पोषण वाटिका से बदली जिंदगी
सीतापुर के उमारपुर गांव की रहने वाली सरिता यादव की कहानी यही सिखाती है कि गरीबी हमेशा रास्ते बंद नहीं करती। कभी-कभी वह इंसान को नए रास्ते खोजने के लिए प्रेरित करती है। जरूरत है तो केवल सीखने की इच्छा, मेहनत करने का साहस और उपलब्ध संसाधनों को अवसर में बदलने की सोच की। एक छोटी-सी पोषण वाटिका से शुरू हुई सरिता की यात्रा आज अनेक ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता और उम्मीद की हरियाली बन चुकी है। उन्होंने मशरूम पाउडर, मशरूम का अचार और श्रीअन्न से बने खाद्य उत्पाद तैयार करने शुरू किए। धीरे-धीरे उनकी छोटी-सी पहल ग्रामीण उद्यमिता का रूप लेने लगी।
सीतापुर के मछरेहटा ब्लॉक के उमरापुर गांव की सरिता यादव की जिंदगी की शुरुआत किसी असाधारण कहानी की तरह नहीं हुई थी। एक साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में पली-बढ़ी सरिता ने बचपन से ही अभावों को बहुत करीब से देखा था। घर की जरूरतें सीमित थीं और साधन उससे भी कम। फिर शादी हुई और सरिता अपने ससुराल आ गईं। उन्हें उम्मीद थी कि जीवन धीरे-धीरे अपनी राह बना लेगा, लेकिन यहां भी हालात आसान नहीं थे। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि कई बार घर में खाने-पीने की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो जाता था।
सरिता के सामने सबसे बड़ा सवाल था कि आखिर ऐसा क्या किया जाए जिससे घर की हालत सुधरे। न तो उनके पास इतना पैसा था कि कोई छोटा कारोबार शुरू कर सकें और न ही बाहर जाकर नौकरी करने की परिस्थितियां थीं। लेकिन सरिता के भीतर कुछ नया सीखने का जज्बा था और अपने परिवार के लिए कुछ करने की इच्छा। इसी तलाश में उन्हें कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके-2), कटिया, सीतापुर से प्रशिक्षण लेने का अवसर मिला। उन्हें नहीं पता था कि यह कोर्स उनकी जिंदगी बदलने वाला था। खेती के नए तौर-तरीकों, पोषण वाटिका, जैविक खाद, मशरूम उत्पादन और श्रीअन्न से जुड़े प्रयोगों के बारे में सीखते हुए सरिता को पहली बार महसूस हुआ कि जिस जमीन को वे अब तक केवल खाली जगह समझती थीं, वही उनके परिवार की खुशहाली का आधार बन सकती है।
प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्होंने किसी बड़े निवेश का इंतजार नहीं किया। घर के आसपास पड़ी खाली जमीन को ही अपनी पहली पूंजी बनाया। थोड़ी-सी जगह में उन्होंने लौकी, भिंडी, तोरई और दूसरी मौसमी सब्जियां उगानी शुरू कर दीं। धीरे-धीरे घर में सब्जियां आने लगीं। बाजार से सब्जियां खरीदने पर होने वाला खर्च कम हुआ और परिवार को ताजी तथा पौष्टिक सब्जियां मिलने लगीं। कुछ अतिरिक्त उपज बेचने पर थोड़ी आमदनी भी होने लगी। जिस घर में कभी भोजन की जरूरतों को पूरा करना चुनौती था, वहां अब घर की जमीन ही परिवार के लिए भोजन और आय दोनों का साधन बनने लगी।
सरिता यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने जैविक और प्राकृतिक खेती के तरीकों को अपनाया। गोबर की खाद, कंपोस्ट, बीजामृत और जीवामृत जैसे विकल्पों का इस्तेमाल किया। मशरूम उत्पादन से निकलने वाले अपशिष्ट से कंपोस्ट तैयार कर उन्होंने खेती की लागत घटाने और संसाधनों का बेहतर उपयोग करने का रास्ता भी खोज लिया। उन्होंने अपनी सफलता को अपने तक सीमित नहीं रखा। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को उन्होंने पोषण वाटिका, मशरूम उत्पादन और श्रीअन्न आधारित गतिविधियों के बारे में प्रशिक्षण देना शुरू किया। आज वे 1000 से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षित कर चुकी हैं। कभी अपने परिवार के लिए दो वक्त का भोजन जुटाने की चिंता से जूझने वाली सरिता आज दूसरी ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने की राह दिखा रही हैं। उनके लिए खाली पड़ी जमीन केवल मिट्टी का एक टुकड़ा नहीं थी; वह संभावनाओं की जमीन थी।




