श्री सेतु मन्दिरम् की बारी सन्निकट - नरेन्द्र भदौरिया
श्री राम की सेना द्वारा पुरुषार्थ से निर्मित श्रीसेतु मन्दिरम को आस्था के बड़े केन्द्र के रूप में विकसित करने की बारी अब सन्निकट है। सनातन संस्कृति की इस अप्रतिम धरोहर की अन्तर राष्ट्रीय मान्यता सर्व स्वीकार्य है। इसी को आधार मानते हुए भारत ने श्रीरामेश्वरम में सागर की लहरों की केलि के बीच सुषुप्त पड़े सेतुबन्ध की ऐतिहासिकता को उजागर करने की योजना पर काम शुरू करने का निर्णय किया है। कुछ बड़े विज्ञानियों विशेषज्ञों के संयुक्त दल द्वारा इस सन्दर्भ में अन्वेषण करके रिपोर्ट देने की प्रतीक्षा की जा रही है।
अमेरिकी अन्तरिक्ष एजेंसी नासा के जेमिनी -11 उपग्रह ने अन्तरिक्ष से 1966 में भारत और श्रीलंका के बीच एक सेतु बन्ध की अनेक तस्वीरें ली थीं। उच्च कोटि के कैमरों से लिये गये इन चित्रों का गहराई से अमेरिकी विज्ञानियों ने अध्ययन करके रिपोर्ट दी थी।
इस प्रक्रिया में अमेरिकी विज्ञानियों ने कोई त्रुटि नहीं रहे इसलिए नासा के तीन और उपग्रहों को भारत के रामेश्वरम क्षेत्र से श्रीलंका के उत्तर पश्चिमी तट के मन्नार द्वीप के बीच सागर में बनी आकृति का कई बार आकलन किया। जिससे सारी स्थिति स्पष्ट हो गयी कि यह रचना हजारों वर्ष पहले मानव द्वारा निर्मित है अर्थात प्राकृतिक संरचना नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति को इस अति महत्वपूर्ण अन्वेषण की जानकारी नासा ने 1990 में दी थी। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर जॉर्ज हर्बर्ट वाकर बुश विराजमान थे। नासा के विज्ञानियों ने बुश को बताया कि भारत श्रीलंका के मध्य स्थित समुद्री क्षेत्र को मन्नार की खाडी कहा जाता है। मन्नार द्वीप लंका के आधिपत्य में है। जबकि रामेश्वरम द्वीप भारत का है। यह खाड़ी हिन्द महासागर का अंश है। यहां सागर का अन्तर तल उथला है। इसी क्षेत्र में 48 किमी की लम्बाई और तीन किमी से अधिक की चौड़ाई में मानव सभ्यता की एक अनमोल निशानी छिपी पड़ी है। रामेश्वरम और मन्नार द्वीप के बीच की इस खाड़ी के क्षेत्र में हजारों वर्षों की अवधि में समुद्री फैलाव कई बार फैलता और सिकुड़ता रहा है। इसकी पुष्टि करते हुए विज्ञानियों ने बताया कि वर्तमान समय में रामेश्वरम और मन्नार तट के मध्य सागर की दूरी केवल 48 किमी रह गयी है। हजारों वर्षों के अन्तराल में यह खाड़ी एक हजार किमी से अधिक विस्तार में फैली होने के साक्ष्य भी यहां मौजूद हैं।
समुद्र का यही भाग विशाल बाँधनुमा एक रचना को संजोये हुए है। यह रचना विशेष प्रकार के पत्थरों से गढ़ी गयी है। यह मानव निर्मित है। समुद्र की ऊपरी सतह से बिल्कुल सटी है। चार से आठ मीटर तक प्राकृतिक थपेड़ों से यह रचना कहीं कहीं धंस गयी है। इसकी सतह 45 स्थलों पर लहरों के बीच प्रायः साफ दिख जाती है। नासा के अध्ययन में यह भी कहा गया है कि श्रीरामेश्वरम तट के निकट स्थित धनुष कोटि से यह रचना हजारों वर्ष पूर्व बनी होगी। कहीं दूरस्थ स्थलों के ज्वालामुखी पर्वत के पत्थरों को लाकर इसे निर्मित किया गया होगा। जिसे सन 1480 में आयी भीषण सुनामी की लहरों ने बहुत हानि पहुंचायी। इसके बाद भी यह क्षेत्र सुनामी प्रभावित रहा । इसीलिए यहां पम्बन रामेश्वर द्वीप के बड़े भूभाग से समुद्र सिकुड़ गया। भूमि का भाग बढ़ गया। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण धनुष कोटि का क्षेत्र है। जहां भारत ने पर्यटन हेतु नया निर्माण भी किया है।
जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश ने नासा के विज्ञानियों से उस समय पूछा कि इस शोध से अमेरिका और पश्चिम के देशों को क्या लाभ होगा। नासा के विज्ञानी अपने राष्ट्रपति के इस तर्क के उत्तर में तब केवल इतना कह सके कि यह सेतु पृथ्वी पर मानव सभ्यता का सबसे प्राचीन प्रमाण है। इसलिए यह अति महत्व का है।
थोरियम के प्रचुर भण्डार का क्षेत्र: संयुक्त राज्य अमेरिका के 42 वें राष्ट्रपति के रूप में 20 जनवरी 1993 में बिल क्लिंटन ने शपथ ली। उनके कार्यकाल में रामसेतु को दुनिया के सामने उजागर करने का अवसर नासा को मिल पाया। क्लिंटन ने इस अनुसंधान के लिए नासा के विज्ञानियों की सराहना की। तब यह रिपोर्ट अमेरिका और अन्य देशों की मीडिया में सुर्खियों के साथ प्रकाशित होने लगी। उस समय नासा ने एक और बड़ा खुलासा यह किया कि इस सेतुबन्ध के समुद्री क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में थोरियम खनिज का भण्डार है जो यूरेनियम का सशक्त विकल्प है।।
भयवश शुरू हुआ विरोध: श्रीरामसेतु का अस्तित्व प्रमाणित होने का समाचार जब भारत पहुंचा तो यहां कांग्रेस की सरकार थी। पामुलपार्थी व्यंकट नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे। वह 21 जून 1991 से 16 मई 1996 तक रहे। रामसेतु के अस्तित्व का वैज्ञानिक प्रमाण मिलने पर भारत में सनातन संस्कृति को मानने वाले हिन्दुओं के सभी पन्थों वर्गों में उमंग की लहर दौड़ गयी। श्रीराम की ऐतिहासिकता के एक प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में श्रीरामसेतु को देखा जाने लगा। इससे भारत के हिन्दू विरोधी समुदायों से अधिक राजनीतिक दलों को अपनी नींव खिसकती लगी। गैर हिन्दू सम्प्रदायों- विशेष कर मुस्लिम और ईसाई समुदाय कांग्रेस और अन्य अहिन्दू समर्थक दलों को झकझोरने लगे। कांग्रेस केन्द्र की सत्ता पर आसीन थी। नरसिंहराव के बाद इटली मूल की हिन्दुओं की कट्टर विरोधी सोनिया के हाथों में अप्रत्यक्ष सत्ता केन्द्रित हो गयी थी। सोनिया को लगा कि इससे तो भारत में सनातन हिन्दू संस्कृति को रौंदने का उनका एजेण्डा धरा रह जाएगा। सनातनी हिन्दू समाज बहुत शक्तिशाली बन कर संगठित होगा।
सोनिया के कहने पर कांग्रेस के पी चिदम्बरम सहित कई नेताओं ने नेहरू के समय की एक फाइल खोज निकाली। यह फाइल 1956 की थी। जिसमें नेहरू ने श्रीलंका और भारत के बीच समुद्र के निचले तल को गहरा करके बड़े जहाजों को आर पार जाने का रास्ता बनाने की योजना गढ़ी थी। बात 1956 की है। तब तक श्रीरामसेतु के अस्तित्व की बात श्रीराम भक्तों के मानस में रामायण और अन्य हिन्दू ग्रन्थों के वर्णन तक सीमित थी। यही कि इस समुद्र में श्रीरामसेतु समुद्र की लहरों के नीचे बना होगा। जो हजारों वर्ष बाद अब होगा भी तो भग्न खण्डहरों तक सीमित होगा। पर नासा की रिपोर्ट ने हिन्दू समाज के भीतर श्रद्धा के एक बड़े ज्वार को जगा दिया था।
सोनिया के इशारे पर रामसेतु तोड़ा जाना था: सोनिया को लगा कि उनके हाथ एक बड़ा अवसर आ गया है। नासा कुछ भी कहे वह समुद्र में बनी इस रचना (रामसेतु) को तोड़ कर मिटा देंगी। इससे मुस्लिम और ईसाई शक्तियां उनकी पार्टी को फिर जिताती रहेंगी। तमिलनाडु की द्रमुक सरकार से मिलकर केन्द्र सरकार ने आनन-फानन में रूस की एक कम्पनी को श्रीरामसेतु तोड़ने का ठेका दे दिया। रूस की बड़ी मशीनें श्रीरामसेतु को तोड़ने पहुंच गयीं। एक विराट रूसी मशीन ने उक्त सेतु के निकट एक बड़ी चट्टान जो सेतु से सटी थी उस पर भरपूर जोर लगाया। तभी एक तेज धमाके से साथ इस मशीन के दो टुकड़े हो गए। तीन रूसी तकनीशियन गम्भीर रूप से घायल हो गये। जिन्हें बचाकर निकालने में समय लगा। इस घटना से श्रीरामसेतु को तोड़ने आया रूसी दल लौट गया। वह टूटी मशीन वहीं छोड़ कर चलता बना।
विहिप की अगुवाई में आन्दोलनः विश्व हिन्दू परिषद की अगुवाई में हिन्दुओं के कई संगठन खुलकर मैदान में डट गये। दिल्ली में एक बड़ा प्रदर्शन हुआ जिसमें लाखों लोग पहुंचे। कांग्रेस सरकार को हिन्दुओं की ओर से कोर्ट में घसीटा गया तो सोनिया ब्रिगेड एक बड़ी चूक कर बैठी। न्यायालय में कांग्रेस सरकार ने शपथ पत्र दिया। जिसमें श्रीराम के अस्तित्व को काल्पनिक कहा गया। श्रीराम और उसने जुड़े सारे चरित्र एक उपन्यास जैसे मिथ्या पात्र कहे गये। सोनिया के प्रभुत्व वाली मनमोहन सरकार के इस शपथ पत्र ने कांग्रेस के अस्तित्व को ही काल चक्र के भंवर में उलझा कर डुबोना शुरू कर दिया। श्रीरामसेतु का अस्तित्व प्रमाणित होने से जितनी खुशी समाज में थी उससे कई गुना आक्रोश सारे भारत में खौल उठा। कांग्रेस और उसकी सहयोगी द्रमुक पार्टी की तमिलनाडु सरकार घुटनों पर आ गयी। न्यायालय ने श्रीराम रामसेतु तोड़ने पर रोक लगा दी। जनता ने कांग्रेस को वोट के बल से सत्ता से गिरा दिया। श्रीरामसेतु को देखने बड़ी समुद्री नौकाओं से पर्यटक मन्नार और रामेश्वरम की खाड़ी में पहुंचने का प्रयास करने लगे।
थोरियम की तस्करी और राजनीति: भारत के केरल, तमिलनाडु, ओडिसा और आंध्र प्रदेश के तटीय समुद्री भागों में संसार का सबसे बड़ा थोरियम खनिज भण्डार है। यह थोरियम वस्तुतः रेडियो धर्मी यूरेनियम का विकल्प ही नहीं ऊर्जा का बहुत बड़ा स्रोत है। श्रीरामसेतु बन्ध को तोड़ने की जिद के पीछे यही थोरियम है। भारत से थोरियम की तस्करी कई दशकों से चीन के साथ ही यूरोप के कुछ देशों तक होती आ रही है। भारत से इस अति महत्वपूर्ण खनिज की तस्करी में कुछ राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं की संलिप्तता गम्भीर रहस्य है। भारत के पास संसार के कुल थोरियम का 25 प्रतिशत से ज्यादा भण्डार है। अन्यत्र एक साथ कहीं इतना बड़ा भण्डार नहीं है।
केरल के पूरे समुद्री तट में दूर तक थोरियम की चट्टाने हैं। श्रीराम सेतु के एक ओर मन्नार की खाड़ी है तो दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी है। बीच में श्रीरामसेतु की मोटी दीवार खड़ी है। तस्करी करने में लगे भारतीय और विदेशी तस्कर चाहते हैं कि सेतुबन्ध की तीन किमी मोटी दीवार यदि बीच से काट कर चौड़ी नहर बना दी जाय तो भारतीय तटों का यह थोरियम जो निरन्तर चट्टानों से लहरों के थपेड़ों के कारण रेत बन कर जमा हो रहा है वह बहकर अन्तर राष्ट्रीय सीमा में पहुंचने लगे। अभी इसकी तस्करी कुछ भारतीय नेताओं के नियंत्रण में है जो बड़ी रकम चुकाने पर थोरियम ले जाने देते है। यह ऐसे नेता हैं जो तटीय केरल तमिलनाडु जैसे राज्यों में प्रायः सत्ता में बने रहते हैं। जिनमें कई नेताओं के अंतर राष्ट्रीय सम्बन्ध विदेशों में इसी तस्करी के चलते बहुत गहरे हैं।
थोरियम खनिज की महत्ता: एक किलोग्राम थोरियम से एक वर्ष तक निरन्तर 10000 घरों की सारी विद्युत ऊर्जा आवश्यकता की सम्पूर्ति की जा सकती है। थोतीयम रेडियो धर्मिता का यूरेनियम की तुलना में सुरक्षित स्रोत है। भारत की सरकारों ने अब तक समुद्र से इसे निकालने में रुचि नहीं ली। इसके पीछे उनके व्यक्तिगत स्वार्थ आड़े आते हैं। थोरियम की निकासी राष्ट्रीय स्तर पर होगी तो देश समृद्ध होगा। पर तब नेताओं का स्वार्थ पूरा नहीं होगा।इन नेताओं की दृष्टि में देश का हित कभी महत्व नहीं रखता। नरेन्द्र मोदी 2014 में सत्ता में आये तो तस्करी पर कड़ी निगरानी शुरु करायी। इससे हड़कम्प मचना ही था। बहुत से दलीय नेता मतभेद भुलाकर एकजुट हुए पर मोदी की दीवार वह तोड़ नहीं पा रहे। केरल तमिलनाडु के तटों से प्रतिमाह लाखों करोड़ का थोरियम बाहर जाता था। इसकी रुकावट से अन्तर राष्ट्रीय तस्करों के सशक्त गिरोह बेचैन हैं। इन तटों के दूरस्थ स्थलों से भारतीय नेवी सुरक्षा निगरानी कर रही है। शायद समय बीतने की प्रतीक्षा एक ओर भारत सरकार और दूसरी ओर अन्तर राष्ट्रीय तथा भारतीय तस्कर मिलकर कर रहे हैं। थोरियम सम्पदा के साथ श्रीसेतु समुद्रम का भाग्य सुनिश्चित होना है। देश में राष्ट्रवाद विजयी रहा तो श्रीसेतु समुद्रम का नया स्वरूप उभरेगा और थोरियम से भारत में ऊर्जा के नये सूर्य का उदय होगा। नहीं तो ब्राजील के तेल की तरह भारत के थोरियम की लूट मचेगी।
लेखक - नरेन्द्र भदौरिया, वरिष्ठ पत्रकार




