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धार की भोजशाला मंदिर ही है - शिवानी चतुर्वेदी

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धार की भोजशाला मंदिर ही है - शिवानी चतुर्वेदी 


मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक नगर धार भोजशाला भारतीय इतिहास, संस्कृति और शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। भोजशाला का निर्माण परमार वंश के शासक राजा भोज ने 1034 ईस्वी में करवाया था। राजा भोज केवल एक पराक्रमी शासक ही नहीं, बल्कि विद्वान, साहित्यकार और कला-संरक्षक भी थे। उन्होंने अपने राज्य में संस्कृत भाषा तथा अन्य विषयों की शिक्षा हेतु अनेकों संस्थानों का निर्माण कराया था जिसमें से भोजशाला प्रमुख है। इस संस्थान के भीतर वाग्देवी का एक मंदिर भी था। यहां वेद, व्याकरण, साहित्य और दर्शन का अध्ययन कराया जाता था।

1305 ईस्वी में इस क्षेत्र पर अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण हुआ। इस आक्रमण के समय खिलजी ने भोजशाला सहित मालवा क्षेत्र के कई मंदिरों को भारी क्षति पहुंचाई। 1569 ईस्वी में महमूद शाह खिलजी द्वितीय ने मंदिर परिसर के पास चिश्ती संत कमाल मौला की दरगाह बनवा दी। कहा जाता है कि चिश्ती कमाल मौला 1205 के आस पास यहां आकर बस गए थे।

यही कारण है कि यह परिसर कमाल मौला मस्जिद के नाम से जाना जाने लगा।

1857 में हुए उत्खनन में यहां वाग्देवी की प्रतिमा मिली। जिसे अंग्रेज अधिकारी लन्दन ले गए। आज यह प्रतिमा लन्दन के संग्रहालय में है। भोजशाला लंबे समय से दो समुदायों के बीच धार्मिक अधिकारों को लेकर चर्चा और विवाद का विषय रही है। सनातन आस्था के अनुसार यह माँ सरस्वती का प्राचीन मंदिर है, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे मस्जिद के रूप में देखता है।

भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण ने 2003 में अलग-अलग दिनों में दोनों समुदायों को पूजा और नमाज की अनुमति दी थी। सनातन धर्म के लोग मंगलवार के दिन मां वाग्देवी की पूजा करते थे और मुस्लिम समुदाय के लोग यहां शुक्रवार को नमाज अदा करते थे। बसंत पंचमी के अवसर पर यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं और माँ सरस्वती की पूजा-अर्चना करते हैं।

साल 2022 में हिन्दू फ्रंट फॉर जस्टिस द्वारा मध्यप्रदेश हाइकोर्ट में एक याचिका दायर की गई। याचिका में मांग की गई कि भोजशाला का वास्तविक धार्मिक स्वरूप निर्धारित किया जाए, सनातनियों को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत पूर्ण पूजा का अधिकार प्रदान किया जाए और साथ ही दूसरे समुदाय की गतिविधियों पर रोक लगाई जाए। याचिका में यह भी मांग की गई कि इस परिसर का प्रबंधन केंद्र सरकार या किसी ट्रस्ट को सौंपा जाए। ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की प्रतिमा को वापस लाकर भोजशाला में स्थापित किया जाए और उसकी निरंतर पूजा सुनिश्चित की जाए। मामले की सुनवाई के दौरान 11 मार्च 2024 को हाई कोर्ट ने ASI को भोजशाला परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया। लगभग 98 दिनों तक चले इस सर्वेक्षण के बाद 15 जुलाई 2024 को ASI ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की।

भोजशाला में ASI की ओर से किए गए उत्खनन एवं वैज्ञानिक अन्वेषण का कार्य प्रोफेसर श्री आलोक त्रिपाठी जी की अध्यक्षता में संचालित किया गया। प्रोफेसर आलोक त्रिपाठी जी भारत के प्रसिद्ध पुरातत्वविद् है और वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में अतिरिक्त महानिदेशक के पद पर कार्यरत हैं। प्रस्तुत है इस विषय पर उनसे हुई दूरभाषिय वार्ता के प्रमुख अंश -

प्रोफेसर त्रिपाठी ने बताया कि मध्यप्रदेश हाइकोर्ट की इंदौर पीठ ने एएसआई को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया था। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह निर्धारित किया कि वरिष्ठ अधिकारियों की यह समिति किन-किन बिंदुओं पर कार्य करेगी तथा किस क्षेत्र में अध्ययन और जांच की जाएगी।

न्यायालय ने यह भी कहा कि विवादित संरक्षित स्मारक भोजशाला कमाल मौला मस्जिद परिसर के भीतर तथा उसके चारों ओर पचास मीटर के क्षेत्र में वैज्ञानिक अन्वेषण (Scientific Exploration), जीपीआर सर्वे (Ground Penetrating Radar Survey) और पुरातात्विक उत्खनन कर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाए तथा उसे साक्ष्यों सहित न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।

माननीय न्यायालय के आदेशानुसार ASI ने प्रोफेसर त्रिपाठी की अध्यक्षता में सात वरिष्ठ अधिकारियों की एक समिति गठित की। जिस में दोनों पक्षों के अधिकारियों को सम्मिलित किया गया। मार्च से जुलाई तक लगभग 98 दिनों तक इस टीम ने वहां विस्तृत जांच और अध्ययन कार्य किया। इसमें जीपीआर सर्वे तथा सामान्य सतही सर्वेक्षण (General Surface Survey) शामिल था। जीपीआर सर्वे के लिए National Geophysical Research Institute तथा Council of Scientific and Industrial Research जैसे संस्थानों के विशेषज्ञों की सहायता ली गई।

इसके पश्चात स्मारक के भीतर और बाहर पुरातात्विक उत्खनन किया गया। प्रोफेसर त्रिपाठी जी ने बताया कि माननीय उच्चतम न्यायालय का स्पष्ट निर्देश था कि उत्खनन के दौरान संरचना के मूल स्वरूप में किसी प्रकार का परिवर्तन न हो। इस कारण अत्यंत सावधानी और वैज्ञानिक पद्धति से कार्य किया गया, ताकि राष्ट्रीय महत्व के इस संरक्षित स्मारक को किसी प्रकार की क्षति न पहुंचे।

उत्खनन के दौरान वहां तीन विभिन्न स्तरों पर संरचनाओं के अवशेष प्राप्त हुए। सबसे प्राचीन संरचना ईंटों से निर्मित थी, जिसे लगभग दसवीं शताब्दी का माना गया। इसके ऊपर लगभग तेरहवीं शताब्दी की एक विशाल संरचना के अवशेष मिले, जो बेसाल्ट पत्थरों से निर्मित थी। इस संरचना का ऊपरी भाग नष्ट हो चुका है, किंतु प्लेटफॉर्म तक का भाग आज भी सुरक्षित है। वर्तमान ढांचा इसी प्लेटफॉर्म के ऊपर निर्मित है। इस प्रकार तीन अलग-अलग स्तरों पर स्पष्ट रूप से भिन्न

भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण ने 2003 में अलग-अलग दिनों में दोनों समुदायों को पूजा और नमाज की अनुमति दी थी। सनातन धर्म के लोग मंगलवार के दिन मां वाग्देवी की पूजा करते थे और मुस्लिम समुदाय के लोग यहां शुक्रवार को नमाज अदा करते थे।

बसंत पंचमी के अवसर पर यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं और माँ सरस्वती की पूजा-अर्चना करते हैं।

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संरचनाएं प्राप्त हुईं, जिनकी निर्माण सामग्री, काल और स्वरूप एक-दूसरे से अलग हैं। प्रोफेसर त्रिपाठी जी के अनुसार पुरातत्वविदों ने प्राप्त मूर्तियों, स्थापत्य अवशेषों और अन्य सामग्रियों के आधार पर पालियोग्राफी (लिपि-विज्ञान) तथा अन्य वैज्ञानिक विधियों से उनकी तिथि निर्धारित की।

उत्खनन के दौरान अनेक अभिलेख, उनके खंड, विभिन्न कालों के सिक्के तथा मूर्तियों के अवशेष प्राप्त हुए। ये सिक्के ग्यारहवीं शताब्दी से लेकर आधुनिक काल तक के बताए गए हैं। गर्भगृह के फर्श के नीचे से भी मूर्तियां और अभिलेख प्राप्त हुए। न्यायालय के निर्देशानुसार प्रत्येक वस्तु का अत्यंत विस्तृत रूप से दस्तावेजीकरण किया गया। जैसे कौन सी वस्तु कहां से मिली, कब मिली, उसका स्वरूप क्या है तथा उसकी अनुमानित तिथि क्या है?

इन सभी बिंदुओं का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया गया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने लगभग 2190 पृष्ठों की, 10 खंडों में विभाजित विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में उत्खनन और सर्वेक्षण से संबंधित सभी विवरण, फोटोग्राफ, चित्र, अभिलेखों का लिपि-पठन तथा उनकी तिथि निर्धारण संबंधी जानकारी सम्मिलित की गई। प्रोफेसर त्रिपाठी जी ने बताया कि स्मारक परिसर में अनेक "इंक इंस्क्रिप्शन" भी प्राप्त हुए, जो संस्कृत, प्राकृत तथा फारसी भाषा में है। जिन्हें समय-समय पर वहां आने वाले लोगों द्वारा लिखा गया होगा। अंत में उन्होंने कहा कि न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुसार निर्धारित समय-सीमा के भीतर ही रिपोर्ट न्यायालय को सौंप दी गई। अंत में उन्होंने कहा कि यह मेरे लिए प्रसन्नता का विषय है कि न्यायालय ने प्रस्तुत साक्ष्यों और प्रमाणों को स्वीकार करते हुए अपना निर्णय दिया।

भोजशाला का प्रश्न केवल अतीत की बूल में दबे किसी स्मारक का प्रश्न नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक स्मृति, ऐतिहासिक चेतना और प्रमाणाधारित इतिहास लेखन से जुड़ा हुआ विषय है। यह संघर्ष उस सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक है जो भारत को अपनी सभ्यतागत जड़ों से पुनः जोड़ना चाहता है।

साथ ही, प्रो. आलोक त्रिपाठी और उनके नेतृत्व में कार्यरत पुरातात्त्विक दल की भूमिका यह दर्शाती है कि इतिहास के विवादों का समाधान भावनाओं से अधिक प्रमाणों और वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर संभव है। भोजशाला आज केवल एक विवादित स्थल नहीं, बल्कि उस व्यापक संवाद का केंद्र है जहाँ इतिहास, आस्था और पुरातत्व तीनों एक-दूसरे से संवाद करते दिखाई देते हैं।