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जीवन मूल्य सहेजती, परिवार परम्परा

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जीवन मूल्य सहेजती, परिवार परम्परा 

राघव दोनों हाथों से सर पकड़ कर बैठा था, लगभग यही हाल सुलभा का भी था। तभी दोनों कातर स्वर में एक साथ बोल उठे, हमने यहां अलग आकर गलती तो नहीं कर दी? पहले पूरा परिवार दादा-दादी, राघव, सुलभा और दो बच्चे एक साथ एक ही घर में रहते थे। पर सुलभा को सास के साथ काम करना नहीं भाता, वह चाहती थी कि एक मुश्त उसका राज चले। बस वह नित नए झगड़े लेकर राघव को भडकाने लगी। फिर एक दिन ऐसा आया कि राघव अपने माता-पिता को छोड़कर, पत्नी एवं बच्चों के साथ अलग रहने चला गया। शुरू के कुछ दिन तो सुलभा बहुत खुश थी। पर जब नौकरी पर वापस जाना शुरू किया तो अनेक समस्याएं सिर उठाने लगीं। उन्हीं में से दस साल की रिंकु और आठ साल के सोनू को अकेला छोड़कर जाने की समस्या आयी। एक दिन जब वह दोनों घर आए तो देख कर हक्का बक्का रह गए कि दोनों बच्चे टीवी पर किसी एडल्ट फिल्म को देख रहे थे। पूछने पर बोले कि दोस्तों ने दी थी। डांटने पर बोले हम क्या करें, दादा-दादी भी नहीं हैं जो उनसे बात कर लें। अभी तक तो दादी स्कूल से आने पर उन्हें खाना खिलाकर सुला देती या पढ़ने बिठा देती। शाम को दादा जी के साथ पार्क चले जाते। वापस आकर पढ़ रहे होते तो दोनों आफिस से आते। एक तरफ तो दोनों बच्चे दादा-दादी के प्यार को मिस कर रहे थे, तो दूसरी तरफ उन्हें भी बच्चों की चिंता नहीं रहती थी। पर अब क्या हो सकता था। उन्हें एहसास हुआ कि परिवार उनके लिए कितना महत्वपूर्ण है। राघव और सुलभ दोनों को अलग आकर रहने का फैसला गलत लगने लगा।

यह सही है कि परिवार परंपरा हमें शारीरिक, भावनात्मक सुरक्षा कवच प्रदान करती है। परिवार जीवन की धुरी का काम करता है। एक साथ बड़ों के साथ मिलकर रहने में हम निस्वार्थ प्रेम तो सीखते ही हैं, साथ ही परिवार रूपी संस्कारशाला से जीवन का प्रथम पाठ भी पढ़ते हैं और संस्कार ग्रहण करते हैं। पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे अभी भी काफी जगह ये प्रचलन में है। पर आधुनिकीकरण और शहरीकरण ने एकल परिवार व्यवस्था को जन्म एवं बढ़ावा दिया। जहां संयुक्त परिवार में दो तीन पीढ़ियां एक साथ खुशियों को जन्म देती हैं और गम इकट्ठे बांटती हैं, बुजुर्ग व युवा पीढ़ी मिलकर एक सौहार्दपूर्ण वातावरण उत्पन्न करते हैं, एक दूसरे की समस्याओं को समझते हैं, और समाधान ढूंढते हैं। एक दूसरे के लिए मैं नहीं हम की भावना से कार्य करते हैं। परस्पर सहयोग की भावना विकसित होती है। परिवार मनुष्यता की पहली सीढ़ी है जिसपर चढ़कर वह स्वयं का निर्माण करना सीखता है। आत्मकेंद्रित व उच्छृंखल व्यवहार ने मनुष्य को एकल परिवार में रहना सिखाया, जिसमें वह स्वार्थ पूर्ति सीखा। ऐसे में बड़ों के अनुभवपूर्ण जीवन से सीखने से वंचित रहने के कारण अनेकों नई समस्याओं से दो-चार भी होने लगा। एकाकी जीवन ने उसके अंदर संस्कारहीन व्यवहार को जन्म दिया, जो उसके स्वयं के अनुकूल नहीं था। साथ ही अपने बच्चों को भी भावनात्मक सुरक्षा न दे पाया। जहां परिवार बच्चों की प्रथम पाठशाला बन उन्हें शिक्षित करता, वहीं यह विघटित होता परिवार बच्चों में विघटन का भाव देता चला गया। वह भोग विलास, कटुता पैदा करता गया। युवा पीढ़ी पर कोई नियंत्रण न होने के कारण वह आत्मकेंद्रित हो गई। बच्चे छोटी उम्र में परिवार से दूर छात्रावास आदि में रहने को मजबूर हो गए। बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे परिवार से दूर रह भौतिक दुनिया की चमक-धमक के प्रभाव में नशा खोरी तथा आपराधिक प्रवृतियों की ओर आकर्षित होते जा रहे हैं।

ऐसा नहीं है इसका असर सिर्फ युवा पीढ़ी तक ही सीमित रहा। युवा तो बड़ों की सुरक्षा और प्यार के अभाव में एकाकी होते गए। पहले बड़े लोग उनकी समस्याओं को समझ कर उचित समाधान देते थे, पर परिवार विहीनता ने उन्हें ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया जिसमें कभी कभी तो आत्महत्या की नौबत ला दी। वहीं बुजुर्ग पीढ़ी समय पर उचित देखरेख न मिल पाने के कारण निराशा में उलझ कर रहने पर मजबूर हो गयी। कितने ही बुजुर्ग बढ़ती उम्र में उनकी ओर बढ़ने वाले हाथों को झटक दिए जाने से वृद्धाश्रम की शरण लेने पर मजबूर हो जाते हैं। वास्तव में दोनों पीढ़ियों के संतुलन से संयुक्त एवं संस्कारयुक्त परिवार परंपरा को जीवित रखा जा सकता है। यह मात्र एक आवश्यकता ही नहीं अपितु तेजी से बदलती दुनिया में अनिवार्य है, जहां भौतिक, तकनीकी एवं आर्थिक विकास ने सत्य, नैतिकता, ईमानदारी, निष्पक्षता, कर्तव्यपरायणता, अनुशासन, क्षमा, मित्रता, सहिष्णुता एवं विश्वास जैसे मानवीय गुणों का तेजी से क्षरण हो रहा है।

बड़ों को यह समझना चाहिए कि युवा पीढ़ी नए विचारों, सोच और पद्धति की द्योतक है। उनके अनुसार नया प्रचलन आवश्यक है। पर इसके लिए परिवार की बड़ी पीढ़ी को भुला देना उनके नैतिक मूल्यों का ह्ा्रस करना होगा। परिवार परामर्श कर उन्हें उचित मान सम्मान देना युवा पीढ़ी का कर्तव्य है। साथ ही बुजुर्ग पीढ़ी को भी बच्चों से उचित तालमेल बनाकर चलने की आवश्यकता है। पूर्व की अपनी व्यवस्था को ही आदर्श मानते हुए क्रमिक विकास, नवीनतम ज्ञान तथा यथार्थ को नकारते रहने से पीढ़ियों तथा परिवारों में दूरियां बढ़ेंगी। हर बात पर नुक्ता चीनी व्यक्तित्व विकास के लिए हानिकारक होती है। याद रखिए परिवार परंपरा जीवन मूल्यों को सहेजती है। 

वह मानसिक व भावनात्मक वृद्धि कर व्यक्ति को आत्मसम्मान से जीवित रहना सिखाती है जिसके लिए परिवार के हर सदस्य को जिम्मेदार बन सहयोग करना आवश्यक है। अगर हम इकट्ठे भोजन, भजन करने में संगठित होकर गमन करें तो कोई कारण नहीं कि परिवार परंपरा को जारी न रख पाएं। एक परिवार संगठित होता है तो उसका प्रभाव समाज पर पड़ता है क्योंकि कई परिवार मिलकर समाज का निर्माण करते हैं और समाज से ही राष्ट्र निर्मित होता है। अतः परिवार को चलाने के लिए अपने जीवन मूल्यों को सहेजना आवश्यक है।