समाज में सकारात्मक और रचनात्मक बदलाव लाने में ज़ेन ज़ी का महत्वपूर्ण योगदान – सुनील आंबेकर जी
पुणे, १७ जून २०२६। संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में नवी पेठ स्थित पुणे श्रमिक पत्रकार संघ की ओर से आयोजित विशेष वार्तालाप कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी ने कहा कि “देश की नई पीढ़ी यानी ‘ज़ेन ज़ी’ (Gen Z) को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) बेहद आशान्वित है। आज के युवा अपनी परंपराओं और भारत के गौरवशाली इतिहास से जुड़े हुए हैं। समाज में सकारात्मक और रचनात्मक बदलाव लाने में यह पीढ़ी बहुत बड़ा योगदान दे रही है”।
इस अवसर पर मंच पर पत्रकार संघ के अध्यक्ष ब्रिजमोहन पाटिल और महासचिव मंगेश फल्ले भी उपस्थित रहे। सुनील आंबेकर जी ने संघ के पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन), ‘ज़ेन ज़ी’, जनसंख्या असंतुलन और मुस्लिम समाज को लेकर संघ के दृष्टिकोण को साझा किया। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के आंदोलन से जुड़े प्रश्न पर कहा कि “भारत में सभी स्तरों पर लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव होते हैं। हमारी अदालतें, प्रशासन और मीडिया पूरी स्वतंत्रता के साथ अपना काम कर रहे हैं। ऐसे मजबूत लोकतंत्र में यदि कोई अपनी आवाज उठा रहा है, तो व्यवस्था में उसकी बात को सुनने और उचित संज्ञान लेने की क्षमता होनी चाहिए। इसलिए इस तरह के आंदोलनों से अचंभित या हैरान होने की कोई आवश्यकता नहीं है।”
आरएसएस के सभी वित्तीय व्यवहार केवल बैंकों के जरिए
संघ के पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) को लेकर कतिपय राजनेताओं द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम को सिरे से खारिज करते हुए उन्होंने कहा, “संघ के विधि-सम्मत अस्तित्व को लेकर कोई कानूनी विवाद है ही नहीं; केवल तुच्छ राजनीतिक लाभ के लिए कुछ तत्वों द्वारा दिग्भ्रमित करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्णतः विधि-सम्मत और मान्यता प्राप्त सामाजिक संगठन है। यही कारण है कि स्वतंत्रता के पश्चात समय-समय पर सभी सरकारों ने विभिन्न राष्ट्रीय आपदाओं और रचनात्मक कार्यों में संघ का सक्रिय सहयोग लिया है। संघ के पथ संचलन को प्रशासन द्वारा नियमानुसार अनुमति प्राप्त होती है, इतना ही नहीं, हमारी स्थानीय शाखाओं के नाम पर बैंकों में अधिकृत खाते संचालित हैं। संघ का समस्त आर्थिक व्यवहार पूर्णतः पारदर्शी है और केवल बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से ही होता है। संघ अपनी दैनिक शाखा पद्धति के माध्यम से प्रतिदिन समाज के प्रति प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी (जवाबदेह) रहता है।
मुस्लिम समाज और संघ के अंतर्संबंधों पर कहा, “यह ऐतिहासिक सत्य है कि संघ की स्थापना से बहुत पहले से ही देश में अलगाववादी मानसिकता के कारण हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष विद्यमान रहा है। दुर्भाग्यवश, स्वतंत्रता पूर्व मुस्लिम समाज में यह विषैली धारणा विकसित की गई कि ‘पूजा पद्धति बदलने से राष्ट्र, पूर्वज और इतिहास बदल जाता है’, और इसी विभाजनकारी मानसिकता के कारण देश ने विभाजन का दंश झेला। हर्ष का विषय है कि अब स्वयं मुस्लिम समाज के भीतर से भी सामाजिक सुधारों के लिए सकारात्मक पहल प्रारंभ हुई है। भारतीय मुस्लिमों को अपनी प्रेरणाओं के लिए पाकिस्तान की ओर नहीं, बल्कि इंडोनेशिया के सांस्कृतिक आदर्श की ओर देखना चाहिए, जिसने इस्लाम अपनाने के बाद भी अपनी मूल हिन्दू सांस्कृतिक जड़ों को अक्षुण्ण रखा है।”
उन्होंने कहा, “वर्तमान में यूरोप और चीन जैसे देशों ने अपनी आत्मघाती जनसंख्या नीतियों के कारण अब ‘यू-टर्न’ ले लिया है। इसे देखते हुए भारत के संदर्भ में जनसांख्यिकीय संतुलन बनाए रखना राष्ट्र की सुरक्षा के लिए कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।”
वर्ष 1947 के दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन का स्मरण कराते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि देश का बँटवारा भी ‘डेमोग्राफिक असंतुलन’ के कारण ही हुआ था। यदि भविष्य में पुनः किसी भूभाग में ऐसा असंतुलन पैदा हुआ, तो अखंड भारत की पहचान, सुरक्षा और सनातन संस्कृति को अक्षुण्ण रखना अत्यंत कठिन हो जाएगा। अतः भारतीय संस्कृति और राष्ट्रनिष्ठा को मानने वाले नागरिकों की बहुलता देश के प्रत्येक क्षेत्र और कोने में होनी अनिवार्य है।



