राष्ट्र सेविका समिति सुसंस्कृत महिला शक्ति निर्माण की शिल्पशाला - मोनिका चौहान
राष्ट्र सेविका समिति भारत का एक प्रमुख महिला
संगठन है, जिसकी स्थापना राष्ट्र जीवन में महिलाओं की सक्रिय, सशक्त
और संस्कारित भूमिका सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई थी। समिति का मूल
उद्देश्य महिलाओं में राष्ट्रभक्ति, आत्मविश्वास, संगठन क्षमता,
सेवा
भाव और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का विकास करना है। यह संगठन महिलाओं को केवल
व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें परिवार,
समाज और राष्ट्र निर्माण की एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में तैयार
करता है।
समिति का विश्वास है कि यदि महिला सुसंस्कृत, जागरूक और आत्मबल से परिपूर्ण होगी, तो परिवार, समाज और राष्ट्र स्वतः सशक्त बनेंगे।
इसी विचार को आधार बनाकर समिति सन 1936 से देशभर में शाखाओं, सेवा कार्यों, संस्कार वर्गों और विभिन्न सामाजिक
गतिविधियों के माध्यम से महिलाओं को संगठित और प्रशिक्षित कर रही है।
आज जब समाज अनेक प्रकार की सांस्कृतिक, वैचारिक और पारिवारिक चुनौतियों से जूझ
रहा है, तब महिलाओं की
भूमिका केवल परिवार तक सीमित नहीं रह गई है। वह समाज निर्माण, राष्ट्र चेतना और संस्कार संरक्षण की
सबसे महत्वपूर्ण धुरी बन चुकी है। ऐसे समय में राष्ट्र सेविका समिति एक ऐसी
शिल्पशाला के रूप में सामने आती है,
जो केवल महिलाओं को संगठित ही नहीं करती, बल्कि उन्हें सुसंस्कृत, आत्मविश्वासी, राष्ट्रनिष्ठ और समाजहितैषी व्यक्तित्व
के रूप में गढ़ती है।
समिति का कार्य केवल शाखाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय जीवन मूल्यों को
व्यवहार में उतारने का एक सतत अभियान है। यहाँ महिलाओं को यह सिखाया जाता है कि
शक्ति का अर्थ केवल बाहरी सामर्थ्य नहीं, बल्कि संयम, सेवा, संस्कार और संगठन क्षमता भी है।
समिति की शाखाओं में शारीरिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के
माध्यम से महिलाओं के सर्वांगीण विकास का प्रयास किया जाता है। खेल, योग, गीत, प्रार्थना, चर्चा और सेवा कार्यों के माध्यम से
उनमें नेतृत्व क्षमता, अनुशासन
और आत्मगौरव का विकास होता है। यहाँ आयु, वर्ग या आर्थिक स्थिति का कोई भेद नहीं होता है। हर महिला को
राष्ट्रकार्य की सहभागी बनने का अवसर मिलता है।
समिति केवल व्यक्तित्व निर्माण तक सीमित नहीं
रहती, बल्कि समाज के
कठिन समय में सेवा का जीवंत उदाहरण भी प्रस्तुत करती है। जब देश कोविड महामारी
जैसी अभूतपूर्व आपदा से जूझ रहा था,
उस समय समिति की सेविकाएँ निःस्वार्थ भाव से सेवा कार्यों में जुटी
रहीं। अनेक स्थानों पर उन्होंने जरूरतमंद परिवारों तक भोजन पहुंचाने, मास्क निर्माण, दवाइयों की व्यवस्था और रोगियों की
सहायता का कार्य किया। कई सेविकाएँ स्वयं के स्वास्थ्य की चिंता किए बिना
अस्पतालों, क्वारंटीन
केंद्रों और सेवा बस्तियों में निरंतर कार्य करती रहीं। इसी प्रकार बाढ़, भूकंप और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के समय
भी समिति द्वारा राहत सामग्री, वस्त्र, भोजन और आवश्यक सहायता प्रभावित
परिवारों तक पहुंचाई गई। महिलाओं और बच्चों को मानसिक संबल देने का कार्य भी
सेविकाओं ने अत्यंत संवेदनशीलता के साथ किया।
समिति की विशेषता यह भी है कि वह महिलाओं को
केवल मंचीय भाषण तक सीमित नहीं रखती, बल्कि सेवा बस्तियों,
शिक्षा, ग्राम
विकास, आत्मरक्षा
प्रशिक्षण, पर्यावरण
संरक्षण, आपदा सहायता और
सामाजिक समरसता जैसे कार्यों से सीथे जोड़ती है। इससे उनमें संवेदनशीलता, आत्मनिर्भरता और आज जब समाज अनेक
प्रकार की सांस्कृतिक, वैचारिक और पारिवारिक चुनौतियों से जूझ
रहा है, तब महिलाओं की
भूमिका केवल परिवार तक सीमित नहीं रह गई है। वह समाज निर्माण, राष्ट्र चेतना और संस्कार संरक्षण की
सबसे महत्वपूर्ण धुरी बन चुकी है। ऐसे समय में राष्ट्र सेविका समिति एक ऐसी
शिल्पशाला के रूप में सामने आती है,
जो केवल महिलाओं को संगठित ही नहीं करती, बल्कि उन्हें सुसंस्कृत, आत्मविश्वासी, राष्ट्रनिष्ठ और समाज हितैषी
व्यक्तित्व के रूप में गढ़ती है।
सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है।
आज पाश्चात्य प्रभाव और उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण परिवारों में संवाद कम हो
रहा है, संस्कार कमजोर
पड़ रहे हैं और युवा पीढ़ी दिशाहीनता की ओर बढ़ रही है। ऐसे बातावरण में समिति
महिलाओं को केवल 'अधिकार' नहीं, बल्कि 'कर्तव्य' का भी बोध कराती है। वह बताती है कि एक
संस्कारित महिला ही संस्कारित परिवार और सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकती है।
भारतीय इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि
जब-जब राष्ट्र संकट में आया, तब-तब
महिलाओं ने आगे बढ़कर समाज को दिशा दी। चाहे वह माता जीजाबाई हों, रानी लक्ष्मीबाई हो या अहिल्याबाई
होलकर इन सभी ने संस्कार और शक्ति का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया। राष्ट्र सेविका
समिति उसी परंपरा को आधुनिक युग में आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है।
समिति महिलाओं में यह भावना जागृत करती है कि
वे स्वयं को कभी कमजोर न समझे। भारतीय संस्कृति में नारी को शक्ति स्वरूपा माना
गया है। आवश्यकता केवल उस शक्ति को पहचानने, जागृत करने और राष्ट्रहित में उपयोग करने की है।
आज समाज को ऐसी महिलाओं की आवश्यकता है जो
आधुनिकता और संस्कृति के बीच संतुलन बना सकें, परिवार को जोड़ सकें,
समाज को दिशा दे सकें और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को समझ सकें।
राष्ट्र सेविका समिति इसी उद्देश्य को लेकर वर्षों से निरंतर कार्य कर रही है।
वास्तव में, यह केवल एक संगठन नहीं, बल्कि सुसंस्कृत महिला शक्ति निर्माण की ऐसी शिल्पशाला है जहाँ से
निकलने वाली प्रत्येक सेविका समाज और राष्ट्र जीवन में सकारात्मक परिवर्तन की वाहक
बनती है।
लेखक - मोनिका चौहान, स्वतंत्र टिप्पणीकार




