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धरोहर

हम सबके राम

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·         अमेरिका के मैक्सिको में मनाया जाता है ‘राम-सीतोत्सव’

·         पेरु का सूर्य मंदिर श्रीराम की ओर संकेत

·         यूनान, इटली, रोम, अमेरिका, चीन, जापान, रूस सभी की संस्कृतियों में दिखती है रामकथा की झलक

 

वेदों में हमारी संस्कृति को विश्व की प्रथम संस्कृति कहा गया है - ‘स प्रथमा संस्कृति विश्ववारा’ यजुर्वेद 7/14। विश्वबन्ध स्वामी विवेकानन्द ने कहा था ”भारत राष्ट्र समस्त राष्ट्रों में अत्यधिक सदाचारी और धार्मिक राष्ट्र है। किसी दूसरे राष्ट्र से हिन्दुओंकी तुलना करना ईश-निन्दा के समान होगा। (बी.स. 4/259)। श्रीमती एनीबेसेन्ट ने कहा था कि जब धरती पर एक के बाद एक रष्ट्र अस्तित्व में आ रहे थे तभी ईश्वर की ओर से उनको एक-एक शब्द प्रदान किया जा रहा था। जिसके द्वारा उन्हें एक विशेष संदेश देना था। प्राचीन काल में मिश्र को रिलीजन, ईरान को पवित्रता, केरेडिया को विज्ञान, ग्रीक को सौन्दर्य, रोम को कानून शब्द प्रदान किया गया और परमात्मा के श्रेष्ठ सन्नति भारत को ईश्वर ने एक शब्द प्रदान किया, जिसमें सभी अन्य सभी संदेशों का समुच्चय था। वह शब्द था ‘धर्म’। धर्म का अर्थ है कर्तव्य की संहिता। ईश्वर के प्रति समाज के प्रति, पशुओं के प्रति, पक्षियों के प्रति कर्तव्य अर्थात् सारी सृष्टि के प्रतिकर्तव्य। भारत शताब्दियों से इस सर्वभूतहितरत व्रत का पालन करता चला आ रहा है। (चमन लाल इंडिया मदर ऑफ अस ऑल)।

इसी महाव्रत का पालन करने हेतु त्रेतायुग में अयोध्या की पवित्र धरती पर महाराज दशरथ और देवी कौशल्या के यहां सृष्टि के मुकुटमणि महापुरुष श्रीराम का अवतरण हुआ। महर्षि वाल्मीकि जी ने श्रीराम को ”मूर्तिमान धर्म रामो विघ्हनवान धर्म साधु, सत्य पराक्रमाः“ भगवान श्री कृष्ण ने ‘रामः मृतामहम’, देवी सुमित्रा ने ‘न हि रामात् परो लोके विद्यते सत्पथे स्थितः’ आचार्य शुक्ल ने ‘न राम सदृश्यो राजा पृथिव्यां नीतिमान भूत’ कहकर अपनी श्रद्धा व्यक्त की है। श्रीराम में असंख्य गुण थे। वे व्यक्ति, समाज, धर्म राजनीति आदि जीवन के सभी पक्षों को स्पर्श करते है। उनकी देहयष्टि सुन्दर और आकर्षक थी। वे वेद-वेदांग, तत्वज्ञ, धर्मज्ञ, प्रजापालक, सर्वजनप्रिय थे। वे विष्णु भगवान के समान बलवान और चन्द्रमा के समान प्रिय, क्रोध में कालाग्नि के समान, क्षमा में पृथ्वी, त्याग में कुबेर और सत्य में द्वितीय धर्मराज के समान थे।

उत्तर से लेकर दक्षिण तथा समस्त भारत श्रीराम के पराक्रमपूर्ण कार्यों से धन्य हुआ था। अयोध्या, विश्वामित्र का आश्रम, अहिल्या आश्रम, दण्डकारण्य, चित्रकूट, प्रयागराज, जनकपुर, किष्किन्धा, रामेश्वरम, श्रीलंका आदि में जहां-जहां भी वे गये है, लीलाएं की है, साधुओं का उद्धार और दुष्टदलन का कार्य किये हैं। वे सभी इन महाभाग इनके श्रीचरण पड़ने से तीर्थस्थल हो गए है। श्रीराम आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श राजा, योद्वा, धर्म रक्षक, प्रजापालक थे। आजतक हम रामराज्य स्थापना का स्वपन साकार करने का प्रयत्न कर रहे हैं। इन पंक्तियों को लिखते समय मैं उन सहस्त्रों-सहस्त्रों संतो, वीरों, बलिदानियों का भी पुण्य स्मरण करूंगा जिन्होंने विधर्मियों द्वारा श्रीरामभूमि की क्षतिग्रस्त छवि को पुनः उज्जवल और साकार किया। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ श्रीरामभूमि को पुनः स्वर्णयुग में पहुंचा रहे हैं। सारा विश्व एक नया भारत देख रहा है। स्वर्गसम कश्मीर जो बुरी तरह घायल कर दिया गया था, आज पुनः धारा 370 तथा 335 ए की समाप्ति के फलस्वरूप धरती का स्वर्ग बन रही है राष्ट्रनिर्माता लोकमान्य तिलक ने गीता रहस्यं में शूद्रकमलाकर में एक श्लोक को उद्धृत किया -

अपहाय निजं कर्म कृष्ण कृष्णेति वादिनः।

ते हरे र्द्वेशिणह पापाः धर्मार्थं जना य धरे।।“ (गीता रहस्य पृ. 506)

अर्थात् अपने सुधर्मोक्ति कर्मों को छोड़ केवल ‘कृष्ण-कृष्ण’ कहते रहने वाले लोग हरी के द्वेषी और पापी है क्योंकि स्वयं हरी का जन्म भी तो धर्म की रक्षा करने के लिएहीहोता है। श्रीराम जन्मभूमि के उद्धारकर्ताओं ने

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।’ (गीता 4/8)

ईवश्री व्रत का पालन करके अक्षय कीर्ति अर्जित की है।

आज समग्र भारत राममय प्रतीत होता है। हिमालय की कन्धराओं, विंध्यपर्वत श्रेणी, गोदावरी और कावेरी तटों पर सर्वत रामनाम गूंज रहा है। कन्याकुमारी, रामेश्वरम, पंजाब, राजस्थान, अंग भंग-कलिंग सब में ही राम का जयघोष गूंज रहा है। तक्षशिला, लाहोर (लवपुर), कसूर (कुशपुर) श्रीराम के वंशजों ने बसाये थे। हमारे पर्वों नाम- नवरात्र, रामनवमी, विजयदशमी, दीपावली, सभी में श्रीराम का यश समाया हुआ है। विदेशों की सभी भाषाओं में राम का प्रताप समाया हुआ है। भारत की सभी भाषाओं में उनकी कीर्ति गूंज रही है। संतों ने श्रीराम के निर्गुण रूप को तथा वैष्णव कवियों ने उनके सगुण रूप को अर्ध्य प्रदान है। बौद्ध सम्प्रदाय में दशरथ जातक और जैन सम्प्रदाय में ‘पउनचरिउ’ श्रीराम की छटा विकीर्ण कर रहे हैं। साक्षर, निरक्षर, कोल, भील, गौड सभी के मन-मंदिर में श्रीराम विराजमान है। अमेरिका के मैक्सिको में ‘राम-सीतोत्सव’ मनाया जाता है। पेरु का सूर्य मंदिर श्रीराम की ओर संकेत कर रहा है। एशिया के रिसर्चेज से पता चलता है कि यूनान, इटली, रोम, अमेरिका, चीन, जापान, रूस सभी की संस्कृतियां रामकथा का स्पर्श पाकर धन्य हुई हैं। एशिया के पश्चिम में ‘रामसर’, रामल्लाह में राम समनिष्ठ है। यूनान के महाकवि होमर का ‘इलियड’ महाकाव्य वाल्मिकीय रामयण को प्रतिध्वनित कर रहा है। जापान के राजा का सूर्यवंश और उत्तर में लक्ष्मी का मंदिर तथा ईरान के राजा का अपने को आर्यमिहिर (सूर्य) कहना सूर्यवंशोदभव श्रीराम का अवदान स्वीकार कर रह रहे हैं। सुमात्रा के मंदिर जावा के वोरोनुदूर आदि मंदिर, कम्बोडिया (कम्बुज) की राजधानी अयोध्या और वहां के मंदिर अंकोरवत आदि पर रामलीला का चित्रांगन है। श्याम और ब्रह्मा सर्वत्र राम ब्रह्म बनकर छाये हुए हैं।

इस प्रकार देखते हैं कि मानव मेदिनी का विशालतम भाग राममय है। उनका व्यक्तित्व निस्मीम है। उनके चरित्र में हिमालय का धैर्य और समुद्र का गाम्भीर्य है। उसमें गंगा की पावनता, सूर्य की प्रखरता और चन्द्रमा का आह्लाद है। ये अनुपम है। अप्रतिम सुन्दर है। उनकी मनोहर लीलाओं, पराक्रम पूर्ण कृत्यों, जीवमात्र के प्रति आत्मीयता पूर्ण चरित्र हम बिना कहे ही जानते हैं। वे ही ऐसे महाभाग्यवान पुरुषोत्तम है जिनका मधुर गान राजमहलों, कुटीरों तथा आश्रमों में समान रूप से गूंजता रहता है। उनका चरित्र स्पैक्ट्रम (सूर्य की रंग बिरंगी पेटिका) है जो हमारी संस्कृति के सब रूपों को एक साथ प्रकाशित करने में समर्थ है। उनका अवतरण अभिनन्दनीय है। बालपन लीलामय है, किशोरावस्था क्रान्तिकारी है। युवावस्था निष्काम कर्मयोग का विराट आयोजन है। समग्र जीवन यज्ञ में है,उसमें घृत की स्निगघ्ता, नवनीत की कोमलता, कमल की निर्लिप्तता है। सत्यम शिवम सुन्दरम से अलंकृत उनकी वाणी वैदिक संस्कृति का समागान है।

(लेखक उ.प्र. रत्न सम्मानित पूर्व शिक्षक हैं)


(नोट: ये लेखक के निजी विचार हैं)