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किचन से शिखर तक

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किचन से शिखर तक 

भारतीय समाज में महिलाओं की पारंपरिक भूमिका रही है - रसोई एवं घर संभालना, जिसे निभाने के परिणामस्वरूप उनकी सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में भागीदारी कम हो जाती है। यदि महिलाएँ पुरुषों की सोच के विपरीत निर्णय लेती हैं, तो उन्हें प्रताड़ना सहनी पड़ती है। बहरहाल महिलाएं सदियों से भेदभाव, शोषण, प्रताड़ना और हिंसा की शिकार होती आईं हैं। सामाजिक और आर्थिक अधिकार जैसे - भोजन, आवास, चिकित्सकीय देखभाल, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा आदि जो संपूर्ण विकास और समाज में पूरी भागीदारी को सुनिश्चित करने की भूमिका निभाते हैं, महिलाओं को समान रूप से उपलब्ध नहीं हो पाते। महिला को सक्रिय भागीदारी और परिवर्तन की अभिकर्ता के रूप में भी नहीं देखा गया है। भारतीय समाज का पितृसत्तात्मक होना इसका मूल कारण रहा है। ऐसे समाज में पुरुष संपूर्ण आधिपत्य अपना ही मानते हैं। महिला को निम्न मानकर चलते हैं। देश की आधी आबादी को न्यायोचित अधिकारों से वंचित रखना अन्यायपूर्ण व्यवहार ही कहा जाएगा। फिर भी महिलाएं समाज में समान स्तर और प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए संघर्षरत हैं। आज की नारी चूल्हे-चौके तक सीमित नहीं है, अपितु उसने अपना सर्वांगीण एवं सार्वभौमिक विकास किया है। नारी का प्रथम कार्यक्षेत्र परिवार है, जो राष्ट्र की नींव होता है ऐसे में स्त्री-पुरुष के बीच की असमानता को समाप्त कर विकास की प्रक्रिया में महिलाओं को शामिल करना अत्यंत आवश्यक है। लैंगिक असमानता महिलाओं की सत्ता एवं उच्च पदों पर उनकी पहुंच पर अकुंश लगा देती है। इस अंतर को समाप्त करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है, ताकि महिला पूर्ण रूप से सशक्त बन सके, उसे सारी मूलभूत स्वतंत्रताएं मिलें, उसके प्रति सभी प्रकार के भेदभावों का उन्मूलन हो सके।

स्वतंत्रता के बाद, लोकतांत्रिक मूल्यों के तहत स्त्रियों के अध्ययन-अध्यापन की प्रवृत्ति का प्रसार हुआ और सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक जीवन में उनकी भागीदारी बढ़ी। आज स्त्री की बदलती हुई भूमिका बहुत सकारात्मक है,, उसके कार्यक्षेत्र का तेज़ी से विस्तार हो रहा है। साथ ही उसके दायित्व भी बढ़ते जा रहे हैं। अब वह प्रिवार का अहम् हिस्सा होने के साथ-साथ जिन क्षेत्रों में आत्मविकास की संभावनाएं देखती है, उनसे जुड़ती है। यद्यपि वहां अलग तरह की चुनौतियां उसके सामने खड़ी हैं। इन चुनौतियों को राजनीति के गलियारों से लेकर, खेल-जगत, सेना, व्यापार-वाणिज्य, मीडिया, फैशन-जगत, मल्टीनेशनल कंपनियाँ आदि तक देखा जा सकता है। फिर भी उसकी प्रतिभा प्रत्येक स्थान पर अपनी चमक को कायम रखे हुए है। सेना और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों में महिलाओं की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। कुशल प्रबंधन क्षमता के चलते कई प्रतिष्ठित संस्थानों में आज महिलाएं शीर्ष स्थान पर हैं। इतना ही नहीं, अब वे पुरोहिताई भी करने लगी हैं, शंकराचार्य बनने की ओर अग्रसर हैं, जहां वे अपेक्षाकृत सफल रहेंगी क्यांेकि महिला में नैतिक होने के प्राकृतिक गुण पुरुष की अपेक्षा अधिक हैं। शिक्षिका, पत्रकार समाचारवाचिका, लेखिका, कवयित्री आदि तो महिलाएं बहुत पहले से हैं, अब पर्वतारोही भी बनने लगी हैं, अंतरिक्ष में भ्रमण करने लगी हैं, हवाई जहाज उड़ाने लगी हैं। राजनैतिक क्षेत्रों में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। अब महिलाएं पंच और सरपंच बनकर देश के निर्माण में अमूल्य योगदान दे रही हैं। नीति-निर्धारण करने वाली संसद में भी आगे आ रही हैं। समस्या वहां खड़ी होती है, जब परिवार में पुरुष को कर्त्ता और स्त्री को कमज़ोरी का नैसर्गिक प्रतीक मानने वाला समाज स्त्री की असाधारण प्रतिभा को पचा नहीं पाता है। यद्यपि हमारा समाज नारी शिक्षा एवं स्त्री अधिकारों के प्रति संवेदनशील हुआ है, परंतु आज भी समाज के कुछ कर्णधार स्त्री के आदर्श और कर्त्तव्यों को परंपरा के अनुसार ही तय करने के पक्षपाती हैं। इतने पर भी भारतीय महिला अपने कार्यक्षेत्र में अपनी सूझबूझ और कुशलता के कारण जहां अपनी अलग पहचान बनाने के लिए प्रयत्नरत है, वहीं परिवार में भी वह अपनी सार्थक भूमिका निभाती है। कामकाजी होते हुए भी मां, पत्नी, बहन, बेटी की ज़िम्मेदारियों का बखूबी पालन करती है। आज की नारी घने बादलों में छिपे सुनहरे प्रकाश की तरह संघर्षों के बवंडर से निकलकर साहसी एवं निडर रूप में सामने आई है। अपनी परिस्थितियों से लड़ना सीखकर, प्रत्येक चुनौती का सामना करने की ताकत भी उसने हासिल की है। उसे अपनी क्षमताओं के अनुरूप खुला आकाश मिल रहा है। 

राष्ट्र की प्रगति को दोहरी बनाने के लिए नारी को राष्ट्रीय उत्थान के कार्यों में संलग्न करना होगा। भौतिकवाद के कारण बढ़ती अनास्था, अविश्वास, अनैतिकता और हिंसा को शांति, प्रेम एवं संगठन द्वारा ही नियंत्रित किया जा सकता है। नारी शांति, प्रेम एवं संगठन शक्ति की प्रतीक मानी गई है। इतिहास गवाह है कि प्रत्येक युग के बाद विश्व भर में शांति के पक्ष में आवाज़ स्त्री संगठनों ने ही उठाई है। कुछ दशक पहले भी राष्ट्रीय महिला आयोग तथा अन्य महिला संगठनों ने विश्व शांति जागरूकता आंदोलन का श्रीगणेश किया था। आज देश की सबसे बड़ी मांग नव-निर्माण, परिवर्तन एवं विकास की है। इस संदर्भ में नारी की भूमिका अत्यंत आवश्यक है क्योंकि वह किचन से शिखर तक का सफर तय करने में सफल हुई है। 

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)