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उत्सवों में नदियां धर्म से नहीं जीवन से जुड़ी हैं

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उत्सवों में नदियां धर्म से नहीं जीवन से जुड़ी हैं 

कार्तिक के महीने में पवित्र नदियों में स्नान, तुलसी पूजन और दीपदान का विशेष महत्व होता है। कार्तिक मास के उत्सव, नदी केन्द्रित हैं। अपने आस पास जो भी नदी झील, सरोवर होता हैं। वहाँ स्नान किया जाता है। प्रतिदिन स्नान और तुलसी पूजन के साथ उत्सव नवम्बर को और भी जीवंत करते हैं। 

अहोई अष्टमी (1 नवम्बर) पुत्रवती महिलाएं पुत्र की लम्बी आयु और उसके सुखमय जीवन की कामना के लिये निर्जला व्रत रखती हैं। बेटों के लिए अहोई उत्सव व्रत अब बेटियों के लिए भी रखा जाने लगा है यानि संतान के लिए। 

रास महोत्सव (5 से 7 नवंबर) माजुली नलबारी और असम के सभी क्षेत्र में मनाया जाता है। वैष्णव सत्रों में पारंपरिक लोक नृत्य और रासलीला के द्वारा भगवान कृष्ण के जीवन को प्रदर्शित किया जाता है। धनतेरस (6 नवम्बर) को खूब खरीदारी की जाती है। काली चौदस नरक चतुर्थी (7 नव.) फिर दीपावली उत्सव (8 नवम्बर) धूमधाम से मिट्टी के दिए जलाकर मनाया जाता है। लक्ष्मी जी की पूजा खील बताशे से ही होती है ताकि गरीब अमीर सब करें। लेकिन मेवा, मिठाई खूब खाया जाता है।

दिवाली के अगले दिन पर्यावरण और समतावाद का संदेश देता, गोर्वधन पूजा अन्नकूट (10 नवम्बर) का उत्सव दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाला कृष्ण प्रेमी परिवार, सामूहिक रुप से मनाता है। जिसमें 56 भोग बनते हैं।

यम द्वितीया का त्यौहर, भाई दूज, चित्रगुप्त पूजा (कलम दवात पूजा), (11 नवम्बर) मथुरा में बहन भाई यमुना जी में नहा कर मनाते हैं। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया को विश्राम घाट पर यमराज और यमुना जी का मिलन हुआ था। यमुना जी भाई को मिल कर बहुत प्रसन्न हुईं। उनके लिए स्वयं भोजन बनाया। यमराज बहन के व्यवहार से प्रसन्न होकर बोले कि वह उनसे कोई भी वरदान मांगे। यमुना जी बोली, जो बहन भाई आज के दिन यहां स्नान करेंगे या आज के दिन भाई, बहन के घर जाकर भोजन करेगा, उसे यमपुरी न जाना पड़े। कहते हैं कि विवाह के बाद कृष्ण भी पहली बार सुभद्रा से यहीं मिले थे। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को होने वाली यह पूजा कायस्थ समुदाय के आराध्य देव भगवान चित्रगुप्त को समर्पित है, जो सभी जीवों के कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं।

लाभ पंचमी (सौभाग्य पंचमी) का त्योहार 14 नवंबर को मनाया जाएगा। यह दीपावली उत्सव का अंतिम दिन होता है, जिसे विशेष रूप से गुजरात और व्यावसायिक समुदायों में नए व्यापार की शुरुआत और बही-खातों के पूजन के लिए बेहद शुभ माना जाता है। केरल के पलक्कड़ जिले में स्थित श्री विशालाक्षी समेता श्री विश्वनाथ स्वामी मंदिर में आयोजित होने वाला प्रसिद्ध कल्पथि रथोत्सव (14 नवंबर से 16 नवंबर) मनाया जाएगा। इस 10 दिवसीय वार्षिक उत्सव के अंतिम 3 दिनों का उत्सव सबसे मुख्य चरण होता है, जिसमें विशाल रथों की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। पश्चिम बंगाल में जगद्धात्री पूजा  मुख्य रूप से 15 नवंबर से 19 नवंबर तक मनाई जाएगी। मुख्य पूजा (कार्तिकी शुक्ल नवमी तिथि) 18 नवंबर को होगी। देवी जगद्धात्री को देवी दुर्गा का ही एक शांत स्वरूप माना जाता है, जो पूरे विश्व की रक्षक और पालनकर्ता हैं।

सादगी, पवित्रता, लोकजीवन की मिठास का पर्व ‘छठ’ (15 नवम्बर) है। छठ पर्व में प्रकृति पूजा सर्वकामना पूर्ति, सूर्याेपासना, निर्जला व्रत के इस पर्व को स्त्री, पुरुष और बच्चों के साथ अन्य धर्म के लोग भी मनाते हैं। इन सबसे अलग बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के जन सामान्य द्वारा किसान और ग्रामीणों के रंगों में रंगी अपनी उपासना पद्धति है। सूर्य, उषा, प्रकृति, जल, वायु सबसे जो कुछ उसे प्राप्त हैं, उसके आभार स्वरुप छठ मइया की कुटुम्ब, पड़ोसियों के साथ पूजा करना है, जल में खड़े होकर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। 

कृष्ण और बलराम कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की अष्टमी से गाय चराने गए और गोपाल बने। गोपाष्टमी पर्व (17 नवम्बर) यह उत्सव श्री कृष्ण और उनकी गायों को समर्पित है। इस दिन गौधन की पूजा की जाती है। गाय और बछड़े की पूजा करने की रस्म महाराष्ट्र में गोवत्स द्वादशी के समान है। भगवान कृष्ण के जीवन में गौ का महत्व बहुत अधिक था। उनकी गौसेवा के कारण ही इंद्र ने उनका नाम गोविंद रखा। दक्षिण भारत में भी कार्तिक मास के पावन अवसर पर काकड़ आरती का प्रारंभ परम्परानुसार शरदपूर्णिमा के दूसरे दिन से होता हैं। देवउठनी एकादशी (20 नवम्बर) के अवसर पर काकड़ आरती को भव्य स्वरूप दिया जाता है। तुलसी सालिगराम के विवाह उत्सव को मनाया जाता है। वारकरी सम्प्रदाय के बुजुर्ग बताते हैं कि संत हिरामन वाताजी महाराज ने 365 वर्ष पहले काकड़ आरती की शुरुआत की थी। आरती में शामिल होने के लिए श्रद्धालु प्रातः 5 बजे विटठल मंदिर में आते हैं और भजन मंडलियां पकवाद, झांज, मंजीरों एवं झंडियों के साथ नगर भ्रमण करती है। प्रत्येक मंदिर में सामुहिक काकड़ा जलाकर काकड़ आरती प्रातः 7 बजे तक प्रशाद वितरण के साथ सम्पन्न होती है। उत्तर भारत में प्रभात फेरी निकाली जाती है। अक्षय नवमी (18 नव.) इस दिन मुख्य रूप से आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है, क्योंकि माना जाता है कि इसमें भगवान विष्णु और सभी देवी-देवताओं का वास होता है। आंवले के पेड़ के नीचे सात्विक भोजन पकाने और पूरे परिवार के साथ मिलकर खाने का विशेष महत्व है। खाटू श्याम जी का जन्मोत्सव 20 नवंबर को मनाया जाएगा। भीष्म पंचक 20 नवंबर 24 नवंबर तक मनाया जाएगा। यह पांच दिवसीय व्रत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवउठनी एकादशी) से शुरू होकर कार्तिक पूर्णिमा तक चलता है।  देवउठावनी (20 नव.21नव.) एकादशी से सभी मांगलिक कार्य शुरु हो जाते हैं।  तुलसीजी और सालिगराम का विवाह उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। सालिगराम के बराती भगवान की बारात में जमकर नाचते हुए तुलसी जी के घर जाते हैं। उत्तर भारत में प्रभात फेरी निकाली जाती है। कार्तिक पूर्णिमा (24 नवंबर) को त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहते हैं। त्रिपुरास राक्षस पर शिव की विजय का उत्सव है। शास्त्रों में वर्णित है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन पवित्र नदी, सरोवर एवं गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, गंडक, कुरुक्षेत्र अयोध्या, काशी में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। इसे देव दीपावली गंगा दीपावली के रूप में मनाते हैं। गंगा नदी और देवी देवताओं के सम्मान में घरों में रंगोली बना कर तेल के दियों से सजाते हैं। 

 महाभारत काल में हुए 18 दिनों के युद्ध के बाद की स्थिति से युधिष्ठिर कुछ विचलित हो गए तो श्री कृष्ण पाण्डवों के साथ गढ़ खादर के विशाल रेतीले मैदान में आए। कार्तिक शुक्ल अष्टमी को पाण्डवों ने स्नान किया और कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी तक गंगा किनारे यज्ञ किया। इसके बाद दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए दीपदान करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दिन गंगा स्नान का और विशेष रुप से गढ़मुक्तेश्वर में स्नान करने का विशेष महत्व है। यह देश भक्ति से भी जुड़ा हैं। इस दिन बहादुर सैनिक जो भारत के लिए लड़ते हुए शहीद हो गए हैं, उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। गुरू नानक जयंती (24नवंबर) को उत्सव की तरह मनाया जाता है। गुरुद्वारों में शबद कीर्तन होता है और लंगर वरताया जाता है। जैन धर्म का धार्मिक दिवस प्रकाश पर्व है। तमिल नाडु में अरुणाचलम पर्वत की 13 किमी की परिक्रमा की जाती है। यहाँ कार्तिक स्वामी का मंदिर है।

बोइता (छोटी नाव) उत्सव या बोइता वंदना (24 नवंबर) बाली जात्रा कटक एशिया का सबसे बड़ा मेला कार्तिक पूर्णिमा को लगता है। विशाल मैदान! जिसका मुझे अंतिम छोर नजर नहीं आ रहा था जो महानदी के गडगड़िया घाट पर लगता है। बाली जात्रा कटक, 2000 साल पुराने समुद्री संस्कृतिक संबंधों को दर्शाता है। प्राचीन काल में यहां के ओड़िआ नाविक व्यापारी जिन्हें ‘साधवा’ कहा जाता था। जावा, सुमात्रा, बोर्नियो (इंडोनेशिया), वर्मा (म्यांमार) सिलोन (श्रीलंका) से व्यापार करते थे। कार्तिक पूर्णिमा के दिन से यह 4 महीने के लिए व्यापार के लिए निकलते थे। इस समुद्री यात्रा में हवा इनका साथ देती थी। पाल वाली नाव हवा की दिशा और पवन ऊर्जा पर निर्भर यह नाविक, समुद्री व्यापारी, व्यापार के लिए चल देते थे। इस बड़ी-बड़ी जहाजनुमा नाव को ‘बोइतास’ कहा जाता है। जब यह व्यापार को जाते थे तो परिवार की महिलाएं उनकी कुशल वापसी के लिए अनुष्ठान करती थीं। जिसे ‘बोइता वंदना’ कहते हैं।

लोक चाय उत्सव (24,25,26 नवम्बर) को हातिपति टी एस्टेट, बिश्वनाथ चरियाली, असम और अरुणाचल की हरि भरी पहाड़ियों में फोक टी फैस्टिवल एक अनूटा कार्यक्रम है। सामाजिक समरसता का प्रतीक ‘वन भोजन’ भी कार्तिक मास में आयोजित किए जाते हैं। इसमें कुछ लोग मिलकर अपनी सुविधा के दिन, अपना बनाया खाना लेकर प्राकृतिक परिवेश में पिकनिक मनाते हैं। शाम को पास में जो भी नदी, झील हो वहाँ दीपक जला कर लौटते हैं।

माजुली महोत्सव (27 से 29 नवम्बर) पूर्वाेत्तर भारत में दुनिया के सबसे बड़े नदी द्वीप, असम में लुइत नदी के तट पर मनाया जाता है। जो द्वीप की समृद्ध संस्कृति और प्रचुर प्राकृतिक सौन्दर्य को दर्शाता है। रण उत्सव (1 नवंबर से शुरू गुजरात का रण उत्सव अपनी रंगीन कला और संस्कृति के लिए विश्व प्रसिद्ध है यह 7 मार्च तक चलेगा।

भगवान बाल्मिकी आश्रम, रामतीर्थ मंदिर अमृतसर में 3 किमी परीधि का सरोवर है। कार्तिक मास की पूर्णिमा को यहाँ चार दिवसीय मेला लगता है। ‘माता सीता की बावली’ जहाँ वे स्नान करतीं थीं। ऐसी मान्यता है कि उसमें नहाने से संतान की प्राप्ति होती है और वहां ईंटो का घर बनाने से अपना घर बन जाता है। सीता जी को भी तो असहायावस्था में भगवान बाल्मीकि पिता तुल्य का घर मिला और वे लव कुश पुत्रों की मां बनी।

 कार्तिक मास में तीर्थस्थान पर स्नान करते हैं। धर्म और लोककथाओं के बाद उत्सव की एक महत्वपूर्ण उत्पत्ति कृषि है। धर्म और लोककथाओं के साथ, उत्सव में नदियों का भी महत्व हैं। धार्मिक स्मरणोत्सव और अच्छी फसल के लिए धन्यवाद दिया जाता है। रवि की फसल की बुआई हो जाती है फिर बड़ी श्रद्धा और उत्साह से उत्सव मनाते हैं। इन सभी उत्सवों में प्रकृति वनस्पति और जल है। इसी तरह अब हमें नदियों को प्रदूषित होने से युद्ध स्तर से बचाना होगा क्योंकि नदी नहीं तो हम नहीं।