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जिमखाना क्लब : रसूखदारों का साम्राज्य अब होगा बंद - पूनम भटनागर

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  • जिमखाना क्लब : रसूखदारों का साम्राज्य अब होगा बंद

  • जिमखाना क्लब बंदी की कगार पर।

     

    कुछ दिनों से रसूखदारों का एलिट क्लब सुर्खियों का विषय बन गया है।22 मई को केंद्र सरकार की तरफ से इसे खाली करने का आदेश दिया गया। अब पहले ये जान ले कि यह क्लब कहा स्थित है।

     

    लुटियंस दिल्ली के 27.3 एकड़ में फैला यह क्लब ऐसी जगह है जहां आम आदमी का जाना मना है। इसके सदस्यों में पूर्व प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री,राजनैतिक और उद्योगपति हैं। अब 5 जून को केंद्र सरकार ने इसे रक्षा कार्यों के लिए खाली करने का अल्टीमेटम दिया है। ये कहानी 113 साल पुराना इतिहास को समेटे है। अंग्रेजों की मानसिकता से लेकर उनके ठाठ-बाट का जीता जागता उदाहरण बयां करती है और आजाद भारत की कहानी को दर्शाती  हुई कई राज भी खोलती है।

     

    2 जुलाई सन् 1913 को इसकी स्थापना हुई। सात रियासतों के शासक इसके सदस्य बने। ग्वालियर, जयपुर, जोधपुर, कश्मीर, किशनगढ़ , उदयपुर और भोपाल के नवाब इसके आजीवन सदस्य बने, तब इसका नाम इंपीरियल क्लब रखा गया।

     

    शुरुआत में यह नई राजधानी के सैन्य छावनी के लिए बनाया गया था। यह पोलो ग्राउंड किंग्सवे कैंप के क्लब का ग्राउंड विस्तार था जो 1930 की ईकाई में अलग कर दिया गया। "लीज की शर्त जो आज काल बन गई है। इस क्लब को प्राइम लोकेशन यूं ही नहीं मिल गई।

     

    1918 में यह जमीन लीज की इस शर्त पर ली गई थी कि, यहां खेलों को प्राथमिकता दी जाएगी पर लीज की शर्त यह भी थी कि, सरकार जब चाहे सार्वजनिक निर्माण के लिए इसे वापस ले सकती है, जो इस विवाद का विषय भी है।

     

    1930 के बाद यह क्लब सफदरजंग 2 में शिफ्ट किया गया। पहले यह खेल का टेनिस कोर्ट चुनिंदा अफसरों का केंद्र बन गया। ICS अधिकारी पेशे की बोली लगाते थे। अधिकारियों का दोहरा रवैया कभी भी नहीं बदला।

     

    अंग्रेज अधिकारी क्लब में मौज मस्ती करते और भारतीय बाहर ही रह जाते थे। 1947 के बाद इसके आगे से 'इंपीरियल' शब्द हटा दिया गया और इसे जिमखाना क्लब का नाम दिया गया, पर क्या वाकई 'इंपीरियल शब्द हट पाया।

     

    वहीं दोहरी मानसिकता बाद के चरणों में भी दिखाई देती रही। क्लब के पहले अध्यक्ष ऊषानाथ थे, अब तक 53 अध्यक्ष हो चुके हैं। अभी सिंह इसके अध्यक्ष हैं। भले ही विदेशी शासन खत्म हो चुका हो पर सदस्यों की मानसिकता जैसी की तैसी ही है। 27.3 एकड़ में फैले साम्राज्य-सुविधाएं जो किसी रियासत से कम नहीं है, प्रधानमंत्री आवास से सटे इस क्लब में खेल


    सुविधाएं किसी ओलम्पिक कोर्ट से कम नहीं है। टेनिस कोर्ट - देश के सबसे ज्यादा और बड़े 26 ग्रास कोर्ट, 7 सिथेटिक, 4 क्ले कोर्ट, स्क्वैश कोर्ट, 3 बिलिडन स्क्वैश कोर्ट, स्विमिंग पूल इनडोर हीटिंग।

     

    बार एंड रेस्टोरेंट- 3 बड़े लाउंज बार रेस्टोरेंट, एक लाइब्रेरी में 35,000 किताबों का संग्रह, 85 समाचार पत्र पत्रिकाएं शामिल हैं। आवासीय सुविधा- 43 टराजिंसट  रूम काटेज। अन्य सुविधाओं में बिलियर्ड्स, क्रिकेट ग्राउंड आदि।

     

    5000 लोग इसके मेंबर है, 500 कर्मचारी इसके अंदर काम करते हैं, इसकी सदस्यता के लिए 30 से 35 साल का इंतजार करना पड़ता है। कहा जाता है कि, IAS बनना आसान है पर इसका सदस्य बनना बहुत मुश्किल। पर सवाल ये है कि, इसको खाली क्यों करवाया जाना है। तो इसके लिए कई दलीलें दी गई है कि, एक तो यह प्रधानमंत्री निवास से सटा हुआ है। हालांकि वह शिफ्ट हो रहा है पर रक्षा सूत्रों की वजह से, इस पर असर पड़ेगा।

     

    दूसरा, इसके मैनेजमेंट में गड़बड़ी पाई गई है, इतने बड़े क्लब का किराया अभी तक मात्र 409 रुपया दिया जा रहा, जबकि लुटियंस जोन में 1000 करोड़ रुपये है। इस क्लब पर 47 करोड़ बकाया भुगतान है, जो अभी तक नहीं चुकाया गया। इसमें 50 करोड़ की गड़बड़ी पाई गई है। आदेश मानने का आरोप भी इसमें शामिल है, क्योंकि यहां पर सभी रसूखदार बैठते हैं।

     

    क्लब में हर महीने 25 करोड़ आते हैं फिर भी इसका किराया ना बढ़ाया गया और चुकाया गया। लैंड और डबलेमेट के हिसाब से किराए में गोलमाल किया गया है। इसके अलावा इस क्लब के बारे में ये भी चर्चा है कि, यहां पद वितरित होते हैं। IAS , IPS और बड़े-बड़े उद्योगपति अपने पैसे के दम पर पद खरीदते हैं।

     

    यहां के और भी कई ऐसे संवेदनशील मुद्दे हैं जो आम जनता के लिए हितकारी नहीं है, इन्हीं सब कारणों की वजह से इन रसूखदारों के हित में चल रहा क्लब बंदी की कगार कर खड़ा है, क्योंकि इस क्लब से आम आदमी को कोई लाभ नहीं है।

     

    एक साधारण व्यक्ति तो इस क्लब अंदर जा भी नहीं सकता। तो इतनी बड़ी प्रापर्टी पर केवल चंद लोगों का ही हक हो वह भी नुकसान झेलते हुए उसका बंद होना ही उचित ठीक  है। 5 जून को यह केंद्र सरकार के पास वापस चला जाएगा, हालांकि इसके विरोध में राजनीतिक हस्तियां और पैसे वाले लोग हैं जो ये नहीं चाहते कि ये क्लब बंद हो।

     

    लेखक- पूनम भटनागर।