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बदलती विश्व व्यवस्था और भारत

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बदलती विश्व व्यवस्था और भारत 

पिछले कुछ दशकों में वैश्विक परिदृश्य में जो परिवर्तन आए हैं, उन्होंने पुराने समीकरणों को पूरी तरह से बदल दिया है। वह समय अब इतिहास की बात हो गई है जब दुनिया केवल एक या दो महाशक्तियों के इर्द-गिर्द घूमती थी। आज हम एक ऐसी बहुध्रुवीय दुनिया (Multipolar World) की ओर बढ़ रहे हैं, जहां शक्ति के कई केंद्र विकसित हो चुके हैं। इसके अलावा पिछले दशकों में हमने देखा कि विश्व व्यवस्था में वैश्विक संस्थानों जैसे कि संयुक्त राष्ट्र संघ, WTO और प्डथ् की भूमिका और प्रभाव भी घटता जा रहा है। उदाहरण के लिए- संयुक्त राष्ट्र, जो कभी वैश्विक गवर्नेंस का एक स्तंभ था, अब पुराना हो चुका है। संयुक्त राष्ट्र रूस-यूक्रेन युद्ध और गाजा संकट जैसे बड़े संघर्षों का समाधान करने में अप्रभावी रहा है। वेनेजुएला पे हुए अमेरिकी हमले के बाद तो उसकी प्रासंगिकता और कम हो गई है।

वर्तमान परिदृश्य में अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस जैसे अन्य पी-5 (P-5) सदस्यों ने वैश्विक व्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश नहीं की तथा इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाने के बजाए रूस पर एकतरफा प्रतिबंध आरोपित किये। रूस द्वारा संयुक्त राष्ट्र में इससे संबंधित किसी भी दंडात्मक उपाय पर वीटो किये जाने के बावजूद इसको रोकने के प्रयास बंद नहीं किये जाने चाहिये थे। साथ ही, यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति में वृद्धि संघर्ष विराम को प्रभावित करने के अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र में विश्वास को कम करता है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply Chains) की नाजुकता ने सिखाया है कि ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा के लिए देशों को आत्मनिर्भर होना होगा।

भले ही आने वाले वर्षों में विश्व अधिक प्रतिस्पर्धी, संकुचित और विवादास्पद बनने के लिए अभिशप्त प्रतीत हो रहा हो, फिर भी प्रमुख शक्तियों के सहयोग का तर्क अपरिहार्य बना रहता है। एक नए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को आकार देने का कोई भी प्रयास, एक स्थिर, समावेशी और सभी के लिए लाभकारी हो, ऐसी कूटनीतिक और सहयोगात्मक पहल होनी चाहिए।

21वीं सदी का तीसरा दशक वैश्विक राजनीति के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज किया जा रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जो अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था बनी थी, वह अब तेजी से ढ़ह रही है और उसका स्थान एक नई और अधिक प्रतियोगी जटिल व्यवस्था ले रही है। 2026 के वर्तमान परिदृश्य में, ‘बदलती विश्व व्यवस्था’ को समझने के लिए तीन प्रमुख रुझान (Trends) सबसे महत्वपूर्ण हैं।

पहली बात की शीत युद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया ‘एकध्रुवीय’ थी, जहां संयुक्त राज्य अमेरिका एकमात्र महाशक्ति था। लेकिन आज हम एक बहुध्रुवीय विश्व (Multipolar World) में रह रहे हैं। शक्ति के केंद्र अब केवल अमेरिका और रूस ही नहीं, बल्कि चीन, भारत, यूरोपीय संघ और जापान जैसे कई शक्ति केंद्र उभर आए हैं। चीन की सैन्य और आर्थिक शक्ति ने अमेरिका के प्रभुत्व को सीधी चुनौती दी है। एक आर्थिक शक्ति के रूप में भारत के उदय ने वैश्विक राजनीति को प्रभावित किया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय विदेश नीति आज वैश्विक मुद्दों जैसे कि पर्यावरण संकट, ऊर्जा सुरक्षा और आतंकवाद पर अपनी निर्णायक भूमिका निभा रही है।

इस दौर में क्षेत्रीय आर्थिक और सुरक्षा गठबंधन की राजनीति में भी बदलाव आया है। वैश्विक वित्तीय संकट, कोविड-19 महामारी और यूक्रेन युद्ध ने पुरानी संस्थाओं जैसे G7 और UN की सीमाओं को उजागर किया है, जिससे BRICS, G20 और SCO जैसे नए मंच उभर रहे हैं। नाटो जैसे पुराने सुरक्षा गठबंधनों के साथ-साथ अब BRICS, QUAD और शंघाई सहयोग संगठन जैसे नए समूह वैश्विक नीतियों को प्रभावित कर रहे हैं। अब वैश्विक निर्णय केवल वाशिंगटन में नहीं, बल्कि बीजिंग और नई दिल्ली में भी लिए जा रहे हैं। पुरानी संस्थाएं जैसे संयुक्त राष्ट्र (UN) और विश्व व्यापार संगठन WTO) वर्तमान चुनौतियों का समाधान करने में संघर्ष कर रही हैं।

एक दूसरी प्रवृत्ति जो बदलती विश्व व्यवस्था में देखने को मिल रही है वह आर्थिक और राजनीतिक शक्ति के बदलते केंद्र से संबंधित है। बदलती विश्व व्यवस्था का सबसे बड़ा संकेत आर्थिक शक्ति का पश्चिम से पूर्व (West to East) की ओर खिसकना है। 21वीं सदी को अक्सर ‘एशियाई शताब्दी’ कहा जाता है। इस बदलाव की अगुवाई भारत और चीन जैसी आर्थिक शक्तियां कर रही हैं। आज चीन वैश्विक विनिर्माण का एक बड़ा केंद्र बन चुका है। वहीं भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इसके अलावा दक्षिण-पूर्वी एशिया आसियान देश आर्थिक विकास के नए इंजन बनकर उभरे हैं। विकासशील देशों की आवाज अब वैश्विक मंचों पर अधिक प्रखरता से सुनी जा रही है।

 वर्ष 2026 में भारत 6.6 प्रतिशत GDP वृद्धि के साथ सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था रहेगा, जबकि पूर्वी एशिया (चीन सहित) 4.6 प्रतिशत की दर पर अग्रसर है। भारत अब बुनियादी ढांचा निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था (UPI, AI) और ग्रीन ऊर्जा परियोजनाएं से नए अवसर पैदा कर रहा हैं। मुंबई का GEC 2026 सम्मेलन बहुध्रुवीय दुनिया में पूंजी, तकनीक व ऊर्जा साझेदारी पर केंद्रित है।

तीसरी बात जो बदलता विश्व व्यवस्था में देखने को मिल रही है वह तकनीकी युद्ध और डिजिटल संप्रभुता से संबंधित है। आज की विश्व व्यवस्था केवल भूगोल या सेना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह डेटा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), और सेमीकंडक्टर पर टिकी है। जो देश इन तकनीकों पर नियंत्रण रखेगा, वही भविष्य की व्यवस्था का नेतृत्व करेगा। अमेरिका और चीन के बीच चल रहा ‘टेक-वार’ इसी का परिणाम है। अब देश ‘डिजिटल संप्रभुता’ पर जोर दे रहे हैं ताकि वे अपनी तकनीकी निर्भरता को कम कर सकें।

बदलती विश्व व्यवस्था में अब सुरक्षा की परिभाषा बदल गई है। अब केवल सीमा विवाद ही नहीं, बल्कि निम्नलिखित मुद्दे वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं। जलवायु परिवर्तन अब एक बड़ा खतरा बन गया है, जो देशों को सहयोग करने के लिए मजबूर कर रहा है। कोविड-19 ने दिखाया कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला कितनी नाजुक है। आज प्रमुख देश नए सप्लाई चैन नेटवर्क में निवेश और सहयोग को बढ़ावा दे रहे हैं। इसके अलावा जीवाश्म ईंधन से नवीकरणीय ऊर्जा (Green Energy) की ओर बढ़ने की होड़ ने नए भू-राजनीतिक तनाव और अवसर पैदा किए हैं। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (UPI) को 50 से अधिक देशों के साथ साझा कर भारत तकनीकी नेता बन रहा है।

भारत की भूमिका: इस बदलती व्यवस्था में भारत एक Leading Power के रूप में उभरा है। आज भारत एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय भूमिका निभा रहा है। यह बहुधु्रवीय विश्व चीन के उदय, अमेरिका-रूस तनाव और ग्लोबल साउथ की बढ़ती आवाज के बीच भारत को अवसर प्रदान करता है। ‘जी-20’ की अध्यक्षता के दौरान भारत ने खुद को ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज के रूप में स्थापित किया, जो नई विश्व व्यवस्था में उसकी बढ़ती अहमियत को दर्शाता है।

बहुध्रुवीय दुनिया भारत को रक्षा विविधीकरण (रूस, अमेरिका से सौदे) और दक्षिण-दक्षिण सहयोग के अवसर दे रही है। 2026 BRICS अध्यक्षता में वैश्विक संस्था सुधारों की वकालत कर भारत UNSC स्थायी सदस्यता की दिशा मजबूत कर सकता है। रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए आर्थिक एकीकरण और सॉफ्ट पावर (योग, वैक्सीन मैत्री) से भारत बहुध्रुवीय व्यवस्था का प्रमुख पक्ष बन रहा है. इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) और कोअलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (CDRI) जैसी पहलों से भारत ने जलवायु व आपदा प्रबंधन में अपना नेतृत्व स्थापित किया।

मोदी सरकार की विदेश नीति डी-हाइफेनेशन पर जोर देती है। भारत के हितों के आधार पर संबंध आगे बढ़ाना और बहुपक्षीय संरेखण को अपनाती है ताकि अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता में कठोर गठबंधनों के बिना अपने हितों की रक्षा की जा सके।

भारत की बहुपक्षीय रणनीतियां बदलती विश्व व्यवस्था में रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक प्रभाव को मजबूत करने का माध्यम बनी हुई हैं। भारत विश्व व्यवस्था को एक नियम-आधारित व्यवस्था के रूप में देखता है, जो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धांत पर आधारित है।


 लेखक देशबंधु कॉलेज, दिल्ली विवि में सहायक प्रोफेसर है।