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छत्रपति शिवाजी महाराज: स्वराज्य की अवधारणा, राज्यदर्शन और भारतीय राजनीतिक चेतना

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छत्रपति शिवाजी महाराज: स्वराज्य की अवधारणा, राज्यदर्शन और भारतीय राजनीतिक चेतना 


भारतीय इतिहास में छत्रपति शिवाजी महाराज का व्यक्तित्व केवल एक वीर योद्धा या क्षेत्रीय शासक के रूप में सीमित नहीं किया जा सकता। वे एक ऐसे युगपुरुष थे जिन्होंने राजनीतिक सत्ता को नैतिकता, संस्कृति और जनकल्याण से जोड़कर स्वराज्य की एक मौलिक भारतीय अवधारणा प्रस्तुत की। 17वीं शताब्दी का भारत विदेशी सत्ता, धार्मिक असहिष्णुता, आर्थिक शोषण और सामाजिक असुरक्षा से ग्रस्त था। ऐसे समय में शिवाजी महाराज का उदय केवल राजनीतिक विद्रोह नहीं, बल्कि भारतीय आत्मचेतना का पुनर्जागरण था।

शाह जी महाराज और जीजाबाई के पुत्र शिवाजी का जन्म पुणे के पास शिवनेरी के दुर्ग में हुआ था। प्रताप की भांति शिवाजी भी राष्ट्रीयता के जीवंत परिचायक थे। शिवाजी का सारा संघर्ष उस कट्टरता और उद्दंडता के विरुद्ध था, जिसे औरंगजेब जैसे घिनौने शासकों और इसकी छत्रछाया में पलने वाले लोगों ने अपना रखा था। 1674 की ग्रीष्म ऋतु में शिवाजी ने धूमधाम से सिंहासन पर बैठकर स्वतंत्र भारत की नींव रखी, और जनता को भय मुक्त किया। उनका बचपन अपनी मां के मार्गदर्शन में बीता। वे धार्मिक स्वभाव वाली वीरांगना नारी थीं। उन्होंने बालक शिवा को रामायण महाभारत और अन्य वीर आत्माओं की कहानी सुना कर बड़ा किया। दादा कोंड देव के संरक्षण में उन्हें सभी सामयिक युद्ध और विधाओं में निपुण बनाया। संत रामदेव के संपर्क में आने से शिवाजी पूर्णतया राष्ट्र प्रेमी कर्तव्य परायण और कर्मठ योद्धा बने। बचपन में ही शिवाजी किला जीतने का खेल खेला करते थे। युवावस्था में आते ही उनका खेल वास्तविक कर्म बनकर शत्रुओं पर आक्रमण करके किले जीतना बन गया। पुरंदर और तोरण जैसे किलों पर अधिकार जमाते ही अत्याचारी शासक चिंतित हो गए। शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र संभाजी महाराज उनके उत्तराधिकारी थे। संभाजी को विश्व का प्रथम बाल साहित्यकार माना जाता है। 14 वर्ष की आयु तक बुध भूषण (संस्कृत) नखशिख (हिंदी) नायिका भेद, सातसतक इत्यादि ग्रंथों की रचना करने वाले संभाजी विश्व के प्रथम बाल साहित्यकार बने। मराठी, हिंदी, फारसी, संस्कृत, अंग्रेजी, कन्नड़ आदि भाषाओं पर उनका प्रभुत्व था। शिवाजी के बढ़ते प्रताप से आतंकित बीजापुर का शासक आदिलशाह जब शिवाजी को बंदी ना बना सका, तो उसने शिवाजी के पिता शाह जी को बंदी बना लिया। शिवाजी ने नीति और साहस का परिचय देते हुए छापामारी युद्ध नीति से पिता को आजाद कराया। तब बीजापुर के शासक ने शिवाजी को जीवित अथवा मृत पकड़ लाने का आदेश देकर अपने मक्कार सेनापति अफजल खान को भेजा। उसने भाईचारे और सुलह का झूठा नाटक रच कर शिवाजी को अपनी बाहों की घेरे में लेकर मारना चाहा, पर रणनीतिकार शिवाजी ने अपने हाथ में छिपे बघनखे से उसको मौत के घाट उतार दिया। पुरंदर के किले को बचा पाने में असमर्थ जानकर शिवाजी ने महाराज जय सिंह से पुरंदर की संधि कर ली। मराठा सैन्य व्यवस्था के विशिष्ट लक्षण थे उनके किले। विवरण कारों के अनुसार शिवाजी के पास 250 किले थे। जिनकी मरम्मत पर वह बड़ी रकम खर्च करते थे। शिवाजी ने कई दुर्गों पर अधिकार किया। जिनमें से एक था सिंहगढ़ दुर्ग। जिसे जीतने के लिए उन्होंने तानाजी मालसुरे को भेजा था। इस दुर्ग को जीतने के दौरान तानाजी ने वीरगति पाई। (गढ़ आल्हा पण सिंह गेला) गढ़ तो हमने जीत लिया पर सिंह हमें छोड़कर चला गया। आगरा के दरबार में शिवाजी औरंगजेब से मिलने के लिए पहुंचे। उचित सम्मान न मिलने पर औरंगजेब को उन्होंने विश्वास घाती कहा। जिसके परिणाम स्वरुप औरंगजेब ने शिवाजी और उनके पुत्र संभाजी को जयपुर भवन में कैद कर लिया। वहां से शिवाजी 13 अगस्त 1666 ई० को फलों की टोकरी में छिपकर फरार हो गए और रायगढ़ पहुंचे। शिवाजी गोरिल्ला युद्ध के आविष्कारक थे। इस युद्ध का उल्लेख उस काल में रचित शिव सूत्र में मिलता है। यह एक छापामार युद्ध प्रणाली थी। हिंदू पद पादशाही के संस्थापक विख्यात समर्थ गुरु रामदास उनके गुरु थे। संपूर्ण भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी तक उन्होंने 1100 मठ तथा अखाड़े स्थापित किए। स्वराज स्थापना के लिए लोगों को प्रेरित किया। अखाड़े की स्थापना का श्रेय उन्हें ही जाता है। शिवाजी हनुमान भक्त समर्थ गुरु रामदास की आज्ञा से ही कार्य करते थे। शिवाजी को महान शिवाजी महाराज बनाने में उनके गुरु का ही योगदान था। छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी मां तुलजा भवानी महाराष्ट्र के तुलजापुर में स्थापित हैं। वह उन्हीं की उपासना करते थे। मान्यता है कि शिवाजी को खुद मां ने प्रकट होकर तलवार प्रदान की थी। यह तलवार लंदन के संग्रहालय में रखी है। शिवाजी महाराज के लिए स्वराज केवल सत्ता नहीं संस्कार था।

छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन इस सत्य का सजीव प्रमाण है कि राष्ट्र की रक्षा केवल शस्त्र और शास्त्रों से नहीं अपितु दोनों के समन्वय से ही सुदृढ़ और स्थायी स्वराज्य का निर्माण होता है। शास्त्र उन्हें विवेक, धर्म और नीति प्रदान करते थे, तो शस्त्र अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस। शिवाजी महाराज ने कभी शास्त्र को शस्त्र से पृथक नहीं माना।

उनकी दृष्टि में शस्त्र का प्रयोग तभी धर्मसंगत था, जब वह शास्त्रसम्मत हो जब उसका उद्देश्य विजय नहीं, बल्कि न्याय हो। यही कारण है कि उनका स्वराज्य केवल शक्ति का विस्तार नहीं बना, बल्कि संस्कारों से सिंचित राष्ट्रचेतना का आधार बना। शिवाजी महाराज ने यह सिखाया कि बिना शास्त्र के शस्त्र क्रूरता बन जाता है और बिना शस्त्र के शास्त्र निष्क्रिय आदर्श रह जाता है।

अतः शिवाजी महाराज की महानता इसी संतुलन में निहित है। उन्होंने भारत को यह अमूल्य संदेश दिया कि जब शास्त्र दिशा दें और शस्त्र उसकी रक्षा करें, तभी राष्ट्र आत्मनिर्भर, स्वाभिमानी और चिरस्थायी बनता है। यही शिवाजी महाराज का स्वराज्य था। जहां शास्त्र और शस्त्र दोनों राष्ट्रधर्म के समान स्तंभ थे।