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भारतीय ज्ञान परंपरा और आत्मनिर्भर भारत

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भारतीय ज्ञान परंपरा और आत्मनिर्भर भारत

भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत का गौरव नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के निर्माण की जीवंत शक्ति है। यह परंपरा मनुष्य को केवल शिक्षित करने का प्रयत्न ही नहीं करती, बल्कि उसे विचारशील, नैतिक, आत्म-विश्लेषक और कर्मनिष्ठ बनाती है। इसी कारण भारतीय चिंतन में ज्ञान को मुक्तिदायी कहा गया। ”सा विद्या या विमुक्तये“ अर्थात ज्ञान वह है जो मनुष्य को बंधनों से मुक्त करे, उसे आत्मविश्वासी बनाए और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में स्वावलंबन की प्रेरणा दे। आज जब ‘आत्मनिर्भर भारत’ की संकल्पना राष्ट्र के विकास का प्रमुख सूत्र बन चुकी है, तब यह स्पष्ट दिखाई देता है कि इसकी जड़ें हमारी सनातन ज्ञान परंपरा में बहुत गहराई तक समाई हुई हैं।

वेदों, उपनिषदों, पुराणों और दर्शन शास्त्रों में जीवन को आत्मनिर्भर बनाने का जो मार्ग बताया गया है, वही आधुनिक भारत के लिए प्रेरणास्त्रोत है। ऋग्वेद में ”आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः“ कहा गया है, अर्थात् हमारे पास विश्व के सभी ओर से कल्याणकारी विचार आएँ। यह श्लोक भारतीय ज्ञान परंपरा की उदारता और ग्रहणशीलता का प्रमाण है। आत्मनिर्भरता का अर्थ आत्मकेंद्रित होना नहीं, बल्कि आत्मबल से युक्त होकर विश्व के साथ सार्थक संवाद करना है। यही भावना महोपनिषद से उद्धृत ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सूत्र में दिखाई देती है। यह विचार बताता है कि आत्मनिर्भर व्यक्ति और राष्ट्र ही विश्व के लिए हितकारी हो सकते हैं।

उपनिषदों में आत्मबोध को जीवन का मूल माना गया है। बृहदारण्यक उपनिषद का ”अहं ब्रह्मास्मि“, छान्दोग्य उपनिषद का ”तत्त्वमसि“, मांडूक्य उपनिषद का ”अयमात्मा ब्रह्म“ जैसे महावाक्य मनुष्य को अपने अंदर की असीम शक्ति का बोध कराते हैं। जब व्यक्ति स्वयं को जान लेता है, तो वह परिस्थितियों का दास नहीं रहता, बल्कि उनका निर्माता बन जाता है। यही आत्मबोध आत्मनिर्भरता की पहली सीढ़ी है। श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से ”उद्धरेदात्मनात्मानं“ कहा है, अर्थात् मनुष्य को स्वयं अपने प्रयासों से ऊपर उठना चाहिए। यह शिक्षा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, क्योंकि आत्मनिर्भर भारत का निर्माण भी आत्मनिर्भर व्यक्तियों से ही होगा।

भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा का उद्देश्य रोजगार प्राप्त करना मात्र नहीं था, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाना था। गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से ज्ञान, मूल्य, अनुशासन और व्यावहारिक कौशल पीढ़ी दर पीढ़ी संचारित होते रहे। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय इस बात के साक्षी हैं कि भारत में ज्ञान का स्वरूप समग्र था, यहां वेदांत, आयुर्वेद, गणित, खगोल, राजनीति, शिल्प, वास्तु, नाट्य, संगीत सबका अध्ययन होता था। यह समग्रता ही आत्मनिर्भरता की आधारशिला है, क्योंकि वह व्यक्ति को बहुआयामी बनाती है।

वेदों में कर्म की महत्ता बार-बार प्रतिपादित हुई है। यजुर्वेद कहता है ”कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः“ अर्थात् कर्म करते हुए ही सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करनी चाहिए। यह कर्मप्रधानता भारतीय जीवन दृष्टि का मूल है। गीता में भी ”योगः कर्मसु कौशलम्“ का संदेश है, अर्थात् कर्म में दक्षता ही योग है। जब समाज के लोग अपने कार्य में कुशल होते हैं, तो राष्ट्र स्वतः ही आत्मनिर्भर बनता है।

पुराणों में वर्णित समाज व्यवस्था भी आत्मनिर्भरता की भावना से प्रेरित थी। कृषि, शिल्प, व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा आदि सबके अपने स्वायत्त तंत्र थे। गाँव आत्मनिर्भर इकाइयां थे जहां आवश्यक वस्तुएं स्थानीय स्तर पर ही तैयार होती थीं। यह मॉडल आज ‘लोकल फॉर वोकल’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ की अवधारणा में पुनर्जीवित हो रहा है। प्राचीन भारतीय अर्थचिंतन में कौटिल्य का अर्थशास्त्र इस बात का प्रमाण है कि आर्थिक स्वावलंबन को राष्ट्र की सुरक्षा और समृद्धि से जोड़ा गया था।

आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा भारतीय ज्ञान परंपरा के ऐसे आयाम हैं जो आज विश्व में पुनः प्रतिष्ठित हो रहे हैं। चरक और सुश्रुत ने चिकित्सा को प्रकृति और शरीर के संतुलन पर आधारित बताया। आज जब स्वास्थ्य क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की बात होती है, तब आयुर्वेद और योग जैसी विधाएं भारत की सॉफ्ट पावर के रूप में उभर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस इसका प्रमाण है कि भारतीय ज्ञान आज भी वैश्विक समाज को दिशा दे रहा है।

आज आत्मनिर्भर भारत अभियान का उद्देश्य केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि ज्ञान, कौशल और नवाचार पर आधारित राष्ट्र निर्माण है। उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाओं, रक्षा उत्पादन में वृद्धि, इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण, स्टार्ट-अप संस्कृति, डिजिटल भारत, और लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र की सशक्त भूमिका ने भारत को आयात निर्भरता से मुक्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र आज करोड़ों लोगों को रोजगार दे रहा है और निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान कर रहा है। यह वही भावना है जिसे हमारे शास्त्रों ने सदियों पहले ”उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः“ कहकर प्रतिपादित किया था, अर्थात् परिश्रमी पुरुष के पास ही लक्ष्मी आती है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा के केंद्र में लाने का प्रयास किया गया है। भारतीय भाषाओं, पारंपरिक ज्ञान, नैतिक शिक्षा, कौशल विकास और नवाचार को एक साथ जोड़कर शिक्षा को जीवनोपयोगी बनाया जा रहा है। यह शिक्षा व्यक्ति को नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि रोजगार सृजक बनने की प्रेरणा देती है। यही आत्मनिर्भरता का मूल है।

सनातन परंपरा में प्रकृति के साथ संतुलन को अत्यंत महत्व दिया गया है। अथर्ववेद में पृथ्वी सूक्त ”माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः“ कहता है, अर्थात पृथ्वी हमारी माता है। यह भावना हमें संसाधनों के संतुलित उपयोग और पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा देती है। आज सतत विकास (Sustainable Development) की जो चर्चा विश्व में हो रही है, उसका मूल भारतीय चिंतन में निहित है। आत्मनिर्भरता का अर्थ प्रकृति का दोहन नहीं, बल्कि उसके साथ सामंजस्य है।

भारतीय ज्ञान परंपरा में समाज को परिवार के रूप में देखा गया है। ”सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः“ की भावना समाज के सामूहिक उत्थान की प्रेरणा देती है। आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा भी समावेशी विकास पर आधारित है, जहां अंतिम व्यक्ति तक संसाधन और अवसर पहुंचें। यह विचार हमारे उपनिषदों और पुराणों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से उभर रहा है। विनिर्माण, डिजिटल प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष अनुसंधान, रक्षा उत्पादन, औषधि निर्माण और स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। यह प्रगति केवल आधुनिक तकनीक का परिणाम नहीं, बल्कि उस मानसिकता का परिणाम है जो भारतीय ज्ञान परंपरा से आत्मविश्वास, नवाचार, परिश्रम और नैतिकता के रूप में उत्पन्न हुई है।

यह शाश्वत सत्य है कि आत्मनिर्भर भारत कोई नई अवधारणा नहीं, बल्कि हमारी सनातन ज्ञान परंपरा का आधुनिक रूप है। वेदों की उदारता, उपनिषदों का आत्मबोध, गीता का कर्मयोग, पुराणों की सामाजिक संरचना, आयुर्वेद और योग की जीवनशैली, ये सब मिलकर उस विचार को जन्म देते हैं जिसे आज हम आत्मनिर्भर भारत के रूप में देख रहे हैं। ज्ञान ही वह शक्ति है जो व्यक्ति को, समाज को और राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाती है।

जब भारत अपनी जड़ों से जुड़कर आधुनिकता की ओर बढ़ता है, तब वह केवल विकास नहीं करता, बल्कि विश्व को भी दिशा देता है। यही भारतीय ज्ञान परंपरा का संदेश है और यही आत्मनिर्भर भारत की आत्मा है।

लेखक ख्यातिप्राप्त शिक्षाविद, शैक्षिक प्रशासक, प्रोफेसर एवं राष्ट्रवादी चिन्तक और सरकार द्वारा ‘शिक्षक श्री’ पुरस्कार से विभूषित है।