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भ्रष्टाचार पर चोट मारने का उचित समय : अजय सेतिया

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भ्रष्टाचार पर चोट मारने का उचित समय : अजय सेतिया

दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के घर से करोड़ों रुपये की नकदी मिलने की चर्चा सभी तरफ है। किसी छोटे या बड़े सरकारी कर्मचारी के पास से नकदी पकड़ी जाए तो उसे निलंबित कर दिया जाता है। लेकिन, सर्वोच्च न्यायालय की कॉलेजियम ने दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश इलाहाबाद उच्च न्यायालय में ट्रांसफर कर दिया। अनुमान लगाइये कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने ऐसा क्यों किया होगा?

14 मार्च को होली वाले दिन की घटना है, जस्टिस वर्मा और उनका परिवार दिल्ली में नहीं था। उनके सरकारी आवास में आग लग गई और घर के कर्मचारियों ने फायर ब्रिगेड बुला ली। फायर ब्रिगेड को आग बुझाते समय घर के एक कमरे में अनगिनत नकदी दिखी, तो उन्होंने पुलिस को सूचित किया। पुलिस ने तुरंत बात ऊपर तक पहुंचाई, क्योंकि यह जज का मामला था। गृह मंत्रालय से प्रधानमंत्री और फिर प्रधानमंत्री से मुख्य न्यायाधीश तक बात पहुंची।

लेकिन, 20 मार्च तक कोई हरकत नहीं। बड़ा प्रश्न यह कि 20 मार्च तक इंतजार क्यों? 20 मार्च को आनन-फानन में कॉलेजियम की बैठक बुलाई, जिसमें कम से कम दो जजों ने कहा कि 1999 के कॉलेजियम के निर्णय के अनुसार जज को छुट्टी पर भेज कर ‘इन हाउस’ जांच बिठाई जाए, लेकिन ऐसा करने की बजाए उनका उसी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में ट्रांसफर कर दिया, जहां से ट्रांसफर कराकर उन्हें 2014 में दिल्ली लाया गया था।

जस्टिस वर्मा मुलायम सिंह के जमाने में निम्न अदालत में जज बने थे। 2011 में मायावती के समय उच्च न्यायालय की कॉलेजियम ने उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय का जज बनाया था।

लगभग 10-12 वर्ष पहले दिल्ली के एक नामी वकील का एक महिला के साथ वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह महिला को जज बनवाने का लालच दे रहा था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने उस वीडियो पर रोक लगा दी थी, क्यों? इसी दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जज हुआ करते थे, जो अपने पक्ष में निर्णय करवाने के लिए पूर्वोत्तर की लड़कियों की मांग किया करते थे। इस मामले में ईडी की शिकायत पर उनकी गिरफ्तारी हुई तो विवश होकर त्यागपत्र दे दिया था। वह भी कॉलेजियम से चुने गए थे।

उच्च न्यायालयों की बात तो छोड़िए, सर्वोच्च न्यायालय को लेकर भी कहा जाता है कि यह फिक्सरों का अड्डा बन गया है। आतंकवादी को चुनाव प्रचार करने के लिए जमानत मिल जाती है। भ्रष्टाचारी को चुनाव प्रचार के लिए जमानत मिल जाती है। लालू यादव जैसे भ्रष्ट नेता पांच-पांच मुकदमों में सजायाफ्ता होने के बाद भी बीमारी के बहाने छूटे घूमते हैं, कैसे?

क्या जजों पर कोई अंकुश है, क्या कॉलेजियम या न्यायपालिका सर्वोपरि है और सरकार तो क्या संसद भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रही। संसद से पारित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को कॉलेजियम यह कहकर ठुकरा देता है कि यह न्यापालिका में सरकार का हस्तक्षेप होगा। नरेंद्र मोदी सरकार ने 2014 में पहले ही सत्र में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बिल पास किया था, 31 अक्तूबर 2014 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बिल पर हस्ताक्षर कर स्वीकृति प्रदान कर दी थी। लेकिन, पांच जजों की बेंच ने बहुमत के आधार पर कानून को असंवैधानिक ठहरा दिया। सिर्फ एक ने कॉलेजियम सिस्टम का विरोध किया था।

अब न्यायपालिका के भ्रष्टाचार पर चोट करने का उचित समय है।