देहरादून, उत्तराखण्ड
होली रंगों का
त्योहार है, जो खुशियों,
आपसी प्रेम और भाईचारे का संदेश देता है। यह
पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत, वसंत के आगमन और
नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। होली के रंग लोगों के बीच दूरियां मिटाकर दिलों
को जोड़ते हैं। आज के समय में लोग सुरक्षित और प्राकृतिक रंगों को ज्यादा पसंद कर
रहे हैं, ताकि सेहत और पर्यावरण
दोनों सुरक्षित रहें।
देहरादून जिले के विकासनगर क्षेत्र के डाकपत्थर में स्वयं सहायता समूह की महिलाएं इन दिनों होली के लिए हर्बल रंग तैयार करने में जुटी हुई हैं। घर पर ही काम करके महिलाएं रोजगार से जुड़ रही हैं और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। डाकपत्थर में दस महिलाओं का वैभव लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह प्राकृतिक हर्बल रंग बना रहा है। इन महिलाओं को हर्बल रंग बनाने का प्रशिक्षण कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी की वैज्ञानिक डॉ. किरन पंत द्वारा दिया गया है। प्रशिक्षण के बाद महिलाएं पालक का रस, चुकंदर का रस, हल्दी पाउडर और गुलाब जैसे प्राकृतिक पदार्थों को अरारोट में मिलाकर हाथों से हर्बल रंग तैयार कर रही हैं।
पिछले साल समूह ने होली के मौके पर करीब एक क्विंटल हर्बल रंगों की मांग पूरी की थी। इस बार भी होली में लगभग एक महीना शेष है और अभी से रंगों की डिमांड आने लगी है। मांग को देखते हुए महिलाएं रोज मेहनत करके रंग तैयार कर रही हैं। तैयार हर्बल रंगों को 50 ग्राम, 100 ग्राम और 250 ग्राम की पैकिंग में बाजार में उपलब्ध कराया जाएगा।
कृषि विज्ञान केंद्र की वैज्ञानिक डॉ. किरन पंत ने बताया कि महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए समय-समय पर रोजगार से जुड़े कार्यक्रम चलाए जाते हैं। हर्बल रंग बनाने का प्रशिक्षण भी उन्हीं कार्यक्रमों का हिस्सा है, जिसकी अब काफी मांग बढ़ गई है। पूरे क्षेत्र में करीब 700 लोग स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर इस तरह के कार्यों से लाभ उठा रहे हैं। यह पहल न केवल महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही है, बल्कि लोगों को सुरक्षित और प्राकृतिक रंगों के उपयोग के लिए भी प्रेरित कर रही है।



