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पर्यावरण और प्रगति चलें साथ-साथ - कुमार सिद्वार्थ

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पर्यावरण और प्रगति चलें साथ-साथ -  कुमार सिद्वार्थ, लेखक एवं साहित्यकार


पिछले सात दशक में पर्यावरण को लेकर देश में जबर्दस्त जागरूकता बढ़ी है और पर्यावरण के हर आयाम पर नीतिगत रूप से काम करने की प्रक्रिया भी संचालित की गई है। जंगल बचाने से लेकर नदियों को साफ करने तक, प्रदूषण रोकने से लेकर जैव विविधता के संरक्षण तक अनेक योजनाएं बनाई गईं। लेकिन समग्र रूप से पर्यावरण का आकलन करें तो यही लगता है कि विकास की तेज दौड़ में प्रकृति ने सबसे ज्यादा कीमत चुकाई है। आजादी के बाद सड़कों, सिंचाई परियोजनाओं, बांधों, उद्योगों और शहरों के विस्तार ने देश को आधुनिक विकास की दिशा में जरूर आगे बढ़ाया, लेकिन इस विकास के लिए जल, जंगल और जमीन का जिस तरह इस्तेमाल हुआ, उसके दुष्परिणाम अब सामने आने लगे हैं।


आजादी के शुरुआती दशकों में विकास का अर्थ था-सड़कें, कारखाने, बड़े बांध और बिजली परियोजनाएं। इसके लिए बड़े पैमाने पर जंगल काटे गए। जंगलों की जगह सड़कें और बस्तियां बसती गईं। खनन, उद्योग और निर्माण कार्यों के लिए वनभूमि का लगातार हस्तांतरण होता रहा। जंगल केवल लकड़ी या वनोपज का स्रोत नहीं होते, वे वर्षा, मिट्टी, जल और जीवन का आधार होते हैं। लेकिन विकास की हमारी अवधारणा लंबे समय तक इन्हें संसाधन भर मानती रही। इसका नतीजा यह हुआ कि जंगलों का दायरा सिकुड़ता गया और पर्यावरणीय संतुलन कमजोर पड़ने लगा।


भारतीय वन सर्वेक्षण की रिपोर्टें बताती हैं कि देश में हरित आवरण बढ़ाने के प्रयास जरूर हुए हैं, लेकिन प्राकृतिक घने जंगलों की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र के मुकाबले वन और हरित आवरण का अनुपात अभी भी उस लक्ष्य से कम है, जिसकी कल्पना राष्ट्रीय वन नीति में की गई थी। वर्ष 1988 की वन नीति में कहा गया था कि देश के एक तिहाई भू-भाग पर जंगल होने चाहिए और पर्वतीय क्षेत्रों में यह अनुपात दो तिहाई होना चाहिए। लेकिन आज भी हम इस लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाए हैं। वृक्षारोपण के अभियान जरूर चलाए गए, पर यह भी गौर करने वाली बात है कि लगाए गए पेड़ों में कितने बचे और वे प्राकृतिक जंगलों की तरह जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन देने में कितने सक्षम हुए।


जंगलों की इस कटाई का असर केवल पेड़ों तक सीमित नहीं रहा। वर्षा चक्र प्रभावित हुआ, मिट्टी का कटाव बढ़ा, नदियों का स्वभाव बदला और जल संकट गहराने लगा। पहले गांवों में चौमासे के पानी को पूरे साल के लिए बचाकर रखने की कुआं, तालाब, बावड़ी और जल-संचयन की समृद्ध परंपरा थी। पानी स्थानीय स्तर पर जमीन में समाता था और भूजल का संतुलन बना रहता था। लेकिन आधुनिक विकास के साथ इन परंपरागत प्रणालियों की उपेक्षा शुरू हो गई। नहरों का जाल बिछाने के लिए नदियों को बांधा गया। बांधों के साथ बिजली उत्पादन का तर्क भी जोड़ा गया। फिर भी जब सिंचाई की कमी रह गई तो नलकूपों का सहारा लिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि भूजल का अत्यधिक दोहन शुरू हो गया। आज देश के अनेक हिस्सों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है और पानी का संकट जीवन की बड़ी चुनौती बन चुका है।


पर्यावरण की इस गिरती स्थिति की आहट बहुत पहले सुनाई देने लगी थी। 1970 के दशक में उत्तराखंड के चमोली में चिपको आंदोलन शुरू हुआ। गांव के लोग अपने जंगलों को कटने से बचाना चाहते थे, क्योंकि उनकी आजीविका, उनका भविष्य और उनका जीवन उन्हीं जंगलों पर निर्भर था। इसी तरह नर्मदा घाटी में बड़े बांधों के दुष्प्रभाव सामने आए तो वहां भी लोगों ने आवाज उठाई। केरल की शांत घाटी हो, पश्चिमी घाट के जंगल हों, बस्तर का आदिवासी क्षेत्र हो या समुद्रतटीय इलाके। देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों ने अपने-अपने स्तर पर प्रकृति बचाने की लड़ाई लड़ी। इन आंदोलनों ने देश को यह समझाया कि पर्यावरण केवल पेड़ों और नदियों का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह मनुष्य, समाज, संस्कृति और भविष्य का प्रश्न भी है।


सही बात है कि औद्योगिकीकरण और बड़े विकास मॉडल के जितने लाभ गिनाए गए थे, उतने वास्तव में नहीं दिखे। अनेक बड़ी घाटी परियोजनाओं के लिए हजारों परिवार उजाड़े गए, लेकिन उनके पुनर्वास की समस्याएं आज तक पूरी तरह नहीं सुलझीं। बड़ी परियोजनाओं ने क्षेत्रीय संस्कृति, जीवन-पद्धति और स्थानीय समाज को भी प्रभावित किया। यह भी सच है कि बड़े बांधों और भारी निर्माण कार्यों के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों का आकलन हमेशा गंभीरता से नहीं किया गया। विकास की चमक में प्रकृति और मनुष्य के बीच के रिश्ते को अक्सर नजरअंदाज किया गया।


आज पर्यावरण संकट का सबसे बड़ा चेहरा ग्लोबल वार्मिंग के रूप में सामने है। मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। कहीं भीषण गर्मी पड़ रही है, कहीं अचानक बाढ़ आ रही है, कहीं लंबे सूखे की मार है तो कहीं चक्रवात और जंगल की आग जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश ने असामान्य तापमान, बेमौसम बारिश और प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता को करीब से देखा है। गर्मी के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं और शहरों से लेकर गांव तक इसका असर महसूस किया जा रहा है।


लेकिन हमें केवल ग्लोबल वार्मिंग ही नहीं, लोकल वार्मिंग को भी पहचानने की जरूरत है। हिमालय इसका बड़ा उदाहरण है। बदरीनाथ, केदारनाथ जैसे तीर्थ, हिमशिखर, हिमनदियां और बर्फीली चोटियां हमारे प्राकृतिक वैभव का हिस्सा हैं। पहले इन इलाकों में सीमित संख्या में लोग पहुंचते थे। वे परंपरागत साधनों और स्थानीय आवासों का उपयोग करते थे और लौट जाते थे। इससे वहां के पर्यावरण पर दबाव न्यूनतम रहता था। लेकिन सुविधाओं के विस्तार और पर्यटन के बढ़ते दबाव ने इन क्षेत्रों का स्वरूप बदल दिया है। आज लाखों यात्री हर साल इन इलाकों में पहुंचते हैं। सड़कों, होटलों, पार्किंग, वाहनों और निर्माण गतिविधियों का असर वहां के सामान्य तापमान, हिमनदों और नदियों के परितंत्र पर पड़ रहा है। हिमालय की संवेदनशीलता को देखते हुए हाल के वर्षों में आई आपदाओं ने यह चेतावनी भी दी है कि प्रकृति की सीमाओं की अनदेखी भारी पड़ सकती है।


शहरों में भी पर्यावरण की स्थिति कम चिंताजनक नहीं है। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, कचरे का संकट और बढ़ती गर्मी ने शहरी जीवन को कठिन बना दिया है। महानगरों में हरियाली घट रही है और सीमेंट-कंक्रीट का फैलाव बढ़ रहा है। वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जिसके कारण हवा की गुणवत्ता खराब होती जा रही है। गर्मियों में शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों से कई डिग्री ज्यादा दर्ज किया जा रहा है। यह भी लोकल वार्मिंग का ही एक रूप है।


हाल के वर्षों में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कुछ सकारात्मक पहलें भी हुई हैं। सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। जल संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा, कचरा प्रबंधन और पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली को लेकर नई पहलें की जा रही हैं। लेकिन यह भी सच है कि केवल योजनाओं और कानूनों से पर्यावरण नहीं बचाया जा सकता, जब तक समाज की जीवनशैली और विकास की सोच में बदलाव न आए।


गांधी जी कहते थे कि प्रकृति हर एक की जरूरत तो पूरी कर सकती है, पर लालच नहीं। यह गूढ़ बात आज पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो गई है। पिछले 75 साल में विकास की हमारी अवधारणा प्रकृति के अधिकतम दोहन पर केंद्रित रही है। अब समय आ गया है कि हम उन परंपरागत भारतीय व्यवस्थाओं को फिर से याद करें, जिनमें जल का संरक्षण था, जंगलों के प्रति सम्मान था और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की समझ थी।


हमें प्रकृति के सम्यक उपयोग की अवधारणा को फिर से बढ़ाना होगा। विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो पर्यावरण को नष्ट करके नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़े। क्योंकि जल, जंगल और जमीन केवल आज की जरूरत नहीं, आने वाली पीढ़ियों की भी धरोहर हैं। यही समझ देश के पर्यावरण के सच्चे विकास का आधार बन सकती है।