पहुंचे और मुंगावली को अपना स्थाई निवास बनाया। माता गोमती देवी का मायका प्रयागराज में था। विद्यार्थी जी का जन्म अपने ननिहाल प्रयागराज में हुआ। नानी गंगादेवी गणेश जी की भक्त थीं। उन्होंने ने बालक का नाम ‘गणेश शंकर’ रखा। ननिहाल के परिवार की निकटता नेहरु परिवार से थी। बचपन में विद्यार्थी जी की मित्रता बचपन में पं जवाहरलाल नेहरु से हुईं जो जीवनभर रही। लेकिन यह मित्रता विद्यार्थी जी की पत्रकारिता और प्रखर राष्ट्रभाव जाग्रति के अभियान में बाधा न बनी। विद्यार्थी जी की प्रारंभिक शिक्षा मुंगावली में और मिडिल परीक्षा 1905 में विदिशा नगर से उत्तीर्ण की। महाविद्यालयीन शिक्षा के लिये प्रयागराज आये। यहीं से उनका सार्वजनिक जीवन आरंभ हुआ। प्रयागराज में नाना का परिवार भी साहित्य लेखन से जुड़ा था। इसलिये उनके लेखन को और गति मिली। सोलह वर्ष की आयु से उनकी रचनाएं ‘सरस्वती’ में छपने लगीं थी और इसी आयु में उन्होंने ‘आत्मोसर्जना’ नामक लघु उपन्यास लिख दिया था। समय के साथ  परिचय भी बढ़ा और ‘कर्मयोगी’ के संपादकीय विभाग में सहयोगी हो गये थे। वे लेखन में अपने नाम आगे परिवार का पारंपरिक उपनाम ‘श्रीवास्तव’ की बजाय ‘विद्यार्थी’ लिखने लगे। वे कहते कि अभी मैं ‘विद्यार्थी’ हूं,  इसलिये विद्यार्थी ही लिखता हूं। लेखन के माध्यम से ही उनका परिचय अपने समय के सुप्रसिद्ध लेखक एवं पत्रकार पं सुन्दर लाल और साहित्यकार पं महावीर प्रसाद द्विवेदी से हुआ। साहित्य लेखन में द्विवेदी जी और पत्रकारिता में पं सुन्दरलाल उनके आदर्श और गुरु बने। 1908 में अपनी पढ़ाई पूरी करके विद्यार्थी जी कानपुर आये यहां करेंसी आफिस में नौकरी की। तब उन्हें तीस रुपये माहवार वेतन मिलता था। अध्ययन और लेखन अब भी निरन्तर रहा। 1911 में नौकरी छोड़कर पत्रिका सरस्वती में सहायक संपादक हो गये। महावीर प्रसाद द्विवेदी इस पत्रिका के संपादक थे। यहां वे दो वर्ष रहे। 9 नवम्बर 1913 को उन्होंने प्रताप नाम से अपनी पत्रिका आरंभ की। उनके लेखन में पूर्ण स्वतंत्रता की झलक थी। जिससे तिलक जी बहुत प्रभावित हुये और 1916 में तिलक जी उनकी पत्रिका के कार्यालय में आये। 1920 में उन्होंने ‘प्रताप’ को दैनिक समाचार पत्र का स्वरूप दिया। पत्रकारिता, लेखन, और समाज सेवा के साथ वे स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े थे। 1925 में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में स्वागताध्यक्ष बने और फिर उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे।1930 के सत्याग्रह में हिस्सा लिया और जेल गये। उन्होंने प्रताप के कार्यालय के नीचे एक गुप्त तहखाना बनाया हुआ था जहां देश का समस्त प्रतिबंधित साहित्य एकत्र रहता था। वह क्रांतिकारियों के छिपने का स्थान भी था। सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी भगत सिंह ने अपने अज्ञातवास का ढाई वर्ष का समय विद्यार्थी जी के सानिंध्य में ही बिताया था। वे ‘बलवंत सिंह’ के नाम से प्रताप में लेख भी लिखते थे। विद्यार्थी जी ने ही अपने कार्यालय में क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह की भेंट कराई थी। उनकी प्रेरणा से ही श्यामलाल जी गुप्त ने ‘विश्व विजयी तिरंगा प्यारा’ झंडा गीत लिखा और यहीं माखन लाल चतुर्वेदी जी ने अपना कालजयी गीत पुष्प की अभिलाषा लिखा। ये दोनों गीत सबसे पहले प्रताप में प्रकाशित हुये। 

विद्यार्थी जी के जीवन का प्रत्येक पल राष्ट्र, संस्कृति और स्वाभिमान के लिये समर्पित था। यही उनकी पत्रकारिता का सिद्धांत भी था। पर उनकी जीवन यात्रा दीर्घजीवी न रह सकी। वे मात्र 41 वर्ष की आयु में ही संसार से विदा हो गये। वह 25 मार्च 1931 का दिन था। क्रांतिकारी भगत सिंह को 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई थी। इसके विरोध में कानपुर बंद घोषणा हुई। बंद की यह पहल विद्यार्थी जी और प्रताप ने की थी। लेकिन मुस्लिम लीग और कुछ मुस्लिम संगठन बंद के विरोध में थे। इसलिये मुस्लिम समाज ने बंद न रखा। इस कारण 24 मार्च से कानपुर में साम्प्रदायिक दंगे शुरु हो गये। दंगाइयो को समझाने के लिये विद्यार्थी 25 मार्च को कार्यालय से निकले। वे चाहते थे कि मुस्लिम समाज भी बंद में सहयोग करे। हालांकि प्रताप के सहयोगियों ने उन्हें रोकना चाहा पर वे न रुके। विद्यार्थी जी जितने सरल और सहज थे उतने ही अपने निर्णय और लेखन में दृढ़ रहते थे। वे समझाने के लिये दंगाइयो के बीच चले गये। फिर न लौट सके। तीन दिन बाद दंगा थमा तब विद्यार्थी जी को ढूंढने का प्रयत्न हुआ। अंत में 29 मार्च को उनका शव ‘अज्ञात शवों’ के ढेर में मिला। शव निकाला गया और अंतिम संस्कार हुआ। यह माना गया कि कार्यालय से निकलते ही उनका बलिदान हो गया था। किस गली में उन पर प्रहार हुआ और किसने उनके प्राण हरण किये यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है।