डिजिटल भारत से आत्मनिर्भर भारतः तकनीक, नवाचार और स्वदेशी समाधान
"IT+IT=(Indian Talent +Information Technology = India Tomorrow )"
र्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह सूत्र आज के बदलते भारत के रूप कों बड़ी ही तकनीकी रूप में बयान करती हैं। इसकी शुरुआत एक दशक पहले 2015 में डिजिटल इंडिया के तहत हुई थी जो आत्मनिर्भर भारत की पहल दूरगामी योजना थी। इन वर्षों में, भारत ने यह सिद्ध कर दिया कि कैसे तकनीक और नवाचार के सही उपयोग से विदेशी निर्भरता को कम किया जा सकता हैं।
आत्मनिर्भरता की रीढ़: डिजिटलीकरण डिजिटल इंडिया परियोजना ने देश के विभिन्न भागों तक तकनीक को पहुँचाया हैं। जन-धन योजना, आधार और मोबाइल फोन जैसी जैम ट्रिनिटी द्वारा सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता लाकर भ्रष्टाचार को कम करने का प्रयास किया गया। UPI यूनिफाइड पेरेंट्स इंटरफेस) इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। जहां विश्व के कई देश अभी भी अपने पुराने भुगतान तंत्र में उलझे हैं, वहीं अकेला कुल रियल-टाइम डिजिटल भुगतान का लगभग 46 प्रतिशत भारत में होता हैं। इसकी विशेषता उसकी पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक का होना है जिसे आज विकसित देश जैसे फ्रांस और सिंगापुर भी अपना रहें हैं।
स्टार्टअप संस्कृति आत्मनिर्भरता की असल पहचान: आज भारत स्टार्टअप के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम वाला देश हैं, जहां भारतीय युवा अपनी आसपास के समस्याओं का समाधान स्टार्टअप के माध्यम से खुद ही ढूंढ रहें है। अगर उनकी संख्या की बात की जाए तो 1.25 लाख से अधिक स्टार्टअप और 100 से अधिक यूनिकॉनर्स हैं। पहले यहीं युवा विदेशी कंपनियों के लिए काम करते थे पर अब एंग्री-टेक, स्पेस-टेक, और हेल्थ-टेक में अपना स्वदेशी समाधान ढूंढ रहें हैं, साथ ही सफल भी हो रहें हैं। ISRO ( जैसे -चंद्रयान -3), DRDO (जैसे - अग्नि, पृथ्वी) के विभिन्न सफल परीक्षण की सफलता भारतीय कौशल का वैश्विक प्रमाण हैं।
शिक्षा और कौशल विकास से सामाजिक डिजिटलीकरण: स्वंय (SWAYAM) और दीक्षा (DIKSHA) जैसे प्लेटफार्म ने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रणाली जो डिजिटल माध्यम से प्राप्त किए जा रहें हैं। इनमें IIT, IIM जैसी उच्च कोटि के संस्थान टेक्निकल एवं नॉन टेक्निकल विषयों की शिक्षा प्रदान कर रहें हैं।
यहां नए नए कोर्स जैसे- सायबर क्राइम, डाटा साइंस इत्यादि शामिल हैं।
भाषाई बाधाओं को तोड़ना: ‘भाषिणी’ और AI जैसी तकनीक तभी सफल हैं जब वह अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। भारतीय भाषाई विविधता अक्सर एक बाधा रही है। लेकिन अब ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ के जरिए इसका स्वदेशी समाधान निकाला गया हैं जो कभी भी और कही भी लोगों के द्वारा आपने कार्य में उपयोग किया जा सकता हैं। जैसे नार्थ भारत के व्यक्ति द्वारा दक्षिण भारतीय संस्कृति के अच्छी तरह समझ सकते हैं तो वहीं दक्षिण भारतीयों द्वारा नार्थ भारत या नार्थ ईस्ट भारत के भाषाओं को समझा जा सकता हैं।
डेटा संप्रभुता (Data sovereignty)
जिस प्रकार बीसवीं सदी तेल को महत्वपूर्ण माना जाता है उसी प्रकार डिजिटल युग में डेटा ही सबसे बड़ी संपत्ति मानी जा रही हैं। पहले विदेशी कंपनियां भारतीय डाटा को अपने ही देश में संग्रह करते थे परंतु अब भारत अपने डेटा को देश की सीमाओं के भीतर सुरक्षित रखने के लिए अपने स्वंय के डेटा सेंटर और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर मेघराज विकसित कर रहा हैं।
मोबाइल विनिर्माण (Mobile Manufacturing) : 2014 तक भारत अपनी जरूरत के 92 प्रतिशत मोबाइल फोन आयात करता था। वहीं आज भारत में बिकने वाले 99 प्रतिशत मोबाइल फोन भारत में ही निर्मित हो रहें हैं जो आत्मनिर्भरता का बेमिसाल उदाहरण है। यह तभी संभव हो पाया जब भारतीय सरकार ने विभिन्न कंपनियों को भारत में बिकने वाली फोन के प्रोडक्शन यूनिट भारतीय सीमाओं में ही स्थापित करने के लिए मजबूर की गई। जिस वजह से ही आज ऐसा संभव हो पाया है। आगे की तैयारी और भी स्वदेशी भाव के साथ हमारे बीच होगी।
सॉफ्टवेयर से हार्डवेयर की ओर पीएलआई (PLI) योजना: लंबे समय तक भारत केवल एक सॉफ्टवेयर पावरहाउस था परन्तु हार्डवेयर के लिए हम चीन या अन्य देश पर निर्भर थे। 2014 के बाद, जब भारतीय सरकार के द्वारा आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा दिया गया। PLI (Production Linked Incentive) योजना के तहत, आज भारत इलेक्ट्रॉनिक्स ही विनिर्माण का क्रेन्द्र बन रहा हैं। इसके अलावा सेमीकंडक्टर चिप (Chip) के लिए भारत लगातार प्रयासरत है और इसकी सफलता या विफलता ही आगे के दिनों में भारतीय सुरक्षा को सुनिश्चित करेगी।
आगे की राह: डॉ. ए पी जे. अब्दुल कलाम ने कहा था ”आत्मनिर्भरता का अर्थ है स्वंय पर विश्वास“। डिजिटल भारत से आत्मनिर्भर भारत की यात्रा केवल आर्थिक आंकड़ों की नहीं हैं बल्कि यह तो प्रत्येक भारतीयों की स्वंय पर विश्वास है। जहां पहले तकनीक विलासिता के रूप को लिए हुए थी वहीं अब यह प्रगति का अचूक तलवार मात्र हैं। यदि हम इसी गति से नवाचार पर ध्यान केन्द्रित करते रहें तो वर्ष 2047 तक भारत न केवल पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर होगा, बल्कि विश्व को दिशा दिखाने वाला एक तकनीकी महाशक्ति भी होगा।
लेखिका दीनदयाल उपाध्याय कॉजेल, दिल्ली विवि में सह प्राध्यापक है।




