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भारत की संसदीय विरासत और ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज

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भारत की संसदीय विरासत और ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज 

28वीं राष्ट्रमंडल अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन  

भारत में आयोजित होने वाला यह 28वां राष्ट्रमंडल अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन एक महत्वपूर्ण आयोजन है। यह आयोजन भारत की संसदीय विरासत को प्रदर्शित करता है और वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूती से उठाता है। इस सम्मेलन में दुनिया भर के संसदीय नेता एकत्र होते हैं। यहां वे अपने अनुभव साझा करते हैं और साझा चुनौतियों के समाधान पर चर्चा करते हैं। यह आयोजन न केवल भारत की संसदीय विरासत को प्रदर्शित करता है, बल्कि वैश्विक दक्षिण की आवाज को भी मजबूती से उठाता है। इस सम्मेलन में भारत की संसदीय प्रणाली की विरासत और इसकी विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा की गई। यह प्रणाली वैश्विक दक्षिण के लिए एक प्रेरणा का स्रोत है, जो उन्हें अपने देशों में संसदीय प्रणाली को मजबूत करने के लिए प्रेरित करती है। यह आयोजन न केवल भारत की संसदीय परंपरा को दिखाएगा, बल्कि वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच सहयोग और समझ बढ़ाने में भी बहुत महत्वपूर्ण काम करेगा। इससे इन देशों को अपनी संसदीय प्रणाली को और मजबूत करने में मदद मिलेगी और वे एक दूसरे से बहुत कुछ सीख सकेंगे।

28वीं राष्ट्रमंडल अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन एक महत्वपूर्ण मंच है जहां विश्व के विभिन्न हिस्सों के नेता एक साथ आते हैं और अपने देशों की संसदीय प्रणालियों में सुधार लाने के लिए नए विचारों और रणनीतियों पर चर्चा करते हैं। यह सम्मेलन निश्चित रूप से वैश्विक स्तर पर संसदीय सहयोग को मजबूत करने और लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण योगदान करेगा। 28वीं राष्ट्रमंडल अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन (सीएसपीओसी) हाल ही में नई दिल्ली में 14 से 16 जनवरी 2026 तक हुआ। यह तीन दिन का आयोजन भारत के लिए काफी खास था, क्योंकि यह चौथी बार था जब भारत ने इसकी मेजबानी की पहले 1971, 1986 और 2010 में हो चुका था। इस बार की खास बात यह रही कि इसमें अब तक की सबसे बड़ी भागीदारी देखने को मिली। कुल 42 राष्ट्रमंडल देशों और 4 अर्ध-स्वायत्त संसदों के 61 स्पीकर्स और पीठासीन अधिकारी शामिल हुए। यह सम्मेलन हर दो साल में होता है और इसका मकसद राष्ट्रमंडल देशों की संसदों के बीच अनुभव साझा करना, चुनौतियों पर बात करना और लोकतंत्र को मजबूत बनाने के तरीके तलाशना है। 1969 में कनाडा के स्पीकर लुसियन लामोरेक्स ने इसकी शुरुआत की थी, तब से यह मंच संसदीय सहयोग का एक मजबूत जरिया बना हुआ है।

भारत की मेजबानी और खास महत्व: भारत की संसदीय परंपरा प्राचीन वैदिक युग से जुड़ी हुई है। उस समय में, सभाएं और समितियां बहुत महत्वपूर्ण थीं। वे निर्णय लेने की प्रक्रिया में बड़ा योगदान करती थीं। यह परंपरा आज भी जारी है और संसद में विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्य मिलते हैं और देश के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं। इन सभाओं और समितियों में लोग अपने विचार साझा करते हैं और चर्चा करते हैं। इससे देश के विकास और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती मिलती है। यह परंपरा हमारे देश की लोकतांत्रिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भारत में यह आयोजन इसलिए भी यादगार रहा क्योंकि यह हमारी संसदीय विरासत को दुनिया के सामने रखने का मौका था। हमारी लोकतांत्रिक परंपरा बहुत पुरानी है वैदिक काल की सभाओं और समितियों से लेकर आज की संसद तक। 1950 में संविधान लागू होने के बाद भारत ने दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनकर दिखाया कि विविधता में एकता कैसे संभव है। संविधान ने हमें समानता, न्याय और अभिव्यक्ति की आजादी जैसे मूल अधिकार दिए, जो आज भी हमारी ताकत हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 जनवरी को संविधान सदन के ऐतिहासिक केंद्रीय हॉल में सम्मेलन का उद्घाटन किया। उन्होंने कहा कि भारत ने अपनी विविधता को लोकतंत्र की ताकत बना लिया है। लोकतंत्र हमारे खून में, हमारी सोच में और संस्कारों में बस्ता है। उन्होंने बताया कि मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं की वजह से भारत ने स्थिरता, गति और बड़े पैमाने पर काम करने की क्षमता दिखाई है। भारत ने वैक्सीन उत्पादन में दुनिया में नंबर एक का स्थान हासिल किया, स्टील उत्पादन में दूसरे नंबर पर है, और UPI जैसी डिजिटल भुगतान प्रणाली ने पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। पिछले कुछ सालों में करीब 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले। यह सब लोकतंत्र के नतीजे हैं, जहां लोग शासन के केंद्र में होते हैं। प्रधानमंत्री ने ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने पर जोर दिया। भारत हर वैश्विक मंच पर विकासशील देशों के मुद्दों को उठाता है, जैसे G20 में किया था। उन्होंने कहा कि भारत वैश्विक चुनौतियों के समाधान दे रहा है और राष्ट्रमंडल के साथ मिलकर काम करने को तैयार है।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सम्मेलन की अध्यक्षता की और कई मौकों पर भारत की संसदीय यात्रा पर बात की। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाएं तभी मजबूत रहती हैं जब वे पारदर्शी, समावेशी और लोगों के प्रति जवाबदेह हों। बिरला ने जोर दिया कि आज के डिजिटल दौर में गलत सूचना, साइबर अपराध और सामाजिक विभाजन जैसी समस्याओं से निपटने के लिए सभी को मिलकर काम करना होगा।

मुख्य चर्चाएं और विषय: सम्मेलन में सबसे ज्यादा बात डिजिटल परिवर्तन पर हुई। खास तौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सोशल मीडिया के संसद में इस्तेमाल पर गहन चर्चा हुई। एक सत्र में AI के नैतिक उपयोग पर फोकस था। यह कैसे पारदर्शिता, दक्षता और जवाबदेही बढ़ा सकता है, लेकिन दुरुपयोग के खतरे भी हैं। सोशल मीडिया से गलत जानकारी तेजी से फैलती है, जो लोकतंत्र को कमजोर कर सकती है। इसलिए सांसदों को ज्यादा प्रभावी बनाने, नागरिकों को शामिल करने और संसद की भूमिका को डिजिटल युग में मजबूत करने पर विचार हुए।

नागरिक भागीदारी एक बड़ा मुद्दा रहा। सिर्फ वोट देने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, लोगों को संसद की गतिविधियों में हिस्सा लेने का मौका मिलना चाहिए। भारत के डिजिटल इंडिया कार्यक्रम का उदाहरण दिया गया, जिसने सरकारी सेवाओं को आम आदमी तक आसानी से पहुंचाया और उन्हें सशक्त बनाया। पंचायती राज जैसी व्यवस्था से ग्रामीण स्तर पर लोकतंत्र मजबूत हुआ है, जहां महिलाओं की बड़ी भूमिका है।

ग्लोबल साउथ के देशों ने अपनी आवाज बुलंद की। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के विकासशील देश जलवायु परिवर्तन, गरीबी और असमानता जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। यह सम्मेलन उत्तरी देशों के वर्चस्व को चुनौती देते हुए दक्षिण की आवाज को मजबूत करने का मंच बना।

समापन और आगे की राह: 16 जनवरी को समापन सत्र में ओम बिरला ने 29वीं सीएसपीओसी की जिम्मेदारी यूके के स्पीकर लिंडसे होयल को सौंपी। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन लोकतांत्रिक विचारों के आदान- प्रदान की परंपरा को और मजबूत करने में कामयाब रहा। दूसरे देशों के प्रतिनिधियों ने भारत की मेजबानी की खूब तारीफ की और कहा कि यह वैश्विक चुनौतियों से निपटने में बहुत उपयोगी साबित हुआ।

यह सम्मेलन बस एक आम बैठक नहीं था यह सच में कुछ खास था। तीन दिन की बातचीत के बाद सबने मिलकर ये महसूस किया कि बात करके, एक-दूसरे के अनुभव सुनकर दुनिया की बड़ी समस्याओं का हल निकाला जा सकता है। भारत ने अपनी पुरानी संसदीय परंपरा, डिजिटल ताकत (जैसे UPI और e-Parliament) और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ वाली सोच को सबके सामने रखा। लेकिन साथ ही ये भी समझ आया कि हमारा तरीका हर देश के लिए कॉपी-पेस्ट नहीं किया जा सकता। हर जगह की अपनी परिस्थितियां, अपनी चुनौतियां होती हैं। इसलिए बेहतर ये है कि हम अपना अनुभव शेयर करें, और बाकी देश अपनी जरूरत के हिसाब से उसे अपनाएं बिना जबरदस्ती के। डिजिटल दौर में AI और सोशल मीडिया जैसे टूल बहुत काम आ सकते हैं, संसद को तेज, पारदर्शी और बेहतर बना सकते हैं। लेकिन खतरा भी उतना ही है फेक न्यूज, साइबर अटैक, समाज में फूट। इसलिए ऐसे मंचों पर सिर्फ टेक्नोलॉजी अपनाने की बात नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसके साथ नैतिक नियम, अच्छे कानून और जवाबदेही का पूरा ध्यान रखना पड़ेगा। ताकि ये चीजें लोकतंत्र को मजबूत करें, कमजोर न करें।

ये आयोजन ग्लोबल साउथ की बढ़ती ताकत का साफ संकेत था। विकासशील देशों ने अपनी आवाज बुलंद की, और दिखाया कि अब हम सिर्फ सुनने वाले नहीं, बल्कि फैसले में बराबर की हिस्सेदारी चाहते हैं। ओम बिरला जी ने आखिरी दिन कहा कि लोकतंत्र तभी मजबूत और मायने रखता है, जब वो पारदर्शी हो, सबको साथ ले, लोगों की बात सुने और उनके लिए जवाबदेह रहे। 

अंत में, ओम बिरला जी ने अगली 29वीं बैठक की जिम्मेदारी यूके के स्पीकर सर लिंडसे होयल को सौंपी। सबने भारत की मेहमान नवाजी और आयोजन की खूब तारीफ की। कुल मिलाकर, ये सम्मेलन उम्मीद की एक नई किरण लेकर आया। अगर ऐसे मंचों पर सिर्फ बातें नहीं, बल्कि असली सहयोग, साझा काम और लंबे रिश्ते बनें, तो लोकतंत्र दुनिया भर में और गहराई से जड़ें पकड़ सकता है खासकर विकासशील देशों में। संसदें सिर्फ आवाज सुनने वाली जगह नहीं रहेंगी, बल्कि लोगों की उम्मीदों और आकांक्षाओं को सच करने वाली ताकत बनेंगी। भारत ने इसमें एक बड़ा, मजबूत कदम उठाया है। और ये सफर अभी जारी रहेगा।