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भारत की विरासत हमारे तीर्थ

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भारत की विरासत हमारे तीर्थ (मेरठ के विशेष संदर्भ में) 

भारत की सांस्कृतिक चेतना का मूलाधार उसके तीर्थ हैं। यहां तीर्थ केवल भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास, स्मृति और आध्यात्मिक ऊर्जा के जीवंत केंद्र हैं। भारतीय जनमानस में तीर्थ-परंपरा अनादिकाल से प्रवाहित होती रही है। वेदों, पुराणों और महाकाव्यों में तीर्थों का जो महात्म्य वर्णित है, वह इस बात का प्रमाण है कि हमारे पूर्वजों ने भौतिक जीवन के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति को भी समान महत्व दिया। तीर्थ मनुष्य को आत्मशुद्धि, संयम, तप और लोककल्याण की प्रेरणा देते हैं।

हिंदू धर्म में तीर्थों की महिमा का वर्णन करते हुए एक प्रसिद्ध श्लोक है-

अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवन्तिका।

पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः।।

यह श्लोक दर्शाता है कि भारतभूमि के विविध पवित्र स्थल मोक्षदायी माने गए हैं। इन्हीं में से एक है अयोध्या, जहां स्थित राम मंदिर केवल एक देवालय नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता, मर्यादा और धर्मनिष्ठा का प्रतीक है। श्रीराम भारतीय संस्कृति में आदर्श पुरुषोत्तम के रूप में पूजित हैं, अतः उनका मंदिर राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता और आस्था का केंद्र बन गया है। इसी प्रकार गुजरात राज्य में स्थित सोमनाथ मंदिर भारतीय श्रद्धा की अक्षय ज्योति का प्रतीक है। अनेक आक्रमणों और विध्वंस के पश्चात भी उसका पुनर्निर्माण यह सिद्ध करता है कि भारतीय आस्था को पराजित नहीं किया जा सकता। सोमनाथ की पुनर्स्थापना राष्ट्रीय स्वाभिमान का घोष भी है और सनातन परंपरा की अमरता का प्रमाण भी।

तीर्थ का वास्तविक अर्थ है वह स्थान जहां से जीवन का ‘पार उतार’ संभव हो। ‘तृ’ धातु से बना ‘तीर्थ’ शब्द हमें स्मरण कराता है कि यह संसार रूपी भवसागर से मुक्ति का सेतु है। पुराणों में कहा गया है कि- ”तीर्थानि पुण्यानि पुनन्ति पापं,

     संसारदुःखक्षयकारणानि।“

अर्थात् तीर्थ पापों का क्षय करने वाले और सांसारिक दुखों को हरने वाले होते हैं। यही कारण है कि भारत में तीर्थयात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मानुशासन और समाज-संपर्क का माध्यम भी रही है। तीर्थों ने विभिन्न प्रांतों, भाषाओं और समुदायों को एक सूत्र में बाँधने का कार्य किया है।

मेरठ और उसके आसपास स्थित तीर्थस्थल भी इसी महान परंपरा के अंग हैं। यहाँ के गगौल तीर्थ, औघड़नाथ मंदिर, पुरा महादेव, ब्रजघाट और शुक्रताल जैसे स्थल स्थानीय जनमानस में गहरी आस्था के केंद्र हैं। ये स्थल न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी विशिष्ट स्थान रखते हैं। विशेषकर औघड़नाथ मंदिर 1857 की क्रांति की स्मृतियों से जुड़ा हुआ है, जिसने इसे राष्ट्रचेतना का भी प्रतीक बना दिया।

वस्तुतः भारत की विरासत उसके तीर्थों में सुरक्षित है। ये तीर्थ हमारी आस्था को दृढ़ करते हैं, इतिहास की स्मृतियों को संजोते हैं और आने वाली पीढ़ियों को धर्म, त्याग और राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा देते हैं। मेरठ क्षेत्र के तीर्थ भी इसी अखंड सांस्कृतिक परंपरा के उज्ज्वल अध्याय हैं, जो हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश देते हैं।

तीर्थ किसी भी समाज व धर्म के प्रेरणा स्थल होते हैं। भारतीय जनमानस मे तीर्थों का विशेष महत्व है। भारतीय समाज  विशेषतः हिंदू समुदाय में तीर्थाे का अपना अलग महत्व है। मैं मेरठ में निवास करता हूं, मेरठ के आसपास गगौल तीर्थ, मेरठ का औघड़नाथ का मंदिर, पुरा महादेव मंदिर, ब्रजघाट गंगा, शुक्रताल जैसे तीर्थ प्रसिद्ध है, जहां प्रत्येक वर्ष लाखों श्रद्धालु जाते हैं।

मेरठ के गगौल तीर्थ के विषय में ऐसी मान्यता है कि यहा ऋषि विश्वामित्र ने तप किया था, यहां एक पानी का तालाब है, इसमे स्नान करने से चर्म से सम्बंधित रोग दूर हो जाते हैं।

वहीं औघड़नाथ का मंदिर बडा प्रसिद्ध है, यह शंकर भगवान का मंदिर है, शंकर भगवान युद्ध के देवता हैं, जिस समय अंग्रेजों के शासन में सूर्य अस्त नही होता था उस समय सन् 1857 में भारत के रणबांकुरों ने इसी औघड़नाथ के मंदिर से युद्ध के देवता शंकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त कर ब्रिटिश सत्ता को वो चुनौती पेश की थी, वैसी चुनौती अंग्रेजों को विश्व में कही से भी नही मिली।

मेरठ से बागपत रोड पर स्थित पुरा महादेव का मंदिर है। इस मंदिर पर सावन मास की शिव चौदस पर लाखों की संख्या में कांवड़िए शंकर भगवान पर हरिद्वार से गंगाजल लाकर जलाभिषेक करते हैं। इस मंदिर की स्थापना लंढौरा की रानी लाडकौर ने करवाई थी।

ऐसी मान्यता है कि जब समुद्र मंथन के बाद विष निकला था और उस विष को शंकर भगवान ने पी लिया था, कंठ मे रोक लेने के कारण वह विष शरीर में गले से नीचे तो नही जा सका, परंतु मस्तिष्क में गर्मी पैदा कर रहा था, तब देवताओं ने भगवान शंकर के शीष पर जिस दिन से लगातार जल डालना शुरू किया था, उस दिन को शिव रात्रि कहा गया। जो प्रतीक के रूप में प्रत्येक वर्ष जल अर्पण कर मनाई जाती है।

इसी प्रकार गंगा के किनारे ब्रजघाट का तीर्थ है। यह मुक्ति का स्थान बताया जाता है। राजा सकट के पुत्रों सहित 60000 समर्थक जब इस स्थान पर समाप्त हो गये थे, उनकी आत्माओं के तर्पण के लिए राजा सकट के वंशज भगीरथ ने अपनी तपस्या के फलस्वरूप ब्रह्मा जी के कमंडल से गंगा जी को भूमि पर लाये थे। तब अपने पुरखों का तर्पण किया था। ये मुक्ति का तीर्थ गढ़ मुक्तेश्वर अर्थात ब्रज घाट कहलाता है।

 शुक्रताल ऐसा पवित्र स्थान है जहां शुकदेव गोस्वामी ने 5000 साल पहले अभिमन्यु के पुत्र महाराज परीक्षित को पवित्र श्रीमद-भागवतम (भागवत पुराण) की कथा सुनाई थी । यह उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध पवित्र स्थान और मुजफ्फरनगर से लगभग 28 किलोमीटर दूर पवित्र गंगा किनारे स्थित है। हर साल बहुत से तीर्थयात्री कार्तिक पूणिमा के दिन पवित्र नदी ‘गंगा’ में स्नान करने के लिए आते हैं।

शुक्रताल के अन्य दर्शनीय स्थान -

अक्षयवट (अनन्त वृक्ष): अक्षयवट एक पहाड़ी पर स्थित है पुराणिक कथा के अनुसार इस अक्षयवट (बरगद का पेड़) के नीचे, ऋषि शुकदेव ने श्रीमद्भगवतीत कथा को राजा परीक्षित को सुनाया था। इस पेड़ की विशिष्टता यह है कि यह पेड़ कभी अपने पत्ते नहीं छोडता है ।

शुकदेव मंदिर: इस भव्य मंदिर में खूबसूरती से नक्काशी की गई ऋषि शुकदेव और राजा परीक्षित की मूर्तियां स्थापित हैं।

 हनुमान मंदिर: शुकदेव मंदिर के नजदीक में ही हनुमान जी का एक विशाल मंदिर है। इस मंदिर के ऊपर हनुमान जी की 75 फुट ऊंची मूर्ती स्थापित है।

गणेश मंदिर- हनुमान जी के मंदिर के पास ही एक बेहद दर्शनीय गणेश मंदिर है जहां 35 फुट ऊँची भगवन गणेश जी की मूर्ती स्थापित है।

इसके अतिरिक्त यहां भगवान शंकर मंदिर, स्वामी चरनदासजी मंदिर, भगवान राम मंदिर, देवी शाकंभरी मंदिर, नीलकंठ महादेव मंदिर, गंगा मंदिर स्थापित हैं।

यू तो भारत में लाखों तीर्थ स्थल है, परंतु ये मेरठ के आसपास मौजूद प्रमुख तीर्थ स्थल है, जिनका यहां के जनमानस में विशेष स्थान है।

इस प्रकार भारत की सांस्कृतिक विरासत का वास्तविक स्वरूप उसके तीर्थों में साकार होता है। ये तीर्थ केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना, इतिहास और लोकजीवन की धड़कन हैं। अयोध्या का श्रीराम मंदिर भारतीय आदर्शों का प्रतीक है, तो सोमनाथ मंदिर अदम्य आस्था और पुनर्जागरण का घोष है। इसी परंपरा की जीवंत कड़ी मेरठ क्षेत्र के तीर्थ हैं, जो धर्म और इतिहास का अद्भुत संगम प्रस्तुत करते हैं।

औघड़नाथ मंदिर जहां आध्यात्मिक श्रद्धा का केंद्र है, वहीं 1857 की क्रांति की प्रेरणास्थली भी रहा है। पुरा महादेव मंदिर में सावन के अवसर पर उमड़ती आस्था भारतीय लोकजीवन की शक्ति को दर्शाती है। ब्रजघाट मोक्ष और पितृ-तर्पण की परंपरा का प्रतीक है, जबकि शुक्रताल ज्ञान, भक्ति और भागवत परंपरा की अमर स्थली है।

मेरठ के आसपास स्थित ये तीर्थ भारत की अखंड सांस्कृतिक परंपरा के सशक्त स्तंभ हैं। वे हमें आस्था, त्याग, तप और राष्ट्रप्रेम का संदेश देते हैं। इन तीर्थों का संरक्षण और संवर्धन केवल धार्मिक दायित्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तरदायित्व भी है। जब तक तीर्थों की ज्योति प्रज्वलित है, तब तक भारत की आध्यात्मिक चेतना अक्षुण्ण और अमर रहेगी।