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मैदान से स्क्रीन तक: बच्चों का बदलता खेल-संसार

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मैदान से स्क्रीन तक: बच्चों का बदलता खेल-संसार

आधुनिक दौर की तेज रफ्तार जीवनशैली में बच्चों की रुचि मोबाइल, इंटरनेट और ऑनलाइन गेम्स की ओर निरंतर बढ़ रही है। पूर्वकाल में बच्चे स्कूल से लौटकर मैदान में खेलते, साइकिल चलाते और मित्रों संग सक्रिय समय बिताते थे, जिससे उनका शारीरिक व मानसिक विकास सहज रूप से होता था। किंतु आज परिदृश्य बदल चुका है। आधुनिक तकनीक और डिजिटल साधनों की बढ़ती पकड़ ने बच्चों को घर तक सीमित कर दिया है, जहां उनका अधिकांश समय स्क्रीन पर ही व्यतीत होता है। यह बदलाव उनकी जीवनशैली, स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार पर गहरा असर डाल रहा है। साल 2021 में 29 देशों के 1.88 लाख से अधिक बच्चों पर हुए अध्ययन में पाया गया कि उनका बाहरी समय अनुशंसित 120 मिनट प्रतिदिन से कम है। भारत की स्थिति भी गंभीर है। हालिया शोध बताते हैं कि पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे प्रतिदिन औसतन 2.2 घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं, जबकि इंडियन अकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स केवल एक घंटे की सीमा सुझाती है। इस बढ़ते स्क्रीन टाइम का असर शारीरिक गतिविधियों पर साफ दिखाई देता है। 2018 की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में केवल एक-तिहाई बच्चे और किशोर ही प्रतिदिन कम से कम 60 मिनट की मध्यम से तीव्र शारीरिक गतिविधि (जैसे, तेज चलना, साइकिल चलाना, दौड़, नृत्य, फुटबॉल, तैराकी आदि) कर पाते हैं। शोध के अनुसार, जो बच्चे प्रतिदिन तीन घंटे से अधिक समय स्क्रीन पर बिताते हैं, उनमें मांसपेशियों की कमजोरी, प्रतिरक्षा तंत्र की गिरावट, उच्च रक्तचाप, असामान्य कोलेस्ट्रॉल स्तर और इंसुलिन प्रतिरोध जैसी समस्याएं अधिक पाई जाती है। लखनऊ में हुए एक अध्ययन में भी पाया गया कि 6 से 12 वर्ष के लगभग 30 प्रतिशत बच्चे मोटापे से ग्रस्त हैं। इस प्रवृत्ति के मूल में स्क्रीन के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न निष्क्रिय जीवनशैली तथा असंतुलित आहार। दृष्टि संबंधी समस्याएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। एलवी प्रसाद आई इंस्टीट्यूट के अनुसार, यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो 2050 तक भारत में आधे बच्चे मायोपिया (दूर की वस्तुएं धुंधली दिखना) से प्रभावित हो सकते हैं। डिजिटल माध्यमों में निरंतर बदलते दृश्य, ध्वनियां तथा त्वरित प्रतिक्रियाएं बच्चों के मस्तिष्क में डोपामिन का स्तर असामान्य रूप से बढ़ा देती हैं। डोपामिन का यह क्षणिक ‘फील-गुड’ प्रभाव बच्चों को बार-बार उसी अनुभव की ओर आकर्षित करता है। धीरे-धीरे यह प्रवृत्ति लत का रूप धारण कर लेती है, जिसके परिणामस्वरूप बच्चे मोबाइल और गेम से दूरी बनाने में असमर्थ हो जाते हैं। यह स्थिति वास्तविक जीवन की चुनौतियों, जैसे कठिन अध्ययन, खेलों में हार अथवा पारिवारिक संवाद, को बच्चों के लिए अरुचिकर और जटिल बना देती है। शहरी परिप्रेक्ष्य में सुरक्षित मैदानों और पार्कों का अभाव बच्चों को बाहरी गतिविधियों से वंचित करता है। साथ ही शिक्षा प्रणाली का बढ़ता प्रतिस्पर्धात्मक दबाव एवं कोचिंग संस्कृति उन्हें पुस्तकों तक सीमित कर देती है। अभिभावकों की व्यस्त जीवनशैली भी इस प्रवृत्ति को और प्रबल करती है। परिणामस्वरूप, बच्चे धीरे-धीरे बाहरी खेलों, पठन-पाठन के संतुलन और पारिवारिक सहभागिता से कटते जाते हैं। यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक स्तर पर भी हानिकारक है। जब बच्चे मैदान में दोस्तों के साथ खेलते हैं, तो वे सहयोग, टीमवर्क, धैर्य और सहानुभूति जैसे मूल्य सीखते हैं। हार-जीत की परिस्थितियां उन्हें भावनात्मक रूप से मजबूत बनाती हैं। उदाहरण के तौर पर, क्रिकेट या फुटबॉल जैसे खेल बच्चों को यह सिखाते हैं कि टीम में हर खिलाड़ी की भूमिका महत्वपूर्ण है और जीत-हार दोनों को स्वीकार करना सीखना चाहिए। इसके विपरीत, आभासी दुनिया में बातचीत केवल इमोजी और छोटे संदेशों तक सीमित रह जाती है, जिससे उनके सामाजिक कौशल और भावनात्मक समझ का विकास बाधित हो जाता है। समाधान की दिशा में पहला कदम है-स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के मोबाइल, टीवी और गेम खेलने का समय सीमित करें और उन्हें बाहरी खेलों के महत्व से अवगत कराएं। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट भी बताती है कि जो बच्चे रोजाना दो घंटे बाहर खेलते हैं, उनमें शारीरिक सक्रियता लगभग 27 प्रतिशत अधिक पाई जाती है। विशेषज्ञों का तर्क है कि बच्चों के लिए प्रतिदिन कम से कम दो घंटे बाहरी खेलों और धूप में समय बिताना आवश्यक है। यह अभ्यास उनकी शारीरिक फिटनेस को बनाए रखने के साथ-साथ मानसिक और भावनात्मक संतुलन भी प्रदान करता है, जिससे वे अधिक स्वस्थ, ऊर्जावान और आत्मविश्वासी बनते हैं। 

वास्तविक जीवन में अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहां परिवार शाम के समय बच्चों के साथ पार्क या मैदान में जाते हैं। इससे न केवल बच्चों की खेल गतिविधियां बढ़ती हैं, बल्कि पारिवारिक संबंध भी प्रगाढ़ होते हैं। अंततः यह स्पष्ट है कि बच्चों के समग्र विकास के लिए बाहरी खेल अनिवार्य हैं। ये केवल शारीरिक और मानसिक संतुलन ही नहीं स्थापित करते, बल्कि सहयोग, सहानुभूति, नेतृत्व, धैर्य और आत्मनिर्भरता जैसे सामाजिक मूल्यों को भी पोषित करते हैं। वास्तविक खेल बच्चों को हार-जीत का अनुभव कराते हैं, जो उन्हें जीवन की चुनौतियों के प्रति अधिक सक्षम और दृढ़ बनाता है। बदलते खेल-संसार में तकनीक का संतुलित उपयोग करते हुए बच्चों को मैदान और पारंपरिक खेलों से जोड़ना ही उनके दीर्घकालिक स्वास्थ्य, सामाजिक संतुलन और उज्ज्वल भविष्य की मजबूत नींव स्थापित करता है।