हिंदी सिनेमा और हिंदी भाषा का संबंधः एक अवलोकन
जब हम हिंदी सिनेमा की बात करते हैं तो इस बात में कोई भी दो राय नहीं है कि हिंदी सिनेमा ने हिंदी की परिधि को विकसित किया है। अलग-अलग प्रांतीय भाषाओं के साथ मिल कर हिंदी ने नए रूप ग्रहण किए हैं। हिंदी सिनेमा, भारतीय सिनेमा का पर्याय बन चुका है। भारत के सभी प्रमुख गैर हिंदी भाषी फिल्मकारों ने जब अपनी प्रथम भाषा से इतर फिल्म बनाने की सोची तो उन्होंने हिंदी भाषा का ही रुख किया। ऑस्कर से सम्मनित बंगाली ‘सत्यजीत रे’ हों, तेलुगू भाषी ‘श्याम बेनेगल’, कन्नड़ भाषी ‘गिरीश कसरवल्ली’, मराठी भाषी ‘वी शांताराम’, असमिया के ‘जाहनु बरुआ’ या फिर तमिल भाषी ‘मणि रतनम’, ये सूची लंबी है। यदि इतिहास मे भी देखें तो 1913 में बनी पहली भारतीय फिल्म मे मराठी भाषी ‘धुंदिराज गोविंद फालके’ ने ‘राजा हरीशचन्द्र’ में अँग्रेजी के साथ हिंदी सबटाइटल देना ही उचित समझा। ये इस बात को स्थापित करता है कि हिंदी भाषा में बनी फिल्मों का एक सर्वभारतीय चरित्र है। हिंदी फिल्मों ने हिंदी को घर-घर पहुंचाने तथा अहिंदी क्षेत्रों में हिंदी को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।
इन सबके बावजूद बॉलीवुड केन्द्रित हिंदी सिनेमा हिंदी की संस्कृति का प्रतिनिधित्व नहीं करता। हिंदी साहित्य ने हिंदी सिनेमा की जरूरतों को पूरा करने के लिए विपुल भंडार प्रदान किया। इस संबंध में गुलजार लिखते हैं ”साहित्य के पास एक ओर भाव-दशा, पात्रों, वास्तुकला, परिवेश तथा संवेगात्मक स्थितियों का दृशयात्मक विवरण है तो दूसरी ओर कलाकारों की भाव भंगिमा का विस्तृत चित्रण“। हम सब जानते हैं कि साहित्य से इतर भी सिनेमा ने एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्वयं को विकसित किया। सिनेमाई भाषा पहले से अधिक सुगठित हुई। उदाहरण के लिए अब समय के अंतराल को दिखाने के लिए घड़ी को पीछे होते या पानी कि लहरों को नहीं दिखाना होता, डिसाल्व या जंप कट जैसी तकनीक से बखूबी इस अंतराल को स्थापित किया जा सकता है। यदि हम कहानी और उपन्यास की बात करें तो पढ़ने का माध्यम होने के कारण ये अपनी अंतिम परिणति प्राप्त कर लेता है। परंतु सिनेमा की यात्रा तो पटकथा से आरंभ होती है। अतः सिनेमा को त्रिजन्मी विधा कहना गलत न होगा। सिनेमा का पहला जन्म एक लिखित आलेख के रूप में होता है (प्री- प्रॉडक्शन), दूसरा जन्म प्रस्तुति के समय (प्रॉडक्शन) और तीसरा जन्म सम्पादन और ध्वनि विन्यास (पोस्ट - प्रॉडक्शन) के समय सम्पन्न हो जाता है । यहाँ ये समझना जरूरी है कि जहां दूसरी विधाएँ अपने लिखित एवं रेकोर्डेड रूप में एक ठोस, निश्चित एवं अंतिम स्वरूप ग्रहण कर लेती है, वहीं सिनेमा अपने अंतिम चरण यानि पोस्ट प्रॉडक्शन तक अनिश्चित और अपूर्ण रहता है। जब भी कोई निर्देशक किसी फिल्म की पटकथा को हाथ में लेता है, तो उसके मन में उस पटकथा के अनुसार कुछ चित्र, बिम्ब और प्रतीक बनने लगते हैं। शुरुआती दौर में इसमें थोड़ा धुंदलापन होता है परंतु फिल्म निर्माण से जुड़े अन्य विभागों के संयोजन के साथ ही यह और गाढ़े होते चले जाते हैं। पटकथा में निर्देशक के आलेख के साथ ही जुड़ता है छायाकर का आलेख, अभिनता का लेख, सेट डिजाइनर का आलेख और कई बार तो एक रचनात्मक संपादक के द्वारा पटकथा को एक बिलकुल ही भिन्न स्वरूप प्रदान कर दिया जाता है। कहानी या उपन्यास काल और स्थान की सीमाओं में आबद्ध रहता है। सिनेमा का कथानक चाहे किसी भी काल से आबद्ध हो, लेकिन वह घटित भी हमेशा वर्तमान में ही होता है तथा पटकथा भी हमेशा वर्तमान काल में ही लिखी जाती है। काल के साथ सिनेमा का यह संबंध विभिन्न स्तरों से जुड़ता है। किसी ऐतिहासिक घटना को कहानी, उपन्यास या कविता में उसके मूल संदर्भ में, उसी काल में रखकर भी उसका पाठ किया जा सकता है लेकिन फिल्म में वह इतिहास भी हमारी आँखों के सामने ही घटित हो रहा होगा । काल के साथ ऐसी निकटता, ऐसा रिश्ता और ठीक उसी क्षण देखे जाने की क्षमता केवल इसी विधा में संभव है।
कहानी या उपन्यास के साथ एक बात और देखी जाती है वह यह कि उसे कई बार में टुकड़ों में पढ़ा जा सकता है परंतु सिनेमा प्रस्तुति के स्तर पर आरंभ से अंत तक एक ही बार में पहुँचता है। आप यह कह सकते हैं कि आप बचे हुए हिस्से को कुछ दिनों बाद भी देख सकते हैं परंतु आपका अनुभव पहले जैस ही होगा ये जरूरी नहीं। जाहीर है तकनीक ने बढ़ोतरी तो की परंतु हिंदी सिनेमा अपनी संस्कृति से दूर हुआ। इसका पहला कारण था, हिन्दी क्षेत्र में हिन्दी फिल्म उद्योग या सिनेमा शिक्षा का केंद्र न होना। इस संबंध में गुलजार कहते है ”जैसे-जैसे सिनेमा की तकनीक क्षमता और आय बढ़ती गयी तो सिनेमा ने अपने लिए ऐसे स्वतंत्र लेखक, संगीतकार, जिनके पास शिल्प, उच्च भाषाई साहित्य और संगीत की कोई पृष्ठभूमि नहीं थी, पैदा करने शुरू कर दिये। ऐसा संभवतः त्वरित और सहज लोकप्रियता के प्रलोभन में हुआ। चिड़िया सोने के पिंजड़े में वो गीत नहीं गुनगुनाती जो खुले आकाश में गाती हैं । दुर्भाग्यवश इस कला की भी स्वतन्त्रता वाणिज्यिक घरानों के पिंजरे मे कैद हो गयी है“।
एक दौर में हिंदी भाषा के रचनाकारों को हिंदी सिनेमा उद्योग के द्वारा तिरस्कार भी झेलना पड़ा। प्रेमचंद, वृन्दावन लाल वर्मा, अमृतलाल नागर के लेखों और संस्मरणों से ये बात जाहिर होती है कि हिंदी सिनेमा में भाषाई संस्कृति के दिवालियापन से ये लोग दुखी थे। इस संबंध में प्रेमचंद के महत्वपूर्ण लेख ‘सिनेमा और जीवन’ में प्रेमचंद लिखते हैं कि ”अगर हिंदी सिनेमा अपने आदर्श को सामने रखकर अपने चित्रों की सृष्टि करता तो वह आज संसार की सबसे बलवान संचालक शक्ति होता, मगर खेद है कि इसे कोरा व्यवसाय बनाकर हमने उसे कला के ऊंचे आसन से खींचकर ताड़ी या शराब की दुकान की सतह तक पहुंचा दिया है“।
हिंदी साहित्यकार सिनेमा के व्यवसायीकरण से परेशान थे और इसके उद्योग में स्वयं को असहज महसूस करते थे। परंतु हिंदी भाषा के रचनाकारों ने हिंदी में सिनेमा समीक्षा और आलोचना को नए आयाम प्रदान किए। अज्ञेय के सम्पादन में निकलने वाला साप्ताहिक पत्र ‘दिनमान’ इसका एक उदाहरण है। ये एक ऐसा पत्र था जो हिंदी सिनेमा को मात्र एक बाजार का उत्पाद बनने में कड़ा विरोध करता था। हिंदी भाषा के अपने पाठकों के लिए दुनिया भर की महत्वपूर्ण फिल्मों की समीक्षाएं इस पत्र में छपा करती थीं। हिंदी भाषा के इस पत्र ने कई लोगों को सिनेमा अध्ययन के लिए प्रेरित किया। एक ओर जहां अँग्रेजी के पत्र अनावश्यक उत्साह भरने वाली सूचना से भरे होते थे। वहीं इस पत्र ने हिंदी में गहरे सिनेमाई चिंतन को प्रतिपादित किया। उदाहरण के लिए एक लोकप्रिय फिल्म शोले की आलोचना के कुछ अंश आपके समक्ष प्रस्तुत हैं ”शोले फिल्म न होकर एक सामाजिक घटना हो गयी है। हिंसा को उद्दात बनाकर फिल्म व्यक्तिगत प्रतिशोध की भावना को सार्वजनिक मान्यता दिलाने की पहल करती है। खलनायक की हिंसा जितनी क्रूर है उतनी नायक की भी। त्वरित भावना का इतना खतरनाक नकदी भुगतान किसी भी फूहड़ फिल्म से ज्यादा हानिकारक है“। जहां एक ओर अंग्रेजी के पत्र पत्रिकाएँ शोले की सफलता और उसकी तकनीक पर लहालोट हो रहे थे। वहीं हिंदी का ये पत्र सिनेमा को मानवीय दृष्टि से देखने के लिए लोगों को प्रेरित कर रहा था ।
वर्तमान समय में बदलाव देखने को मिला है । इंटरनेट के आने से लेखन, पठन, वितरण की समग्र स्वाधीनता का उदय हुआ है। सही मायनो मे ये अभिव्यक्ति की आजादी का दौर है जहां थोड़ी सी साक्षरता के आधार पर करोड़ों लोगों तक अपनी बात पहुचाई जा सकती है। हिंदी सिनेमा भी इससे अछूता नहीं है। ओटीटी के आने से वितरण प्रणाली मुक्त हुई है। साठ के दशक से जिस मुक्त वितरण प्रणाली और विकेन्द्रीकरण की संकल्पना की जा रही थी वो आज पूर्ण होती दिख रही है। इसी के कारण से आज स्टार सिस्टम को चुनौती मिली है। हिंदी फिल्म उद्योग विकेंद्रित हो रहा है। अब कहानियों के केंद्र में हिंदी भाषी क्षेत्र हैं। यदि ओटीटी न होता तो बिहार से निकले हुए पंकज त्रिपाठी, और राजस्थान से निकले हुए इरफान खान अंतरराष्ट्रीय सितारे न होते । इनके संस्मरणों में हिंदी साहित्य का प्रभाव इनके ऊपर साफ देखने को मिलता है। पंकज त्रिपाठी कई बार खुल के अपने अभिनेता होने का श्रेय ‘फणीश्वर नाथ रेणु’ के साहित्य को देते हैं। यदि ओटीटी न होता तो ‘पंचायत’ और ‘गुल्लक’ जैसी वेब सिरीज हमारे सामने न आई होती। हजारों करोड़ों के इस उद्योग में आज हिंदी साहित्य में रुचि रखने वाले हिंदी भाषी रचनाकारों का महत्वपूर्ण योगदान है। अनुवाद की दृष्टि से भी ये उद्योग आगे बढ़ रहा है। डबिंग और सबटाइटल के कारण आज एक अच्छी दृश्य-श्रव्य सामग्री भाषा की सीमा से मुक्त हो गयी है। असमिया भाषा की फिल्म को हिंदी में या हिंदी भाषा की फिल्म को तेलुगू में देखा जा सकता है। इसके पीछे मात्र आर्टिफिश्यल इंटेलिजेंस ही नहीं बल्कि हिंदी भाषा के अनुवादकों की भी मेहनत है ।
आज अंतरराष्ट्रीय छात्रों को हिंदी भाषा सिखाने के लिए हिंदी सिनेमा एक महत्वपूर्ण उपकरण की तरह उपयोग में आ रहा है। भारतीय परिवार से संबंधित शब्दावली हो या फिर आंचलिक भाषा का ज्ञान, सिनेमा के माध्यम से ये सिखाया जा रहा है। गीत अपने रूपक और अलंकार के कारण सुनने वालों को एक वैयक्तिक अनुभव देते हैं, इसमें एक असीमता है। जाहिर है हिंदी सिनेमा के गीतों के माध्यम से भी हिंदी भाषा सिखाई जा रही है। आज हिंदी सिनेमा में मूलभूत परिवर्तन हो रहा है, इसका उपयोग भाषा शिक्षण से लेकर संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए भी हो रहा है। जाहीर है इससे हिंदी भाषा और सिनेमा के रिश्ते और बेहतर ही होंगे और हिंदी सिनेमा हिंदी का ज्ञान रखने वालों का स्वागत खुली बाहों से करेगा ।
लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय केंद्र प्रयागराज में प्राध्यापक है।




