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आत्मबोध से आत्मनिर्भरता तक स्व भारत की वैचारिक यात्रा

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आत्मबोध से आत्मनिर्भरता तक स्व भारत की वैचारिक यात्रा 

भारत की सभ्यता का मूल स्वर ‘स्व’ की खोज में निहित है। ‘स्व’ केवल व्यक्ति का आत्म नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और राष्ट्र की सामूहिक चेतना भी है। भारतीय चिंतन में आत्मबोध को जीवन का परम लक्ष्य माना गया है, और यही आत्मबोध आगे चलकर आत्मनिर्भरता का आधार बनता है। वर्तमान समय में ‘आत्मनिर्भर भारत’ का विचार केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि एक दीर्घ वैचारिक यात्रा का परिणाम है, जिसकी जड़ें वेदांत, उपनिषद, संत परंपरा और आधुनिक राष्ट्रवाद में मिलती हैं।

भारतीय दर्शन में आत्मबोध का अर्थ है अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा की शाश्वतता का बोध कराते हैं-”नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि“। यह आत्मबोध मनुष्य को निर्भीक, संतुलित और कर्मयोगी बनाता है।

इसी प्रकार उपनिषद का महावाक्य ‘तत्त्वमसि’ व्यक्ति को उसके दिव्य स्वरूप का स्मरण कराता है। आत्मबोध का यह विचार व्यक्ति को बाह्य निर्भरता से मुक्त कर आंतरिक शक्ति की ओर उन्मुख करता है।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था- ‘उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको।’ उनका यह आह्वान केवल आध्यात्मिक जागरण नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का संदेश था। उनके अनुसार जब व्यक्ति अपने भीतर की शक्ति को पहचानता है, तभी वह राष्ट्र को भी सशक्त बना सकता है।

उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में आत्मबोध का विचार राजनीतिक चेतना में परिवर्तित हुआ। महात्मा गांधी ने ‘स्वदेशी’ और ‘स्वराज’ का जो सिद्धांत दिया, वह आत्मनिर्भरता का व्यावहारिक रूप था। उनके लिए स्वराज केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आत्मशासन था-व्यक्ति, ग्राम और राष्ट्र स्तर पर।

चरखा गांधीजी के लिए केवल वस्त्र निर्माण का साधन नहीं, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता और स्वाभिमान का प्रतीक था। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग आत्मनिर्भरता की दिशा में सामूहिक आत्मबोध का परिणाम था।

बाल गंगाधर तिलक का उद्घोष-‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ भारतीय जनमानस में आत्मसम्मान की चेतना जगाने वाला था। यह आत्मबोध राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता की नींव बना।

राष्ट्र की आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक साधनों से संभव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक स्वावलंबन से भी जुड़ी है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शिक्षा को आत्मविकास का माध्यम माना। उनके शांति निकेतन का उद्देश्य ऐसी शिक्षा देना था जो व्यक्ति को प्रकृति और संस्कृति से जोड़ते हुए स्वतंत्र चिंतन सिखाए।

औपनिवेशिक काल में पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली ने भारतीयों में हीनभावना उत्पन्न की। परंतु भारतीय चिंतकों ने यह स्पष्ट किया कि आत्मबोध का अर्थ अतीत में लौटना नहीं, बल्कि अपनी परंपरा के आधार पर आधुनिकता का निर्माण करना है।

1947 के बाद भारत ने नियोजित विकास की नीति अपनाई। औद्योगिकीकरण, कृषि सुधार और सार्वजनिक क्षेत्र की स्थापना का उद्देश्य आर्थिक आत्मनिर्भरता था। हरित क्रांति ने खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता दिलाई।

हालांकि वैश्वीकरण के दौर में भारत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ाव बढ़ाया, फिर भी आत्मनिर्भरता का विचार समाप्त नहीं हुआ। यह आत्मनिर्भरता अब आत्मविश्वास, नवाचार और कौशल विकास से जुड़ गई।

सन् 2020 में वैश्विक महामारी के दौरान ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान की घोषणा की गई। देश मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे आर्थिक पुनर्निर्माण का आधार बताया। इस पहल का उद्देश्य स्थानीय उत्पादन, स्टार्टअप संस्कृति, डिजिटल नवाचार और ‘वोकल फॉर लोकल’ को बढ़ावा देना था।

यहाँ आत्मनिर्भरता का अर्थ आत्मकेंद्रित होना नहीं, बल्कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी शक्ति के साथ खड़ा होना है। भारत ने वैक्सीन निर्माण, डिजिटल भुगतान प्रणाली और अंतरिक्ष कार्यक्रमों में आत्मविश्वास का परिचय दिया है।

आत्मबोध व्यक्ति को अपनी क्षमताओं का ज्ञान कराता है; आत्मनिर्भरता उन क्षमताओं का सामाजिक और राष्ट्रीय उपयोग है।

1. आध्यात्मिक स्तर - आत्मज्ञान व्यक्ति को भयमुक्त करता है।

2. नैतिक स्तर - आत्मबोध जिम्मेदारी की भावना उत्पन्न करता है।

3. आर्थिक स्तर - आत्मविश्वास नवाचार और उद्यमिता को प्रेरित करता है।

4. राष्ट्रीय स्तर - सामूहिक आत्मबोध राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता में परिवर्तित होता है।

इस प्रकार आत्मनिर्भर भारत केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन की स्वाभाविक परिणति है।

आत्मनिर्भरता की राह में कई चुनौतियाँ है जैसे तकनीकी निर्भरता, बेरोजगारी, कौशल की कमी और सामाजिक असमानता। यदि आत्मबोध केवल नारे तक सीमित रह जाए, तो आत्मनिर्भरता संभव नहीं। इसके लिए शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार और नैतिक नेतृत्व आवश्यक है।

भारत की युवा शक्ति, डिजिटल क्रांति और सांस्कृतिक विरासत इसे आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने की अपार संभावनाएँ प्रदान करती हैं।  

आत्मबोध से आत्मनिर्भरता तक की यात्रा भारत की वैचारिक परंपरा का स्वाभाविक विकास है। वेदांत का आत्मज्ञान, संतों का मानवतावाद, गांधी का स्वदेशी और आधुनिक भारत का नवाचार ये सभी इस यात्रा के पड़ाव हैं।

जब व्यक्ति अपने ‘स्व’ को पहचानता है, तभी राष्ट्र अपने सामर्थ्य को पहचान पाता है। आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न तभी साकार होगा जब प्रत्येक नागरिक आत्मबोध से प्रेरित होकर कर्तव्यनिष्ठ, नवाचारी और आत्मविश्वासी बने।

इस प्रकार ‘स्व भारत’ की वैचारिक यात्रा अतीत की विरासत से वर्तमान की चुनौतियों तक और भविष्य की संभावनाओं तक फैली हुई है-जहाँ आत्मबोध ही आत्मनिर्भरता का प्रथम चरण है।


 लेखिका  जे.एस.एस. प्रौद्योगिकी शिक्षा अकादमी, नोएडा के अंग्रेजी विभाग में  विभागाध्यक्ष है।