स्वतंत्रता संग्राम: संघ के स्वयंसेवकों की भूमिका
भारत में स्वातन्त्र्य आन्दोलन में आर. एस .एस. यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सीधे क्यों नहीं कूदा। यह पूछने वाले इस संग्राम के बारे में बहुत सी जटिल बातों को या तो छिपाते हैं या फिर जानते ही नहीं। स्वतन्त्रता के आन्दोलन के स्वरूप को गाँधी ने 1915 में आते ही अपने हाथों में लेकर बिल्कुल बदल दिया था। इसे क्रमानुसार समझना चाहिए। संघ पर सवाल दागने वाले सचाई सुनने से बचते हैं। आन्दोलन की अगुवाई करने वालों की रणनीति पर मौन रह जाते हैं।
पहली महत्वपूर्ण घटना: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 1920 में 26 दिसम्बर से 31 दिसम्बर तक नागपुर में ऐतिहासिक राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ था। इस अधिवेशन में सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने पेश किया था। हेडगेवार नागपुर अधिवेशन के मुख्य आयोजक प्राण पुरुष भी थे। जो पिछले क़ई अधिवेशनों में भी रहे थे। जिन्होंने बाद में 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। डॉ. हेडगेवार का यह प्रस्ताव भारत को ब्रिटिश सरकार से पूर्ण स्वराज्य प्राप्त कराने की मांग का था।
इस प्रस्ताव पर लम्बी बहस हुई थी। उसी वर्ष 01 अगस्त 1920 को बाल गंगाधर तिलक का निधन हो चुका था। इसलिए लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल ने डॉ. हेडगेवार को आगे करके यह प्रस्ताव प्रस्तुत कराया था। प्रस्ताव के पक्ष में कहा था कि पूर्ण स्वराज्य हर भारतवासी का सपना ही नहीं अधिकार है। वहां उपस्थित प्रायः सभी प्रतिनिधि इस प्रस्ताव के पक्ष में थे। मोहन दास गांधी इस अधिवेशन में उपस्थित थे। वह अपनी बात कहने उठे। उन्होंने इस प्रस्ताव में संशोधन करने की बात कही। उनका कहना था कि भारत को स्वराज्य की बात में पूर्ण आजादी का भाव निहित हैं। गांधी ने तत्काल पूर्ण स्वराज्य की बात काटते हुए संशोधन की बात कही थी। उनके कहने पर देश बन्धु चितरंजन दास ने वैध साधनों से आन्दोलन करके स्वराज्य की मांग का संशोधन करने का प्रस्ताव रखा। अन्ततः डॉ. हेडगेवार के प्रस्ताव को इस संशोधन के साथ परिवर्तित करते हुए पास किया गया कि अभी पूर्ण स्वराज्य नहीं अपितु वैध तरीकों से स्वराज्य पाने की लड़ाई लड़ी जाएगी। इस तरह डॉ. हेडगेवार का मूल प्रस्ताव संशोधित कर दिया गया। ऐसा बदलाव गांधी के हठ के चलते हुआ था। जिसे उस समय सभी ने समझते हुए भी मान लिया था।
इसी अधिवेशन में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने भारत में गोवंश की हत्या किये जाने पर पूर्ण पाबन्दी लगाने सम्बन्धी दूसरा प्रस्ताव भी पेश किया था। जिसे गाँधी और उनके समर्थकों ने उस समय टाल देने की बात कहते हुए जोर देकर रोक दिया था। गांधी का तर्क था कि गोवध बन्दी होनी चाहिए पर स्वतंत्रता की जंग पूरी होने पर हम आजाद होकर इस पर मुसलमानों के बीच सम्मति बनाकर कदम उठाएंगे।
गाँधी की स्वदेश वापसी: गाँधी 09 जनवरी 1915 को दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे। गाँधी के राजनीतिक गुरु थे गोपाल कृष्ण गोखले। इन्होंने और स्वामी श्रद्धानन्द ने गांधी को दक्षिण अफ्रीका में कई बार आर्थिक मदद भेजी थी। इन दोनों की सहायता के बल पर गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका में एक आश्रम शुरू किया था। आश्रम का उद्देश्य वहां रह रहे भारतीयों को सहायता देकर एकजुट करना था। गाँधी जी लम्बे समय से दक्षिण अफ्रीका में स्ट्रगल करते रहे। गाँधी का इरादा मुख्य रूप से वहां पाँव जमाना था। ताकि भारतीय समुदाय को दक्षिण अफ्रीका के गोरे अंग्रेजों की सरकार के विरुद्ध लामबन्द किया जा सके। ताकि ऐसी संगठित शक्ति से रंगभेद के आधार पर भारतीयों और अफ्रीकी काले लोगों को उत्पीड़न से बचाया जा सके। सामाजिक न्याय दिलाने का यह उद्देश्य था तो बहुत बड़ा। पर वहां के क्रूर सरकारी तन्त्र के सामने गांधी पाँव नहीं जमा सके। वस्तुतः गाँधी दक्षिण अफ्रीका में अपने उद्देश्य में आंशिक सफलता पाने में भी असफल ही रहे थे।
सुदूर देश की कठिन परिस्थिति में उत्पीड़न सहते भारतीय और स्थानीय काले लोग समझ ही नहीं पा रहे थे कि गाँधी ऐसा कोई जादू कर सकते हैं कि सरकारी तंत्र उन पर डण्डे बरसाना बन्द कर दे। हालात वास्तव में जटिल थे । गाँधी बार बार विफल होते रहे। वहां का सरकारी तंत्र काले लोगों को क्रूरता से दबा देता। संगठित शक्ति की बात उभरने ही नहीं पायी। ऐसी नाकामी से गाँधी इतने चिड़चिड़े हो गये थे कि उनकी वकालत भी फेल हो गयीं। आर्थिक तंगी से अपनी पत्नी कस्तूरबा से उनके रिश्ते असहज हो गये थे । स्थानीय लोगों के सामने हाथ फैलाने से कुछ होने वाला नहीं था। तब भारत लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।
गाँधी जी भारत में अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले की सहायता से भारत लौट पाये थे। तब गाँधी ने तय किया कि भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध चल रहे संघर्ष में सम्मिलित होकर काम करेंगे। गाँधी का सौभाग्य था कि कांग्रेस के उस समय के नेताओं ने उनको नेता मानना स्वीकार कर लिया था। गाँधी को दक्षिण अफ्रीका से लौटा कर भारत में लोकप्रिय बनाने की गोपाल कृष्ण गोखले की योजना सफल रही थी। उन्हें देश में घुमाने का लाभ हुआ।
गाँधी ने गोखले को दूर कर दिया: भारत की जनता गांघी को चमत्कारी नेता मानने लगी थी। गाँधी की स्वदेश वापसी की 09 जनवरी की तिथि को प्रवासी भारतीय दिवस के रूप में तभी मनाने की बात तय हुई थी। फिर तो कांग्रेस ने इसे परम्परा बना दिया। जिन गोपाल कृष्ण गोखले ने गाँधी जी को अफ्रीका की उलझन भरी जिन्दगी से मुक्ति दिलाकर भारत बुलाकर महान नेता बनाया उन्हीं से बाद में गाँधी ने यह कहकर दूरी बना ली थी कि गोखले के रास्ते पर चलकर भारत को स्वतन्त्रता नहीं मिल सकती। गोपाल कृष्ण गोखले तब गाँधी के व्यवहार से बहुत व्यथित और कुंघित हुए थे जब गांधी ने सार्वजनिक रूप से यह कह कर गोखले से पीछा छुड़ाया था कि गोखले तो ब्रिटिश सत्ता के साथ सहयोगी बनकर स्वराज की बात करते हैं। इस वक्तव्य से गोखले के अस्तित्व को सीधी ठेस लगी थी।
बाल लाल पाल का गरम दल: गाँधी जब भारत लौटे तो उस समय कांग्रेस का एक दूसरा धड़ा था जिसके नेता बाल गंगाधर तिलक थे। इसे कांग्रेस के भीतर गरम दल अर्थात अंग्रेजों के विरुद्ध सख्त रुख अपनाने वाले समूह के रूप में जाना जाता था। तिलक जी के साथ इस समूह में बिपिन चन्द्र पाल और लाला लाजपत राय मुख्य थे। वस्तुतः यही समूह उस समय देश में कांग्रेस की मुख्य पहिचान था। महर्षि अरविन्द घोष भी बाल- लाल- पाल के नेतृत्व को वास्तविक कांग्रेस मानते थे।
गाँधी ने बड़ी चतुराई दिखायी: मोहन दास गांघी ने इसी मोड़ पर बड़ी चतुराई दिखायी। उन्होंने बाल लाल पाल की गरम खेमे की कांग्रेसी राजनीति से अलग राह पकडी। गाँधी ने कहा कि हम भारत के हर वर्ग को साथ लेकर चलेंगे। हमारी नीति अहिंसक होगी। हिन्दू मुसलमान सिख और ईसाई सब हमारे साथी बनेंगे। किसानों मजदूरों को साथ लेकर चलेंगे। भारत भ्रमण पर निकले गाँधी हर वर्ग ने नेता बन गये।
क्रान्तिकारी समूहों से दूरी: एक और बड़ी बात यह कि बंगाल से प्रारम्भ हुए क्रान्तिकारी समूह देश भर में अपनी पहिचान बना चुके थे। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, सरदार बल्लभ भाई पटेल जैसे नेता भी मानते थे कि भारत में स्वतन्त्रता आन्दोलन को प्रबल बनाना है तो ऐसे क्रान्तिवीरों के समूहों को साथ लेकर चलने की रीति ठीक रहेगी। पर गाँधी की सर्वस्पर्शी नीति से क्रान्तिकारी समूहों को नकार दिया गया। गाँधी ने कहा कि वह किसी क्रान्तिकारी को कभी समर्थन नहीं देंगे। उस समय के यूरोपीय खास कर ब्रिटिश अखबारों में इसके लिए गाँधी की खुलकर प्रशंसा की गयी।आगे चलकर गाँधी ने क्रान्तिकारी समूहों पर ब्रिटिश सरकार और पुलिस की कड़ी कार्रवाईयों की कभी निन्दा तक नहीं की। सरदार भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव को गलत ढंग से फांसी की सजा सही सबूतों के बिना सुनायी गयी। नियत तिथि से एक दिन पहले शाम को टांग दिया गया । फिर तीनों शवों को काट कर टुकड़े किये गये। उन्हें बिना जलाये फेंक दिया गया। पूरा देश गुस्से में था। तो भी गाँधी एक शब्द नहीं बोले।
गाँधी के समर्थक कहते हैं कि गांधी की यह समझदारी थी अन्यथा स्वतन्त्रता का श्रेय बांटना पड़ता। गाँधी ने देश को क्रान्ति के बल पर स्वतन्त्र कराने वालों को आते ही तगड़ा झटका दे दिया। उन्होंने साफ कहा कि हम भारत को हिंसा की राह पर नहीं झोंकने देंगे। ऐसे किसी प्रयास को कांग्रेस पार्टी का तनिक भी समर्थन नहीं रहेगा । इस नीति से गाँधी को ब्रिटिश सरकार के भीतर एक अच्छे आदमी की ख्याति मिली। गाँधी को आगे करके कांग्रेस चल पड़ी। गाँधी आगे और पूरा देश उनके पीछे, यह छवि बनने से गाँधी बहुत खुश थे ।
गाँधी को नेहरू जैसा साथी मिला: देश व्यापी नेता बनने पर गाँधी की सबसे कड़ी आलोचना जिन्ना के मुख से नित्य सुननी पड़ती थी। गाँधी मुस्लिम समाज को दुलराते पर मुहम्मद अली जिन्ना उनकी खाल नोचता रहता। उनको छद्म हिन्दू नेता कहता। गाँधी को इस मोड़ पर पहुँच कर एक ऐसा निकटस्थ नेता चाहिए था जो उनका पक्का अनुयायी, सच्चा उत्तराधिकारी बन कर देश संभाल सकें। यह सौभाग्य जवाहर लाल नेहरू के लिए आरक्षित करने में गांधी तनिक भी टस से मस नहीं हुए। बात यह थी नेहरू बड़े बाप के बेटे होने के साथ अंग्रेजी हुक्कमरानों के साथ बैठते उठते थे। इस तरह आजादी की जंग में नेहरू उनके लिए बड़े काम के सिद्ध होते रहे।
नेहरू के प्रति गाँधी का मोह: गाँधी ने नेहरू को अपना सीधा उत्तराधिकारी घोषित करने के लिए अपने सत्य के व्रत को छोड़ दिया। पहले सुभाष चन्द्र बोस को कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटवाया और नेहरू को यह पद दिलाने का हठ किया। पर उस समय राजेन्द्र प्रसाद को यह पद देना पड़ा। फिर तो तीन बार गाँधी की जिद पर नेहरू अध्यक्ष बने। सरदार पटेल को प्रधानमंत्री की दौड़ में सबसे आगे होने पर भी पीछे हटने को कह कर पूरे देश को गाँधी ने धक्का देकर चौंका दिया था। इन्दिरा और फिरोज खान की शादी कराने को वह बेसब्री से आगे हो गये। फिरोज और इन्दिरा को गाँधी ने अपने वंश की सीधी पहिचान दे डाली।
नेहरू पर गांधी ने स्वयं के साथ कांग्रेस और देश को न्योछावर कर दिया। यह गाँधी की विवशता थी या कि कोई और गुप्त योजना के चलते वह किसी के चंगुल में फंसते चले गये इस पर शोध बाकी है।
डॉक्टर हेडगेवार से भी दूरी: आर. एस .एस. की स्थापना से पहले डॉक्टर हेडगेवार गाँधी से 1930 में दो बार मिले। उनसे कहा कि स्वतन्त्रता अब निकट है। यह सुनिश्चित करना चाहिए कि स्वराज्य मिलने पर भारत किस रास्ते पर चलेगा। डॉ. हेडगेवार ने उनसे कहा कि भारत आदि काल से सनातन संस्कृति का घर है। भारतीय समाज की यही प्राण शक्ति है। यही राह उत्तम रहेगी। इस पर गाँधी जी ने कहा- इसकी फिक्र व्यर्थ है।जिसके हाथ सत्ता आएगी वह रास्ता बना लेगा। गाँधी जी के इस कथन में क्या भारत की दुर्दशा का संकेत नहीं मिलता है। स्वतन्त्रता ही खण्डित कर दी गयी। देश को हिन्दु मुस्लिम में बाँटने के जिन्ना के हठ का साथ ब्रिटिश रणनीतिकारों और जवाहर लाल नेहरू ने दिया। रही कसर स्वयं गाँधी ने तीन करोड़ 20 लाख मुसलमानों को भारत में रोक कर पूरी कर डाली। नेहरू ऐसे प्रशासक निकले कि पाकिस्तान ने 80 हजार और चीन ने लगभग 70 हजार वर्ग किमी भूक्षेत्र हड़प लिया। कम्युनिस्टों को गोद में बिठाकर शासन चलाया। देश भारतीय संस्कृति से दूर चला गया। यह थी गाँधी की अदूरदर्शिता और नेहरू का बौनापन।
डॉ. हेडगेवार की दूरदर्शिता: फटेहाल बनकर भारत के मर्म को दुनिया को समझाने का गाँधी का प्रयास सर्वथा विच्छिन्न था। गाँधी आत्म मुग्ध रहकर देख रहे थे कि संसार उन्हें सच्चा अहिंसक और दार्शनिक नेता मान ले। भारत माता के तन को चीर डाला गया। संघ की स्थापना यदि हेडगेवार ने 1925 में समय रहते नहीं की होती तो आज जितने हिन्दू भारत में दिखते हैं वह भी नहीं बचते। पाकिस्तान जितना बांटकर दिया गया उससे दोगुना भूमि गाँधी के अयोग्य शिष्य नेहरू ने जिन्ना को हड़प लेने दी। चीन की कपटी नीति को वह नहीं समझ सके। हर मोर्चे पर नेहरू विफल रहे। सरदार पटेल की तुलना में नेहरू तुच्छ सिद्ध हुए।
विभाजन के समय एक तरफा नर संहार होता रहा, न तो पुलिस कहीं खड़ी थी और न ही हिन्दू समाज को पहले से मुस्लिम नेताओं के डायरेक्ट एक्शन की योजना से निपटने को तैयार किया गया था । मुस्लिम हिन्दुओं पर सीधे हमले कर रहे थे तो गाँधी कह रहे थे कि हिन्दुओं तुम अहिंसक बने रहो। तुम्हारा रक्त देखकर उन्हें दया आएगी। गाँधी विफल रहे। देश में चतुर्दिक बिन्दुओं के बचाव में यदि कोई खड़ा दिखायी दिया तो वह संघ के प्रशिक्षित स्वयंसेवक थे। जो कहीं घायलों बच्चों बूढ़ों को ढोते रहे तो कहीं बचाकर निकालने में जुटे रहे। नेहरू सरकार तो यह भी नहीं बता सकी कि कितने हिन्दुओं का एकतरफा संहार किया गया।
संघ ने स्वयंसेवकों को देश की आजादी के आन्दोलन में भाग लेने से संघ ने कभी नहीं रोका। डाक्टर हेडगेवार बालपन से स्वातन्त्र्य संग्राम में स्वेच्छा से भाग लेते रहे। विद्यार्थी रहते भाग लिया तो स्कूल से निकाले गये। स्वयं दो बार जेल में एक बर्ष और नौ महीनों की सश्रम सजा काटी। कांग्रेस आज भी यह दर्शाती है कि स्वतन्त्रता गाँधी नेहरू की देन है। सही बात किसी से छिपी नहीं है कि नेहरू तो ब्रिटिश सत्ता के इशारे पर चलते हुए भारत की चिन्तन धारा के विपरीत भाव में बहते रहे। नेहरू का बौनापन भारत के लिए अभिशाप बन गया।
गाँधी को आत्म मुग्धता के रोग ने कहीं का नहीं छोड़ा। इतिहास स्वयं बता रहा है कि गाँधी के सत्य, ब्रह्मचर्य, अहिंसा के सारे प्रयोग विफल रहे। उन्हीं की अदूरदर्शिता की देन हैं भारत के 23 करोड़ मुस्लिम, भारत में वह सिसकियां जो विभाजन के बाद भी हिन्दुओं को बार-बार रुलाती हैं। देश तब तोड़ा गया और कांग्रेस सत्ता पाकर भी तोड़ती और लूटती रही। संघ के 100 वर्ष स्वयंसेवकों के अथक परिश्रम की कहानी कहते हैं। संघ है तो देश के स्वाभिमान की रक्षा का संकल्प जीवित और जाग्रत है।




