कृषि चक्र, क्षेत्रीय संस्कृतियों, स्थानीय जनजातियों से जुड़े त्यौहार
सबसे बड़ा वार्षिक सांस्कृतिक संगीत कार्यक्रम मद्रास संगीत महोत्सव एक महीने तक चल कर 15 जनवरी को समापन होगा। इस महोत्सव के दौरान पूरे चेन्नई में पारंपरिक नृत्य, दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत और संगीत से जुड़े कई सेमिनार, प्रदर्शन और चर्चाएं होतीं हैं। इनकी संख्या 1000 से ज्यादा होती है। 3 से 9 जनवरी तक मद्रास एकादमी, मद्रास द्वारा 19 वां नृत्य महोत्सव का आयोजन है।
पौष पूर्णिमा 3 जनवरी के दिन पवित्र नदी में स्नान किया जाता है। कल्पवास और माघ मेला शुरु है। प्रयागराज त्रिवेणी संगम, के किनारे टैंट नगरी बन गईं। 29 दिन का कल्पवास और 44 दिन का माघ मेला है। मेले का इस बार थीम है ‘साफ सुरक्षित माघ मेला’। श्रद्धालू यहां कल्पवास करने आते हैं। कल्पवास में स्नान के साथ यहां ज्ञान यज्ञ भी होता है। इनका आध्यात्मिक जीवन ही नहीं, आर्थिक दृृष्टि से भी बहुत महत्व है। ये आदरणीय लोग स्वेच्छा से न्यूनतम भौतिक साधनों पर जीवन निर्वाह करते हुए, पूरे समाज के सामने सादगी और त्याग का आदर्श रखते हैं। एक समय भोजन करते हैं , ठंड के कारण जगह-जगह अलाव जलते हैं। सिंघाड़ा, शकरकंदी और आलू, मूंगफली भी इसमें भून के खाते हैं। कुछ लोग रोज तो नहीं पर विशेष दिनों जैसे माघ पूर्णिमा, मकर संक्रांति, पौष पूर्णिमा, बसंत पंचमी पर गंगा स्नान और माघ मेला देखने आते हैं। जिन लोगों के नजदीक गंगाजी नहीं होती वे जो भी पास में नदी होती है। वहीं मकर संक्राति का नहान करते हैं। इस पवित्र दिन स्नान के लिए गांव से ट्रॉली भर भर के श्रद्धालु जाते हैं। रास्ते में कोई पैदल जाता दिखा तो उसे भी बैठने का आग्रह करते हैं। वो पैसे देकर ही ट्रॉली में बैठने को राजी होता है। उसका मानना है कि ”अगर उसने डीजल के भी पैसे नहीं दिए तो उसका गंगा स्नान का सारा पुण्य तो मुफ्त में, ले जाने वाले को लगेगा न।’’ त्यौहार मनाने का तरीका हमारा उनका एक सा है। वही तिल, गुड़, खिचड़ी आदि।
विष्णु जी और शाकम्भरी देवी की पूजा की जाती है। इसे शाकम्भरी पूर्णिमा भी कहते हैं। शाकंभबरी देवी जयंती उत्सव, माँ शाकम्भरी देवी मंदिर सहारनपुर में मेले का आयोजन किया जाता है। इस दिन लाखों भक्त दर्शन के लिए आते हैं।
गुरु गोविंद सिंह जयंती (6 जनवरी) सिख धर्म के दसवें और अंतिम गुरू गोविंद सिंह जी का जन्मोत्सव दुनिया भर के गुरूद्वारों में मनाया जाता है।
गंगा सागर मेला (8 से 16 जनवरी) ”सारे तीरथ बार बार, गंगा सागर एक बार“ मकर संक्राति (15 जनवरी) को गंगा जी, जहां सागर (बंगाल की खाड़ी) में विलीन होने से पहले, गंगा जी में पवित्र डुबकी लगाने के लिए तीर्थयात्री देश विदेश से गंगासागर पहुंचते हैं। यहां 8 जनवरी से 16 जनवरी को लगने वाले मेले को गंगा सागर मेला कहते हैं। लेकिन डुबकी मकर संक्राति को ही लगाई जाती है।
बीकानेर ऊँट महोत्सव (9 से 11 जनवरी) इसकी शुरूवात जूनागढ़ किले के परिसर से ऊँटों के एक रंगीन जुलूस से होती है। ऊँट दौड़, लोक नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम, होते हैं। स्थानीय भोजन का आनन्द उठाया जाता है।
अमृतसर में छोटी पतंग को गुड्डी कहते हैं और बड़ी पतंग को गुड्डा कहते हैं। यहां लोहड़ी को पतंगबाजी देखने लायक होती है। इस दिन छुट्टी होती है। बाजार बंद रहते हैं। आसमान गुड्डे, गुड़ियों से भर जाता है। छतों पर माइक लगा कर कमैंट्री चलती है। शाम को लोहड़ी (13 जनवरी, पंजाब और उत्तर भारत का फसल उत्सव) जलाई जाती है। तब ये पतंगबाज, लोहड़ी मनाने, ढोल पर नाचने के लिए नीचे उतर कर आते हैं। बाकि बची पतंगे संक्रांति को उड़ाते हैं। यहां पर परंपरा का पालन जरुर किया जाता है। लोहड़ी की रात को सरसों का साग और गन्ने के रस की खीर घर में जरुर बनती हैं, जिसे अगले दिन मकर सक्रांति को खाया जाता है। इसके लिए कहते हैं ‘पोह रिद्दी, माघ खादी’ (पौष के महीने में बनाई और माघ के महीने में खाई) बाकि जो कुछ मरजी बनाओ, खाओ। हमारा कृषि प्रधान देश है। फसल का त्यौहार हैैं। इस समय खेतों में गेहूं, सरसों, मटर और रस से भरे गन्ने की फसल लहरलहा रही होती है। आग जला कर अग्नि देवता को तिल, चौली (चावल) गुड़ अर्पित करते हैं। परात में मूंगफली, रेवड़ी और भूनी मक्का के दाने, चिड़वा लेकर परिवार सहित अग्नि के चक्कर लगा कर थोड़ा अग्नि को अर्पित कर, प्रशाद खाते और बांटतें हैं। नई बहू के घर में आने पर और बेटा पैदा होने पर उनकी पहली लोहड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। अगले दिन मकर संक्राति को आस-पास के नदी सरोवर में स्नान करके, खिचड़ी और तिल का दान करते हैं और खिचड़ी और तिल के लड्डू खाये जाते हैं। स्वाद से खाते हुए बुर्जुग कवि बोलते हैं ‘खिचड़ी तेरे चार यार, घी पापड़ दहीं अचार’। देशभर में कई शहरों में पतंगे मकर संक्रांति को उड़ाने की परंपरा है इसलिए इसे पतंग उत्सव भी कहते हैं। कुछ राज्यों तेलंगाना, गुजरात, राजस्थान, पंजाब में ‘पतंग महोत्सव’ मनाया जाता है।
पूर्वोत्तर भारत में भोगाली बिहू मनाते हैं। यह मकर संक्राति का उत्सव, माघ बिहू एक सप्ताह तक मनाया जाता हैं। मकर संक्राति की पूर्व संध्या को लकड़ी बांस, फूस आदि से मेजी बनाई जाती हैं।
नवान्न और सम्पन्नता लाने का त्यौहार पोंगल का इतिहास कम से कम 1000 वर्ष पुराना है। दक्षिण भारतीय देश विदेश में जहां भी रहते हैं। पोंगल उत्साह से मनाते हैं। इस त्यौहार का नाम पोंगल इसलिए है क्योंकि सूर्यदेव को जो प्रसाद अर्पित करते हैं, वह पगल कहलाता है। तमिल भाषा में पोंगल का एक अर्थ है, अच्छी तरह उबालना। चार दिनों तक चलने वाले पोंगल में वर्षा, धूप, खेतिहर मवेशियों की अराधना की जाती है। जनवरी में चलने वाला पहला पोंगल (13 जनवरी) को भोगी पोंगल कहते हैं जो देवराज इन्द्र (जो भोग विलास में मस्त रहते हैं) को समर्पित है।
दूसरा पोंगल सूर्य देवता को निवेदित सूर्य पोंगल है। मिट्टी के बर्तन में नये धान, मूंग की दाल और गुड़ से बनी खीर और गन्ने के साथ, सूर्य देव की पूजा की जाती है। तीसरा मट्टू पोंगल तमिल मान्यताओं के अनुसार माट्टु भगवान शंकर का बैल हैं जिसे उन्होंने पृथ्वी पर हमारे लिए अन्न पैदा करने को भेजा है। चौथा दिन कानुम पोंगल मनाया जाता है। इस दिन दरवाजे पर तोरण बनाए जाते हैं। महिलाएं मुख्यद्वार पर रंगोली बनाती हैं।
तमिल की तन्दनानरामयाण के अनुसार श्री राम ने मकर संक्रातिं को पतंग उड़ाई थी और उनकी पतंग इन्द्रलोक में चली गई। तब से सागर तट पर लोग पतंग उड़ाते हैं।
केरल में राजा राजशेखर ने अयप्पा को देव अवतार मान कर सबरीमालाई में देवताओं के वास्तुकार विश्कर्मा से डिजाइन करवा कर अयप्पा का मन्दिर बनवाया। ऋषि परशुराम ने उनकी मूर्ति की रचना की और मकर संक्राति को स्थापित की।
अंतर्राष्ट्रीय पतंगबाजी महोत्सव (14-15 जनवरी) साबरमती रिवरफ्रंट अहमदाबाद में पतंगबाज पहुंचेंगे।
टुसू महोत्सव (टुसू परब, मकर परब, पूस परब, 14 जनवरी) झाड़खंड के कुड़मी और आदिवासियों का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। एक महीने तक नाच गानों, कर्मकांडों से मनाया जाता है।
तिरूवल्लूर दिवस, तमिलनाडु सरकार ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के प्रसिद्ध तमिल कवि दार्शनिक, तिरूवल्लुर के सम्मान में 15 जनवरी को तिरूवल्लूर दिवस के रूप में मनाती है।
जयदेव केंडुली (14-15 जनवरी) को कवि जयदेव की जयंती पर, केंडुली गांव पश्चिम बंगाल में संगीत मेला आयोजित किया जाता है। जो घूमंतू गायकों द्वारा बाउल संगीत के लिए प्रसिद्ध है।
मौनी अमावस (18 जनवरी) को मौन धारण कर गंगा जी या अपने आसपास नदी न होने पर वैसे ही स्नान करके तिल के लड्डू, तिल का तेल, आंवला वस्त्रादि का दान करते हैं।
रामलला प्राण प्रतिष्ठा दिवस (22 जनवरी) रामलला की प्राण प्रतिष्ठा दिवस की वर्षगांठ मनाते हैं।
सूर्य देव की उपासना का उत्सव रथ सप्तमी (25 जनवरी) को भानु सप्तमी या अचला सप्तमी भी कहा जाता है। मुख्य रुप से महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना दक्षिण भारत के राज्यों में यह फसल कटाई का संकेत है और किसानों की अच्छी फसल की उम्मीद का भी प्रतीक है।
गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) सुबह परेड देखना और दिन भर जगह जगह देशभक्ति के कार्यक्रमों में शिरकत करके राष्ट्रीय पर्व को मनाते हैं।
फ्लोट फैस्टिवल थाई तमिल महीने की जनवरी की पूर्णिमा को भक्ति और संस्कृति को दर्शाता फ्लोट स्थानीय रूप से थेप्पोत्सवम उत्सव तमिलनाडु के मदुरै में यहां की समृद्ध सांस्कृतिक झलक को पेश करता है। भगवान सुंदरेश्रवर और देवी मीनाक्षी की मूर्तियों को विशेष श्रृंगार करके फूलों और रोशनी से सजे फ्लोट पर रख कर मरियम्मन तेप्पाकुललम तालाब में चारों ओर घुमाया जाता है। इसका दर्शन करने दूर दूर से श्रद्धालू पहुंचते हैं।
नागौर महोत्सव जनवरी के अंत में यह भव्य पशु मेला के कारण भी राजस्थान के ससे जीवंत त्योहारों में है। चार दिन राजस्थानी संगीत, लोक नृत्य और स्थानीय व्यंजनों का आनन्द लिया जाता है। तरह-तरह की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। हस्तशिल्प और आभूषणों की जमकर खरीदारी होती है। तीन महीने का रन उत्सव तो चल ही रहा है।
इस प्रकार जनवरी के उत्सवों के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक हमें अलग अलग रुपों में दिखाई देती है। जिसमें प्रकृति के साथ मवेशियों का भी उपकार माना जाता है।




